सखी कहानी का सारांश | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

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सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित कहानी 'सखी' मानवीय संबंधों की गहराई, नारी मन की संवेदनाओं और तत्कालीन समाज की रूढ़ियों पर केंद्रित एक मार्मिक

सखी कहानी का सारांश | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'


सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित कहानी 'सखी' मानवीय संबंधों की गहराई, नारी मन की संवेदनाओं और तत्कालीन समाज की रूढ़ियों पर केंद्रित एक मार्मिक रचना है। यह कहानी निराला के कथा-संग्रह 'सखी' की शीर्षक कहानी है, जिसमें उन्होंने सामाजिक यथार्थ और अंतर्मन के द्वंद्व को बड़ी स्वाभाविकता से उकेरा है।

'सखी' कहानी का कथानक कुछ नवयुवती छात्राओं पर आधारित है।ये छात्राएँ हैं—निर्मला, माधवी, कमला, ललिता, शुभा, श्यामा और ज्योर्तिमयी । निर्मला, माधवी, कमला, ललिता, शुभा और श्यामा आदि छात्राएँ लखनऊ की 'मॉडल हाउसेज' कॉलोनी की रहने वाली हैं। उन सभी ने आज थिएटर (नाट्यगृह) जाने का निश्चय किया है । ज्योर्तिमयी को छोड़कर सभी तरुणियाँ सज-धजकर इकट्ठी होने लगती हैं। पहले से ही सबने निश्चय कर लिया है कि वे कमला के घर पर एकत्र होंगी । थिएटर जाने का समय करीब आ गया है, परन्तु ज्योर्तिमयी उर्फ जोत अभी तक नहीं आयी है।

ललिता बतलाती है कि कॉलेज में आज जोत बड़ी खुश नजर आ रही थी, अवकाश वाली लड़कियों से गप-शप लड़ाती, मजाक कर रही थी और समय-से पहले ही घर चली आई। उसने पूरे उत्साह एवं उमंग से थिएटर चलना भी स्वीकार कर लिया था। ललिता ने उससे पूछा भी, आज वह इतनी खुश क्यों दिखाई दे रही है किन्तु उसने कोई उत्तर नहीं दिया बल्कि उसकी ओर देखकर हँसने लगी । यहाँ लेखक ने कथानक में औत्सुक्य की अच्छी योजना की है। पाठक को यह उत्सुकता होती है कि आखिर जोत के इतना अधिक खुश होने का कारण क्या है ? 

सखी कहानी का सारांश | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
शुभा के यह पूछने पर कि क्या जोत कक्षा में पढ़ने नहीं गयी तो, ललिता बतलाती है कि जोत क्लास में नहीं गयी । श्यामा बतलाती है कि जोत ने उससे कहा कि उसका पढ़ना-लिखना तो बस खत्म ही समझो। जोत अभी बी. ए. तृतीय वर्ष की ही छात्रा है, फिर वह पढ़ना-लिखना क्यों बंद कर रही है ? उसे बाधा क्या है ? यह बात निर्मला पूछती है । श्यामा हँसकर कहती है कि जोत ने कहा है कि उसे पढ़ना-लिखना छोड़कर अब पढ़ाने की तैयारी करनी है। लेखक ने बड़ी रहस्यमयी भाषा का प्रयोग किया है । जोत अब पढ़ना छोड़कर किसको पढ़ाने की तैयार करेगी ? सांकेतिक भाषा में प्रस्तुत किए गये सखियों के इस वार्तालाप से चुहुलबाजी एवं उत्सुकता के भाव की व्यंजना होती है। सभी सखियाँ हँसती हुई एक-दूसरे को देखने लगती हैं तो माधवी पूछती है कि इस बात का मतलब क्या है कि जोत पढ़ना बन्द कर पढ़ाने की तैयारी करेगी । श्यामा हँसकर कहती है कि जोत को जिसे पढ़ाना पड़ेगा वह स्वयं आई. सी. एस. है । अंग्रेजी राज में जिला कलेक्टर एवं ऊपर के अधिकारी आई. सी. एस. परीक्षा पास होते थे । (यहाँ यह जानने योग्य है कि आजकल ये अधिकारी आई. ए. एस. कहलाते हैं ।) सब सखियाँ समझ जाती हैं कि जोत अब आगे इसलिए नहीं पढ़ेगी क्योंकि उसका विवाह किसी आई. सी. सी. अधिकारी के साथ होने वाला है । 
जोत का घर-सब जोत के घर की ओर जाती हैं और सभी जोत के कमरे में घुस जाती हैं । वह सजी-धजी दर्पण के सामने खड़ी मुस्करा रही थी । वह अचानक संगनियों को देखकर लजा जाती है । अपने आने में देर के लिए वह सभी से अफसोस प्रकट करती है । श्यामा ने व्यंग्य किया कि अब तो उसे देर हर काम में होगी, केवल खास विद्यार्थी (उसके होने वाले आई. सी. एस. पति की ओर संकेत) को मुफ्त पढ़ाने के समय जल्दी होगी । ललिता देखती है कि मेज पर एक खुला हुआ लिफाफा पड़ा हुआ है । वह उसे उठाकर पढ़ने लगती है। जोत तेजी-से ललिता-से लिफाफा छीन लेने को झपट्टा मारती है, परन्तु श्यामा उसे पकड़ लेती है। ललिता लिफाफे में से पत्र निकालकर ऊँचे स्वर-से पढ़ने लगती है । पत्र अंग्रेजी में है, लम्बा है, उसमें शैली बीट्स, वायरस आदि अंग्रेजी के रोमाण्टिक कवियों के साथ हिन्दी के श्रृंगारिक कवि विद्यापति के भी उद्धरण हैं । जोत मन-ही-मन बहुत खुश हो रही है। जोत की मोटर में सब सखियाँ आ नहीं सकतीं । अतः वे अमीनाबाद से ताँगा करने की सोचती हैं।

