आज का दिन श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व है, जिसे संपूर्ण भारतवर्ष में और विश्व भर में बसे भारतीय समुदाय में अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उल्लास
जन्माष्टमी पर भाषण
आदरणीय अतिथिगण, पूजनीय गुरुजन, और यहाँ उपस्थित सभी श्रद्धालु भाइयों और बहनों,
आज हम सब यहाँ एक अत्यंत पावन और आनंदमय अवसर पर एकत्रित हुए हैं। आज का दिन श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व है, जिसे संपूर्ण भारतवर्ष में और विश्व भर में बसे भारतीय समुदाय में अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह वह दिन है जब भगवान श्री कृष्ण ने द्वापर युग में मथुरा नगरी के कारागार में, अपने मामा कंस के अत्याचारों से त्रस्त धरती को मुक्ति दिलाने के लिए, माता देवकी और पिता वासुदेव के घर अवतार लिया था।
जब हम श्री कृष्ण जन्म की कथा को याद करते हैं तो हमारे सामने वह अद्भुत रात्रि साकार हो उठती है, जब भादो मास की अष्टमी तिथि को, अर्धरात्रि के समय, घनघोर वर्षा हो रही थी, यमुना नदी उफान पर थी, और चारों ओर घना अंधकार छाया हुआ था। ऐसे विकट समय में कारागार की सारी बेड़ियाँ अपने आप खुल गईं, पहरेदार गहरी नींद में सो गए, और वासुदेव जी अपने नवजात पुत्र को एक टोकरी में रखकर उसे अपने सिर पर उठाए यमुना नदी को पार करके गोकुल की ओर चल पड़े। यह दृश्य हमें यह शिक्षा देता है कि जब भी धरती पर अन्याय और अत्याचार अपनी सीमाएँ पार करने लगता है, तब स्वयं परमात्मा किसी न किसी रूप में अवतरित होकर धर्म की पुनर्स्थापना करते हैं। यही भगवान कृष्ण ने स्वयं गीता में भी कहा है कि जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब वे स्वयं इस धरती पर अवतार लेते हैं।
भगवान श्री कृष्ण का संपूर्ण जीवन हमारे लिए एक प्रेरणा स्रोत है। बाल्यकाल में उन्होंने पूतना, तृणावर्त, अघासुर जैसे अनेक राक्षसों का वध करके यह सिद्ध किया कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए किसी भी आयु या अवस्था में साहस दिखाया जा सकता है। गोकुल और वृंदावन में उन्होंने ग्वाल-बालों के साथ खेलते हुए, माखन चुराते हुए, गोपियों के साथ रास रचाते हुए, अपने बाल सुलभ क्रीड़ाओं से सबका मन मोह लिया। कालिया नाग का दमन करके उन्होंने यमुना नदी को विषमुक्त किया और यह संदेश दिया कि बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, सत्य और धर्म के आगे उसे झुकना ही पड़ता है। गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर उन्होंने इंद्र के अहंकार को चूर किया और यह सिखाया कि प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा करना, अंधविश्वास और मिथ्या पूजा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
जैसे-जैसे भगवान कृष्ण बड़े हुए, उन्होंने मथुरा जाकर अपने अत्याचारी मामा कंस का वध किया और अपने माता-पिता को कारागार से मुक्त कराया। इसके पश्चात उन्होंने द्वारका नगरी की स्थापना की और महाभारत के महासंग्राम में अर्जुन के सारथी बनकर उन्हें कर्तव्य और धर्म का वह अमर संदेश दिया जिसे आज हम श्रीमद्भगवद्गीता के नाम से जानते हैं। गीता में दिया गया उनका उपदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पहले था। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने कर्म करते रहना चाहिए, फल की चिंता किए बिना, क्योंकि कर्म करना ही हमारे हाथ में है, परिणाम तो परमात्मा के हाथ में है। यह संदेश आज के भागदौड़ भरे जीवन में, जहाँ हर व्यक्ति परिणाम की चिंता में तनावग्रस्त रहता है, अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है।
श्री कृष्ण का जीवन हमें यह भी सिखाता है कि हमें जीवन के हर रूप को सहजता से स्वीकार करना चाहिए। वे कभी बाल सखा के रूप में सरल और निश्छल दिखाई देते हैं, कभी प्रेम और भक्ति के प्रतीक बनकर राधा और गोपियों के साथ रास रचाते हैं, कभी अर्जुन के सारथी बनकर कर्तव्य का पाठ पढ़ाते हैं, तो कभी एक कुशल राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ के रूप में महाभारत के युद्ध की रणनीति तय करते हैं। यह विविधता हमें सिखाती है कि जीवन में हमें भी हर परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढालना आना चाहिए, परंतु अपने मूल सिद्धांतों और धर्म से कभी विचलित नहीं होना चाहिए।
आज के इस पावन अवसर पर हमें केवल उपवास रखने, मंदिरों में झूला सजाने, भजन-कीर्तन करने और रात्रि बारह बजे लड्डू गोपाल का जन्मोत्सव मनाने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि हमें भगवान कृष्ण के जीवन से मिलने वाली शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारने का भी संकल्प लेना चाहिए। हमें सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठानी चाहिए, अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए, और निःस्वार्थ भाव से समाज और राष्ट्र की सेवा करनी चाहिए। यदि हम भगवान कृष्ण के इन आदर्शों को अपने दैनिक जीवन में उतार सकें, तो यही उनके प्रति सच्ची भक्ति और सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
अंत में मैं यही कहना चाहूँगा कि जैसे भगवान कृष्ण ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि प्रेम, करुणा, साहस और धर्म की शक्ति के सामने कोई भी अत्याचार टिक नहीं सकता, वैसे ही हम सब भी अपने जीवन में इन गुणों को अपनाकर एक बेहतर समाज और बेहतर राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं। आइए, हम सब मिलकर इस जन्माष्टमी के पावन पर्व पर भगवान श्री कृष्ण से यही प्रार्थना करें कि वे हमें सद्बुद्धि दें, हमें सत्य के मार्ग पर चलने की शक्ति दें, और हमारे जीवन को अपनी कृपा से सदैव आलोकित करते रहें।
जय श्री कृष्ण, नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की।
धन्यवाद।


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