मैं और मेरा कुरुक्षेत्र

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मैं और मेरा कुरुक्षेत्र हज़ारों साल पहले कुरुक्षेत्र के मैदान में पांडवों और कौरवों के बीच युद्ध हुआ, जो 18 दिनों तक चला।

मैं और मेरा कुरुक्षेत्र


हज़ारों साल पहले कुरुक्षेत्र के मैदान में पांडवों और कौरवों के बीच युद्ध हुआ, जो 18 दिनों तक चला। पर क्या वो युद्ध सिर्फ अच्छाई और बुराई के बीच था? क्या वो युद्ध सिर्फ पांडवों और कौरवों के बीच था, जो 18 दिन बाद खत्म हो गया? शायद नहीं। ऐसे युद्ध आज भी होते हैं, बस उनकी वजह, मायने और स्तर बदल गए हैं।

आज के दौर में शायद हर कोई अपना युद्ध लड़ रहा है। मैं भी उनमें से एक ही हूँ क्योंकि कुछ समय से मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं कुरुक्षेत्र के युद्ध में हूँ। कभी मैं खुद को अर्जुन की जगह पर खड़ा पाती हूँ, तो कभी अभिमन्यु की जगह।
 
ऋचा गोयल कटियार
जब अर्जुन की जगह होती हूँ, तो खुद को अपनी जिम्मेदारियों के दूसरी तरफ पाती हूँ। जैसे एक तरफ मैं और दूसरी तरफ मेरा परिवार, मुझसे जुड़ी आशाएँ और मेरी जिम्मेदारियाँ। मुझे परिवार से दूर नहीं जाना है, बल्कि उनके बंधन से मुक्त होना है। वो बंधन जो शायद दोनों तरफ से है, पर कभी-कभी वह नया सोचने नहीं देता, खुल के जीने नहीं देता।
 
इसमें उनकी गलती नहीं है। कई वर्षों से स्त्रियों की मानसिकता ही ऐसी है। जिसकी वजह से वह उस दायरे से बाहर नहीं निकल पाती। जो निकल भी जाती हैं, वे घर के बारे में सोचती रहती हैं। मतलब घर में रहने वाली स्त्रियाँ बाहर जाने के बारे में सोचती है और बाहर जाने वाली घर के बारे में। कुछ स्त्रियाँ स्वतंत्र होती हैं, जो अपने बारे में सोचती है। ऐसी स्त्रियों से मुझे जलन होती है कि मैं क्यों ऐसी नहीं हूँ।

मैं अभिमन्यु तब बन जाती हूँ जब पाती हूँ कि ये बेड़ियाँ मैंने खुद लगाई हैं। अपने मन में, अपने विचारों में, अपने खुल के जीने में।

अपने विचारों, अपनी आदतों, अपनी इच्छाओं, खुद से किए गए वचनों, लोगों-चीजों से जुड़ाव, इन सब ने मुझे चक्रव्यूह के घेरे में कैद कर किया हैं। खुद को खोजना भी इसी चक्रव्यूह में शामिल हो गया है। कभी-कभी ज्यादा जिज्ञासा खुद को गहरे चक्रव्यूह में ले जाती है।

तो क्या इससे निकलने का कोई तरीका नहीं है? जो मुझे समझ में आया वो है समर्पण। समर्पण आज को ताकि आप उसे पूर्ण रूप से जी पाए, बिना बीते कल या आने वाले कल की चिंता किए। जो भी भावना या विचार आप महसूस कर रहे उस पर ध्यान दे, कि क्या वो आपको आगे बड़ने में मदद कर रही है या आपके पैरों में बेड़िया डाल रही है?

क्योंकि जब आप मन के चक्रव्यूह को तोड़ लेंगे, तो आप न अभिमन्यु रहेंगे, न अर्जुन।


ऋचा गोयल कटियार एक निबंधकार, ब्लॉगर और विचारिका हैं। उनके लेखन का मुख्य उद्देश्य मानव मानस, आंतरिक आदतों, आत्म-सुधार और आधुनिक स्त्री के सामाजिक-पारिवारिक संघर्षों की गहराई को टटोलना है। वे अपने ब्लॉग के माध्यम से जीवन-दर्शन और गहरे अनुभवों को बेहद सरल और ईमानदार शब्दों में साझा करती हैं।

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