मेरा अभागा रूपांतरण मेरे पिता के जीवित रहते हुए भी मेरा बचपन मुख्यतः माँ की छाया में ही बीता।
मेरा अभागा रूपांतरण
मेरे पिता के जीवित रहते हुए भी मेरा बचपन मुख्यतः माँ की छाया में ही बीता।
यह कहना अधिक उचित होगा कि मैं माँ का बेटा होने से कहीं अधिक उनकी चिंता का एक विस्तार था। मेरे लिए घर केवल रहने की जगह नहीं था; वह एक ऐसी सीमा-रेखा था, जहाँ मुझे उसके पार फैली दुनिया के प्रति निरंतर सावधान रहना सिखाया जाता था।
“बेटा, मुझे छोड़कर कहीं मत जाना!”
माँ के ये शब्द मेरे बचपन और किशोरावस्था का स्थायी आदेश थे।
स्कूल की छुट्टियाँ होतीं तो दूसरे बच्चे कहीं-न-कहीं घूमने चले जाते। स्कूल से ही भ्रमण पर जाते, रिश्तेदारों के घर ठहरते, खेलते, शोर मचाते। लेकिन मैं माँ के सिद्धांतों के कारण घर में ही बैठा रहता।
कभी किसी यात्रा की बात करता तो माँ तुरंत विरोध करतीं।
“वहाँ जाने की क्या ज़रूरत है? उतने समय बैठकर पढ़ नहीं सकते?”
खेलने के लिए बाहर निकलता तो कुछ ही देर बाद आवाज़ आती:
“बहुत हो गया। अब आओ, पढ़ो।”
मैं कहता:
“अभी तो खेलना शुरू ही किया है।”
“खेलते रहोगे तो क्या बनोगे? जीवन में कुछ बनना है तो पढ़ना ही पड़ेगा।”
दोस्तों के साथ थोड़ा अधिक समय बिताता तो माँ की अगली सीख तैयार रहती:
“दोस्त कोई इतने अच्छे नहीं होते। कौन कैसा है, किसे पता? ऐसी ही संगति से लड़के बिगड़ते हैं।”
धीरे-धीरे मैंने दोस्तों से दूर रहना सीख लिया।
पहले मैंने दोस्त खोए।
फिर धीरे-धीरे दोस्त बनाने की इच्छा भी खो दी।
और अंततः मुझे यह भी समझ में नहीं आया कि दोस्ती आखिर होती क्या है।
अपने भाई को देखकर कभी-कभी मुझे लगता था कि शायद दुनिया उसी के लिए बनाई गई है और मेरे लिए घर केवल एक जेल है।
वह बाहर जाता। लोगों से मिलता-जुलता। उसके बहुत-से दोस्त थे। सामाजिक रूप से घुलने-मिलने की उसे स्वतंत्रता थी। परिवार की दृष्टि से वह भी आवश्यक समझा जाता था।
क्योंकि मैं छोटा बेटा था।
इसलिए मेरे हिस्से में एक विशेष भूमिका पहले ही लिख दी गई थी।
“तुम घर में ही रहो।”
“माँ की बात मानो।”
“माँ को परेशान मत करो।”
पिता भी बिना किसी शर्त के माँ की बात का समर्थन करते रहे।
उनके पास भी अपनी एक तर्क-पद्धति थी। बड़ा बेटा सामाजिक रूप से विकसित हो, दुनिया देखे, लोगों से मिले-जुले। छोटा बेटा घर में रहे, माँ का सहारा बने।
तब यह व्यवस्था मुझे स्वाभाविक लगती थी।
बच्चे अपने घर की व्यवस्थाओं को प्रश्नों की कसौटी पर नहीं कसते। जो कुछ उन्हें मिलता है, वही उन्हें जीवन का स्वाभाविक रूप लगता है।
लेकिन बचपन चुपचाप भीतर अपना हिसाब लिखता रहता है।
इस अनुशासन ने मुझे बाहर की दुनिया से डरना सिखाया।
और बाद में उसी दुनिया में अकेले खड़े होना था!
