पंत और पल्लव की आलोचनात्मक समीक्षा | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

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पंत और पल्लव, निराला जी की प्रसिद्ध आलोचनात्मक कृति है जिसे उन्होंने प्रारम्भ में 'प्रबन्ध पद्म' में निबन्ध रूप में संकलित किया था।

पंत और पल्लव की आलोचनात्मक समीक्षा | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'


पंत और पल्लव, निराला जी की प्रसिद्ध आलोचनात्मक कृति है जिसे उन्होंने प्रारम्भ में 'प्रबन्ध पद्म' में निबन्ध रूप में संकलित किया था । कालान्तर में निराला जी की साहित्यिक मान्यताओं के संवाहक के रूप में इसके स्वतन्त्र प्रकाशन की आवश्यकता अनुभव की गई है । इस लघुकाय कृति में उन्होंने पंत जी द्वारा 'पल्लव' की भूमिका में व्यक्त विचारों की आलोचनात्मक समीक्षा की है और अपने मत की पुष्टि के लिए 'पल्लव' से अनेक काव्य-पंक्तियों को उद्धृत किया है। किन्तु यह कृति 'पल्लव' की सम्पूर्ण समालोचना नहीं है—उनकी पाँच-छह कविताओं से ही उन्होंने उद्वरणादि दिए हैं। आलोच्य कृति में 'पल्लव' से सम्बद्ध निम्नलिखित तत्त्वों पर विचार-विमर्श किया है : 'पल्लव' में संग्रहीत कविताओं की रवीन्द्रनाथ की कविताओं से तुलना, पन्त की छंद-योजना और उसमें कवित्त छंद के महत्त्व का निर्धारण, मुक्त छन्द से सम्बन्ध पंत जी के विचारों की आलोचना, मुक्त छंद और कवित्त छंद में परस्पर सम्बन्ध का रहस्योद्घाटन, खड़ी बोली एवं ब्रज-भाषा की तुलना, पाश्चात्य और भारतीय कवियों का तुलनात्मक विवेचन, भारतीय दर्शन और भारतीय कवियों का तुलनात्मक विवेचन, भारतीय दर्शन की व्याख्या, पंत जी के शब्द चयन का गुण-दोषयुक्त निरूपण और अन्ततः पंत जी के काव्य-रूप का समग्रतः मूल्यांकन । 

पंत और पल्लव की आलोचनात्मक समीक्षा | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
निराला जी द्वारा इस कृति के लिखने का एक प्रमुख कारण भी था, वह यह कि पंत जी ने पल्लव की भूमिका में निराला जी के शब्द चयन एवं उनके द्वारा आविष्कृत मुक्त छंद की व्यंग्यपूर्ण आलोचना की थी। निराला जी को यह बात अच्छी नहीं लगी, क्योंकि उनकी दृष्टि में, पंतजी द्वारा उनके प्रति व्यक्त किये गये विचार उचित नहीं थे। इस प्रकार पंत जी के विचारों के अनौचित्य को ध्यान में रखकर निराला जी ने यह गवेषणात्मक निबन्ध लिखा । इस निबन्ध में यत्र-तत्र निराला जी जी का आक्रोश भी छलक आया है । किन्तु सम्पूर्ण निबन्ध को पढ़ने के बाद यह सन्देह नहीं रह जाता है कि निराला जी जी ने काफी गहन चिन्तन और मनन करने के उपरान्त ही इस निबन्ध को लिखा था। पंत जी के विचारों के प्रति निराला जी जी ने जो अपना प्रतिवाद प्रस्तुत किया उसे उन्होंने वैज्ञानिक आधार दिया । पहले उन्होंने पंत जी के 'पल्लव' से उनके वक्तव्य उद्धृत किए फिर उसकी व्याख्या की और तत्पश्चात् अंत में अपना निर्णय दिया ।

निराला जी के विचार में कवि बाह्य जगत् से प्रेरणा प्राप्त करके ही साहित्य लिखता है । अतः उसके काव्य में रुचि (अन्तः प्रकृति) और प्रतीयमान प्रकृति का समान योगदान रहता है । यहाँ निराला जी ने प्रकारान्तर से अरस्तू के इस सिद्धान्त की पुष्टि की है कि काव्य (साहित्य), प्रकृति (अन्तः और बाह्रा प्रकृति) का अनुकरण (कल्पनात्मक पुनः सृजन) है। वस्तुतः उक्त विस्तृत व्याख्या निराला जी ने यह सिद्ध करने के लिए दी है कि 'पल्लव' के रचनाकाल में पंत जी ने जिन विविध ज्ञान-स्रोतों से प्रेरणा प्राप्त की थी, उनका उल्लेख उन्हें 'पल्लव' के प्रवेश भाग में करना चाहिए था।