लीला-जोत की एक सखी लीला है । माधवी सखियों से कहती है कि लीला शायद ही जाये।वह बहुत कंजूस है, वह सौ रुपये ट्यूशन से कमाती है, परन्तु मालूम पड़ती है महादरिद्र । जोत लीला के घर की परिस्थिति जानती है, वह उससे सहानुभूति रखती है । वह उसके चरित्र की प्रशंसा करती है और बताती है कि लीला के यहाँ कोई कमाने-करने वाला नहीं है । वह घर का सारा खर्च चलाती है, छोटे भाइयों को पढ़ाती है। माँ को कोई तकलीफ न हो इसलिए बेचारी दिनभर काम में लगी रहती है। सूखकर काँटा हो गयी, उसके चेहरे पर आँखें ही आँखें रह गयी हैं । सब लीला के घर पहुँचती हैं । जोत मजाक करती हुई उसके हाथ से पुस्तक छीन लेती है तथा कलकत्ते से आई हुई 
पारसी कम्पनी का नाटक देखने चलने का आग्रह करती है।
 
लीला जोत से दो साल आगे एम. ए. में पढ़ती है । लीला नाटक देखने जाने में अपनी असमर्थता व्यक्त करती है। वह बताती है कि वह पाँच घण्टे ट्यूशन पढ़ाती है, कॉलेज पढ़ने जाती है, उसके पास समय कहाँ है ? वह अपनी स्थिति बताती है कि वह एक डॉक्टर साहब की लड़कियों को पढ़ाने जाती है, जहाँ से उसे साठ रुपये मासिक मिलते हैं । एक तअलुक्केदार (जमींदार) की नयी सत्नी को पढ़ाती है, जहाँ से उसे चालीस रुपये मिलते हैं। इसके बाद उसे अपने पढ़ने के लिए समय निकालना पड़ता है 1 कुल सौ रुपये में घर का सब खर्च चलाती है। इस स्थिति में समय और पैसा दोनों से उसका हाथ तंग रहता है ।
 
सखियों के बीच जोत की सज-धज, हँसी आदि पर व्यंग्यमय मजाक होता है लीला के पूछने पर निर्मला बताती है कि जोत का विवाह मिस्टर श्यामलाल आई. सी. एस. के साथ होने वाला है। लीला जोत से पूछती है कि क्या उसके पिताजी राजी हो गये तो. जोत कहती है कि जहाँ आई. सी. एस. स्तर का वर मिलता हो, तो पिताजी क्यों न तैयार हो जायें।
 
जोत से प्यार करती है, लीला भी इस बात को जानती है । यहाँ से कहानी एक नया मोड़ लेती है । लीला जमींदार साहब की पत्नी को पढ़ाने के लिए भैंसा कुण्ड पैदल ही जाती है। साइकिल चलाना उसे आता नहीं है । शर्म के कारण सीखती भी नहीं है । वह भैंसा कुण्ड से साढ़े पाँच-छः बजे शाम को लौट रही होती है तो दो मुसलमान उसका पीछा करते हैं। मार्ग भी बीच में निर्जन एवं सुनसान पड़ता है । वह तेज गति से चलती है तो वे भी तेजी से उसका पीछा करते हैं।

