वारेन हेस्टिंग्स का सांड कहानी का सारांश उदय प्रकाश सांड का उन्माद और उसकी बलि भारतीय जनता के दबे हुए प्रतिरोध का प्रतीक है जो सदियों बाद भी जीवित रह
वारेन हेस्टिंग्स का सांड कहानी का सारांश | उदय प्रकाश
उदय प्रकाश की प्रसिद्ध कहानी ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड’ इतिहास, कल्पना, फैंटेसी और यथार्थ का ऐसा अनूठा मिश्रण है जिसमें लेखक शुरू में ही पाठकों को सावधान कर देता है कि इसमें इतिहास उतना ही है जितना दाल में नमक। अगर कोई इसमें शुद्ध इतिहास खोजने निकलेगा तो उसके हाथ में सिर्फ रेत की ढेर या कनेर की टहनी ही बचेगी। इतिहास और सपना, सच और कल्पना, अतीत और भविष्य जब एक-दूसरे में घुलमिल जाते हैं तो कहानी में एक दिव्य लीला शुरू होती है और ऐसी माया से मुठभेड़ ही सत्य की असली खोज बन जाती है।
कहानी सत्रह वर्षीय युवक वारेन हेस्टिंग्स के 1750 में भारत आने से शुरू होती है। वह एक रहस्यमय, काले-भूरे लोगों और मोतियों जैसे दांतों वाली कठपुतली जैसी स्त्रियों वाली भूमि पर कदम रखता है। यह देश उसे एक साथ भयभीत भी करता है और आकर्षित भी। वह यहां की भाषा, संगीत, साहित्य और संस्कृति में डूबने लगता है। उसकी गहरी दोस्ती एक बाउल गायक बुंटू से हो जाती है और वह अपने घर में काम करने वाली माली की लड़की चोखी से प्रेम करने लगता है। युवा वारेन भारत के प्रति एक रोमांटिक लगाव महसूस करता है। वह यहां की रीति-रिवाजों, धर्मों और लोगों के करीब आने की कोशिश करता है। चोखी के माध्यम से वह भारतीय जीवन की गहराई में प्रवेश करता है। यह रिश्ता उसके जीवन का सबसे संवेदनशील और मानवीय पक्ष बन जाता है।
समय के साथ वारेन की जिंदगी बदलती जाती है। वह ईस्ट इंडिया कंपनी में तरक्की करता है और 1772 में बंगाल का गवर्नर तथा बाद में भारत का पहला गवर्नर जनरल बन जाता है। सत्ता और शक्ति के साथ उसका व्यक्तित्व बदलने लगता है। वह प्रशासनिक सुधार करता है, राजस्व व्यवस्था बदलता है, न्याय व्यवस्था स्थापित करता है, लेकिन साथ ही शोषण, भ्रष्टाचार और हिंसा भी उसके शासन का हिस्सा बन जाती है। कहानी में दिखाया गया है कि कैसे एक समय भारत से प्रेम करने वाला युवक धीरे-धीरे एक कठोर उपनिवेशवादी शासक में बदल जाता है। वह भारतीय संस्कृति को अपनाने का दिखावा करता है, गायों और सांडों को पालता है, हिंदू रीति-रिवाजों में रुचि दिखाता है, लेकिन असल में उसकी नीतियां भारत को और ज्यादा गुलाम बनाने वाली होती हैं।
कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पात्र वह तिब्बती सांड है जो वारेन के जीवन से जुड़ जाता है। जब वारेन पर महाभियोग चलता है और वह इंग्लैंड लौटता है तो वह अपने साथ पांच ब्राह्मणी गायें और एक सांड ले जाता है। यह सांड मौन रहकर भी अंग्रेजी षड्यंत्र को पहचान रहा होता है। 1795 में जिस दिन वारेन हेस्टिंग्स को महाभियोग के मुकदमे से बरी कर दिया जाता है, उसी दिन वह उन्मत्त सांड वारेन की शाही बग्घी पर टूट पड़ता है और उसे हवा में उछाल देता है। सेना सांड पर गोली चलाती है और उसे मार डालती है। बाद में उसी सांड की चर्बी का इस्तेमाल उन कारतूसों में होता है जिनसे मंगल पांडे ने अंग्रेज अधिकारी पर गोली चलाई थी। इस तरह सांड भारतीय प्रतिरोध का प्रतीक बन जाता है।
कहानी के बीच में चोखी की आत्महत्या एक निर्णायक मोड़ है। वारेन का तथाकथित हिंदुत्व-प्रेम और भारतीय संस्कृति के प्रति लगाव चोखी की मौत के साथ टूट जाता है। लेखक दिखाता है कि कैसे सत्ता हासिल करने के बाद वारेन अपनी युवावस्था के प्रेम, दोस्ती और संवेदनशीलता को पीछे छोड़ देता है। बुंटू जैसे आम भारतीय भी उसके शासन की क्रूरता का शिकार होते हैं।
कहानी सिर्फ अठारहवीं शताब्दी की घटना नहीं है। उदय प्रकाश इसके माध्यम से उत्तर-औपनिवेशिक भारत की मानसिकता पर प्रहार करते हैं। वारेन हेस्टिंग्स की वह भविष्यवाणी कि दो सौ साल बाद जब अंग्रेज लौटेंगे तब भी भारत में उनके जैसे नेटिवों का राज होगा, उनके कपड़े, विचार, सपने और आकांक्षाएं अंग्रेजी होंगी, कहानी का केंद्र बन जाती है। यह पंक्ति समकालीन भारत के उन शासकों और अभिजात्य वर्ग की ओर इशारा करती है जो विदेशी मानसिकता को अपनाए हुए हैं।
इस तरह ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड’ एक ऐसी कहानी है जो इतिहास के नाम पर फैंटेसी रचती है, लेकिन उस फैंटेसी के जरिए वर्तमान के भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग, सांस्कृतिक पाखंड और उपनिवेशवादी मानसिकता की गहरी आलोचना करती है।सांड का उन्माद और उसकी बलि भारतीय जनता के दबे हुए प्रतिरोध का प्रतीक है जो सदियों बाद भी जीवित रहता है।


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