निराला जी ने पंत जी की कविताओं की व्याख्या में तुलनात्मक शैली का भी आश्रय लिया। उन्होंने 'पल्लव' की कुछ पंक्तियों को रवीन्द्र की काव्य-पंक्तियों के समानान्तर रखकर उनकी तुलना की और तदुपरान्त यह निर्णय दिया कि पल्लव की अनेक कविताएँ रवीन्द्रनाथ की कविताओं की नकल मात्र हैं। इस प्रकार उन्होंने पंत जी की कविताओं के भाव-स्रोतों की खोज कर उनकी विस्तृत व्याख्या की है। पंत जी ने रवीन्द्र की कविताओं से जो भाव लिए हैं उनको अपनी कविता में पुनः प्रस्तुत करने में विकृत कर दिया है । अर्थात् उसके सौन्दर्य की रक्षा वे नहीं कर सके हैं । निराला जी की दृष्टि से पंत जी भाव-सौन्दर्य पर उतना ध्यान नहीं देते हैं, जितना शब्द सौन्दर्य पर । निराला जी का अधिकार हिन्दी और बंगला पर समान रूप से था इसीलिए पंत जी ने रवीन्द्र की कवितावओं से जो स्थल लिये थे उसे पहचानने में निराला जी को देर न लगी । उन्होंने रवीन्द्र-काव्य के एक-एक शब्द की सूक्ष्म व्याख्या की और उसके समानान्तर पंत की कविताओं के दोषों को उजागर किया है । इस सम्बन्ध में उनकी निम्नलिखित पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं : 
  • "पंत जी चौर्य-कला में निपुण हैं। वह कभी एक पंक्ति से अधिक का लोभ नहीं करते हैं । एक पंक्ति किसी एक कविता से ली, दूसरी किसी दूसरी कविता से, तीसरी में कुछ अपना हिस्सा मिलाया, चौथी में कुछ गढ़कर बैठा दिया । इस तरह की सफाई पकड़ने में समालोचकों को बड़ी दिक्कत होती है । उधर कवि को अपनी मौलिकता की विज्ञापन बाजी करने में कोई भय नहीं रहता है।" 
  • "वह पंक्ति-चोर हैं, भाव-भंडार के लूटने वाले डाकू नहीं । छकने के लिए एक चुल्लू से ज्यादा नहीं चाहते, शायद हज्म न कर सकने का खौफ खाते हैं।" 
वस्तुतः तुलनात्मक दृष्टि से अध्ययन करने पर निराला जी के विचार संगत प्रतीत होते हैं । तुलना के सन्दर्भ में दोनों कवियों की जितनी कविताएँ प्रकाश में आई हैं, उनसे यही सिद्ध होता है कि पंत जी रवीन्द्र-साहित्य से प्रभावित रहे हैं, किन्तु यह भी स्पष्ट है कि भाषा-भेद के कारण वे उनके भावों को सर्वत्र उसी गहराई में ग्रहण करने में सफल नहीं हुए हैं।
 
पंत जी ने अपने 'पल्लव' में कवित्त छन्द को सौन्दर्यहीन बताते हुए मात्रिक छंद को उससे श्रेष्ठ कहा है । निराला जी के अनुसार पंत द्वारा व्यंजनाश्रित कवित्त छन्द की अपेक्षा स्वराश्रित मात्रिक छंद पर बल देना उनके स्त्रीत्व प्रधान स्वभाव का परिचायक है। पंत जी ने जिस कवित्त छंद को हिन्दी के उच्चारण संगीत के प्रतिकूल, अस्वाभाविक गति से चलने वाला बतलाया है इसका कारण पंत जी के स्वभाव में है। कुछ ऐसा ही विचार डॉ. नगेन्द्र ने भी अग्र व्यक्त किया है।"उनका (पन्त का) यह निष्कर्ष कि हिन्दी के संगीत का मूल आधार स्वर है, व्यंजन नहीं, उनकी अपनी गीति प्रतिभा की अभिव्यक्ति में तो निश्चय ही सहायक हुआ है, किन्तु उनके काव्य में उदात्त और विराट तत्त्व का अभाव भी बहुत कुछ इसी का परिणाम है । पन्त-काव्य का विवेचन करते समय मेरे मन में अनेक बार यह बात आई कि जहाँ आन्तरिक भाव-चित्र विराट् हैं वहाँ भी उसका मूर्त्ताकार विराट् नहीं हो पाया है।"
 