एक दिन लौटते हुए एक मुसलमान लड़का उससे अश्लील बातें कहता है। लड़कों के और लीला के बीच 3-4 हाथ का फासला रह जाता है । भय से वह लगभग दौड़ने लगती है, तभी सामने उसे हैट-कोट पहने हुए एक साहब दिखाई पड़ते हैं। लीला तेजी से उन साहब की ओर बढ़ती है । उन्हें देखकर वे बदमाश लौट जाते हैं । लीला अपने भैंसा कुण्ड पढ़ने जाने, लौटते में उन बदमाशों द्वारा उसका पीछा करने तथा अश्लील बातें कहने की सारी घटना उन साहब को बताती है । साहब बताते हैं कि वे बदमाश शायद उनके डर से भाग गये हैं। वे अपने सामने वाले बंगले पर चलने और मोटर पर उसे घर भेजने का प्रस्ताव रखते हैं। साहब बंगले के सामने अहाते के भीतर बगीचे के पास खड़े हो जाते हैं । उनको बिजली के प्रकाश में लीला का दुबला, सुन्दर कुछ लम्बा, गोरा मुख तथा बड़ी-बड़ी आँखें दिखाई दे रही हैं। साहब लीला से उसका नाम शालीनतापूर्वक पूछते हैं। निगाह नीचे झुकाती हुई वह अपना नाम बताती हैं। साहब पूछते हैं कि क्या वह विवाहित है ? अपनी सुरक्षा-सँभाल उसे खुद ही करनी पड़ती है । लीला बताती है कि वह आइसाबेला शार्बन कॉलेज की छात्रा है तथा एम. ए. में पढ़ती है। साहब कुछ आग्रह के साथ पूछते हैं कि क्या वह ब्राह्मण हैं ? वह कहती है कि वह ब्राह्मण नहीं कायस्थ है। निवास स्थान पूछे जाने पर वह बताती है कि वह 'मॉडल हाउसेज' में रहती है। मॉडल हाउसेज सुनकर साहब पूछते हैं, 'क्या वहाँ कोई ज्योर्तिमयी रहती है ? वह उसके ही कॉलेज की बी. ए. तृतीय वर्ष की छात्रा है । लीला चौंककर साहस से उनका नाम पूछती है। वे अपना नाम श्यामलाल बताते हैं। लीला अब संकोच छोड़कर कहती है कि उसने उनकी चर्चा सुनी है। लीला मुस्कराकर कहती है कि जोत की सखियों से सुना था कि उसको आपने कोई पत्र भेजा है। साहब कुछ निराशा से कहते हैं, "मेरी उस चिट्ठी का जोत की ओर से कोई उत्तर नहीं मिला । साहब कहते हैं "उनके पिताजी मेरे विलायत (इंग्लैण्ड) में रहते समय मेरे पिताजी से मिले थे। मेरे पास उनका चित्र भेजा गया था । विलायत से लौटकर मैंने एक पत्र लिखा था, मैंने अभी तक उनको देखा नहीं है, तारीफ जरूर सुनी है ।" इतना कहकर साहब कुछ चिन्तित हो जाते हैं। इतने में मोटर आ जाती है । मुस्कराकर लीला वायदा करती है कि वह जोत को पत्र लिखने के लिए कहेगी । साहब लीला को जोत से ऐसा कुछ कहने के लिए कहते हैं।
 
कहानी का नाटकीय एवं अप्रत्याशित अन्त—इसके तीन दिन बाद श्यामलाल जी को जोत का अपने पत्र का उत्तर प्राप्त होता है। पत्र में जोत ने लिखा है कि उसने उनके पत्र का उत्तर इसलिए नहीं दिया, क्योंकि अविवाहित लड़की का होने वाले पति के पत्र का उत्तर देना सभ्यता के खिलाफ है। उसको आज लीला दीदी से उनके मिलने की सारी बातें पूरी तरह मालूम हो गयी हैं। "जिसकी जो लैला होती है, वह उसे इसी तरह मिल जाती है। अपनी लैला की आप हमेशा इसी तरह रक्षा करें, आपसे मेरी यह प्रार्थना है । तब मेरा और आपका रिश्ता और मधुर हो जायेगा, क्योंकि बहन जिसे ब्याहती है, वह अगर पत्नी की बहन को साली कह सकते हैं, तो पत्नी की बहन भी उन्हें वही पुरुष-सम्बोधन कर सकती है।आशा है, मेरा आपका सम्बन्ध स्थायी होगा।

इस प्रकार जोत अपनी सच्ची सखी लीला के लिए महान त्याग करती है और अपनी गरीब, मेहनती सखी के विवाह का प्रस्ताव श्यामलाल जी को पत्र द्वारा प्रेषित करती है । इस प्रकार कथा का अत्याशित अन्त कहानी को अधिक रोचक बना देता है।

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