यही मेरे जीवन का पहला विरोधाभास था।
एक ऐसा सूखा आकाश और सूखी धरती, जहाँ जीवन-भर बिना किसी साथी, बिना किसी सहारे अकेलेपन में जीना मेरी नियति बन गया।
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समय बीतता गया।
दूसरे बच्चे धीरे-धीरे स्वतंत्र होते गए। उन्होंने लोगों से बात करना सीखा, अपने निर्णय लेने शुरू किए, असफल हुए, फिर उठ खड़े हुए। झगड़े किए, समझौते किए, प्रेम किया, बिछड़े और फिर नए संबंध बनाए।
और मैं?
मैं स्वयं एक द्वीप बनकर सुरक्षित असुरक्षा में बना रहा।
जीवन की छोटी-सी ठोकर भी इतनी बड़ी लगती थी, जैसे कोई असाधारण दुर्घटना घट गई हो।
कोई छोटा-सा निर्णय लेना होता तो भीतर से एक आवाज़ उठती:
“अगर गलत हो गया तो?”
कोई जिम्मेदारी उठानी पड़ती तो दूसरा सवाल सामने आ जाता:
“अगर मैं इसे पूरा नहीं कर पाया तो?”
धीरे-धीरे भय मेरे स्वभाव का हिस्सा बन गया।
असफलता से अधिक मुझे इस बात का डर लगता था कि कहीं मेरी अक्षमता दूसरों के सामने उजागर न हो जाए।
शायद यही भय मेरे विवाह के रास्ते में भी दीवार बनकर खड़ा रहा।
मैंने विवाह नहीं किया।
मुझे जानने वाले लोगों ने इसके अनेक कारण खोजे होंगे। कुछ ने अपने-अपने कारण गढ़ भी लिए होंगे।
लेकिन मेरे भीतर का कारण कुछ और था।
मैं किसी दूसरे मनुष्य की जिम्मेदारी उठाने से डरता था।
पति होना केवल प्रेम करना नहीं है। परिवार को आगे बढ़ाना, निर्णय लेना, संकटों में दृढ़ रहना, दूसरे मनुष्य की भावनाओं का भार उठाना, उसके सुख-दुःख में उपस्थित रहना, अपनी स्वार्थपरता की सीमाएँ तय करना, और कभी-कभी स्वयं भीतर से टूटते हुए भी किसी दूसरे को सहारा देना।
मुझे डर था कि मैं इनमें से कुछ भी नहीं कर पाऊँगा।
इसलिए मैं विवाह से दूर रहा।
जीवन में बाहरी संबंध बने। आकर्षण आए, निकटताएँ बनीं, कुछ संबंध शायद प्रेम के बहुत करीब तक पहुँचे। लेकिन जब भी किसी स्थायी संबंध की देहरी तक पहुँचा, मेरे भीतर का भय मुझे पीछे खींच लाया।
ऐसा लगता था जैसे मेरे भीतर कोई अदृश्य प्रहरी बैठा हो।
वह कहता:
“इतना करीब मत जाओ।”
“जिम्मेदारी मत लो।”
“कहीं फँस गए तो?”
और मैं लौट जाता।
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मेरी बहन की कहानी भी पूरी तरह अलग नहीं थी।
हमने एक ही घर की हवा में साँस ली थी। अंतर केवल इतना था कि एक ही वातावरण ने हम दोनों पर अलग-अलग प्रभाव डाला।
वह धीरे-धीरे भक्ति की ओर मुड़ गई।
आज उसका जीवन लगभग पूरी तरह भक्ति में डूबा हुआ है।
कभी-कभी मुझे लगता है कि हम दोनों ने अपने-अपने ढंग से घर की सीमाओं के भीतर ही शरण खोज ली थी।
उसने ईश्वर को खोज लिया।
मैंने एकांत को।
उसने प्रार्थना को अपना सहारा बना लिया।
और मैंने अपने भीतर एक ऐसी दुनिया बना ली, जहाँ कोई मुझसे कोई जिम्मेदारी नहीं माँगता।
लेकिन क्या वह स्वतंत्रता थी?