इस कृति में निराला जी जी ने पंत जी के विचारों की स्थान-स्थान पर आलोचना की है और उनकी अनुचित धारणाओं का खंडन किया है। तथ्य यह है कि निराला जी ने 'पल्ल्व' की भूमिका के केवल उन्हीं अंशों को लिया है जिनसे उनका विरोध था । फलत: पंत-काव्य के दोष और उनका निराकरण ही इस कृति में प्रमुख रहा है ।

डॉ. निर्मल जिन्दल ने लिखा है कि पंत जी को यह भ्रान्ति थी कि उनकी अधिकांश कविताएँ मुक्त छंद में लिखित हैं । किन्तु निराला जी ने उन्हें गीतिकाव्य की श्रेणी में रखकर उनके भ्रम को दूर किया है। उन्होंने पंत की कविताओं को मुक्त छंद की कसौटी पर परखा है और इस सन्दर्भ में मुक्त छंद की भी सूक्ष्म व्याख्या की है । स्पष्टतः इसमें सैद्धान्तिक आलोचना का स्वरूप भी व्यक्त हुआ है । निराला जी ने मुक्त छंद की सृष्टि कवित्त छंद से मानकर एक नवीन तथ्य का उद्घाटन किया है। इसके पूर्व मुक्त छंद पूर्णतया नवीन छंद माना जाता था, किन्तु इन्होंने इन दोनों छन्दों के परस्पर सम्बन्ध की व्यंजना कर अपनी ईमानदारी का परिचय दिया है । इस सम्बन्ध में श्री गंगाधर मिश्र की उक्ति दृष्टव्य हैं :“निराला जी की समीक्षा-दृष्टि इतिहास, परम्परा तथा प्रतिभाओं की ज्योति के गम्भीर अनुसन्धानपूर्ण अध्ययन से युक्त हैं।" 

निराला जी ने पंत जी की कुछ पंक्तियों की व्याख्या करते समय समाजशास्त्रीय आधार को भी ध्यान में रखा है। पंत जी ने ब्रज-भाषा पर अश्लीलता का आरोप लगाया है जिसका निराकरण निराला जी ने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में किया और विभिन्न भाषा के कवियों की रचनाओं से उदाहरण देकर यह सिद्ध किया है कि ऐसी अभिव्यक्तियाँ प्रत्येक युग के साहित्य में मिलती हैं । ग्रन्थ के तृतीय परिच्छेद में निराला जी ने व्याकरण और सौन्दर्यशास्त्र के आधार पर पंत जी के शब्द चयन के गुणों और दोषों का अंकन किया है । निराला जी ने पंत जी की मौलिकता की प्रशंसा उनकी रचनाओं में निहित माधुर्य गुण के रूप में स्वीकार की है । इस दृष्टि से उन्होंने पंत-काव्य का विश्लेषण भी किया है और एक भाव को विभिन्न रूपों में कहने की उनकी शक्ति की भरपूर सराहना भी की है । उन्होंने जितनी सूक्ष्मता से उनके दोषों को उभारा है उतनी ही सूक्ष्मता से उनकी विशेषताओं का उद्घाटन भी किया है। इस प्रकार संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि निराला जी जी ने पंत जी के 'पल्लव' के जितने अंशों की आलोचना की है वह स्वयं में पूर्ण हैं और उससे इस बात की स्पष्ट झलक मिलती है कि निराला जी जी ने अपने इस निबन्ध को लिखने के लिए पर्याप्त श्रम तथा चिन्तन और मनन भी किया था। अपनी इस रचना में वे एक कला-मर्मज्ञ के रूप में पाठकों के सामने आते हैं। उन्होंने 'पल्लव' के दोष-दर्शन के साथ उसकी अन्यान्य विशेषताओं को भी भरपूर सराहा है।

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