या हमारे पालन-पोषण की विकृति का कोई दूसरा रूप?
इस प्रश्न का उत्तर आज भी मेरे पास नहीं है।
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बचपन को दोष देना आसान है।
माता-पिता को दोष देना उससे भी आसान।
लेकिन सच इतना सरल होना आवश्यक नहीं।
माँ ने मुझे इसलिए नहीं रोका था कि वह मेरा बुरा चाहती थीं। उनकी चिंता में प्रेम था। उनकी चेतावनियों में भय था। उन्हें लगता था कि दुनिया खतरनाक है और अपने लाड़ले बच्चे को उससे बचाना माता-पिता का कर्तव्य है।
पिता भी शायद यह मानते थे कि परिवार में हर बच्चे की अपनी-अपनी भूमिका होती है।
सुरक्षा की यह दीवार एक दिन मेरे भीतर ही कैद की दीवार बन जाएगी, उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा।
उन्होंने मुझे गिरने नहीं दिया।
नहीं, सच यह है कि मुझे गिरने की अनुमति ही नहीं थी!
इसलिए गिरकर उठना मैंने सीखा ही नहीं।
उन्होंने मुझे जीवन की पीड़ा से हमेशा बचाए रखा।
इसलिए पीड़ा सहने की क्षमता भी मुझमें विकसित नहीं हुई।
मुझे गलतियाँ करने से रोका गया।
इसलिए सही निर्णय लेने का आत्मविश्वास भी पैदा नहीं हुआ।
मुझे दुनिया से बचाया गया।
और अंततः मैं दुनिया से ही डरने लगा।
यही मेरे जीवन का सबसे गहरा व्यंग्य है।
जिस प्रेम ने मुझे बचाया, उसी ने मुझे कमजोर भी बना दिया।
जिस घर ने मुझे सुरक्षा दी, उसी घर ने मेरे भीतर बाहर निकलने में लगने वाला एक जीवन-भर का भय पैदा कर दिया।
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कभी-कभी मैं अपने बचपन के उस लड़के को याद करता हूँ।
खिड़की के पास खड़ा हुआ वह लड़का, जो मैं ही था।
बाहर कुछ बच्चे खेल रहे हैं।
उनकी आवाज़ें घर के भीतर तक आ रही हैं।
वह भी उनके साथ जाना चाहता है।
लेकिन माँ की आवाज़ सुनाई देती है:
“बाहर मत जाओ। बैठकर पढ़ो, बेटा।”
वह किताब खोलता है।
कुछ देर तक अक्षरों को देखता रहता है।
फिर उसकी आँखें दोबारा खिड़की की ओर उठ जाती हैं।
बाहर जीवन खेल रहा है।
और वह किताब के पन्नों के भीतर बैठकर जीवन को देख रहा है।
शायद मेरा पूरा जीवन उसी दृश्य का विस्तार है।
बाहर दुनिया आगे बढ़ती रही।
लोगों ने प्रेम किया, विवाह किया, असफल हुए, सफल हुए, दोस्तियाँ कीं, झगड़े किए, फिर एक-दूसरे से मिले, संबंध बनाए और जीवन को आगे बढ़ाते रहे।
और मैं?
मैं खिड़की के भीतर से जीवन को देखता रहा।
आज कभी-कभी मन पूछता है:
क्या मैंने सचमुच अपना जीवन जिया है?
या फिर जिस जीवन को कभी जीने की अनुमति ही नहीं मिली, उसे मैंने केवल सुरक्षित रख छोड़ा?
शायद यही मेरा अभागा रूपांतरण है।
अत्यधिक सुरक्षा में पला हुआ एक बच्चा धीरे-धीरे ऐसा वयस्क बन गया, जिसे स्वतंत्रता तो मिली, लेकिन स्वतंत्र होकर जीने का अभ्यास कभी नहीं मिला।
पिंजरा खुले हुए बहुत समय बीत चुका है।
लेकिन उड़ना सीखने की उम्र कब की बीत चुकी थी।
- बिनॉय एम. बी.,
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प्रथम तल,चेलूर सेवेंथ एवेन्यू
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