सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' हिंदी साहित्य के एक ऐसे युगांतकारी विचारक और आलोचक हैं, जिनकी आलोचना पद्धति किसी बनी-बनाई लीक या पारंपरिक ढाँचे की ग़ुलाम
निराला की आलोचना पद्धति का स्वरूप
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' हिंदी साहित्य के एक ऐसे युगांतकारी विचारक और आलोचक हैं, जिनकी आलोचना पद्धति किसी बनी-बनाई लीक या पारंपरिक ढाँचे की ग़ुलाम नहीं रही। उनकी समीक्षा दृष्टि मूलतः व्यावहारिक, प्रगतिशील, तर्कसंगत और निर्भीक विवेक पर आधारित है। उन्होंने अपने निबंधों और समीक्षात्मक लेखों के माध्यम से हिंदी आलोचना को केवल सिद्धांतों की व्याख्या से निकालकर जीवंत काव्य-संवेदना से जोड़ा।
वैसे तो प्रत्येक रचनाकार में रचनात्मक प्रतिभा जन्मजात होती है । किन्तु इस प्रतिभा का स्फुरण और दिशाभावन उस रचनाकार के जीवन की परिस्थितियों द्वारा होता है । सृजनशीलता का गुण हर व्यक्ति में किसी-न-किसी अंश में विद्यमान होता है किन्तु उसका विकास बहुत कुछ व्यक्ति के जीवन की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसीलिए प्रायः ऐसा देखा गया है कि अनेक प्रतिभाशाली बच्चे भी जीवन की विसंगतियों और प्रतिकूल परिस्थितियों के शिकार होकर असमय मुरझा जाते हैं अर्थात् उनकी प्रतिभा कुंठित हो जाती है और उनके भीतर का रचना तत्त्व सदा के लिए विलुप्त हो जाता है। अस्तु बच्चों के अभिभावकों और उनके मार्गदशकों को उनकी रचनात्मक प्रतिभा का. बड़ी सूक्ष्मता से अध्ययन करना चाहिए और फिर तद्नुरूप उसके विकास को दिशा देनी चाहिए । जिन लोगों के दिशावहक नहीं होते हैं उनके जीवन की परिस्थितियाँ स्वयं. उनका दिशादर्शन करती हैं । निराला जी एक ऐसे रचनाकार थे जिनके जीवन की परिस्थितियों ने ही उनमें अन्तस्थ कार्ययित्री प्रतिभा को दिशा दृष्टि दी है।
निराला जी मौलिक रचनाकार थे । उनकी प्रतिभा का विकास विविध क्षेत्रों में हुआ है । यद्यपि वे मूलतः कवि थे । उनके विभिन्न रचनात्मक रूपों में उनका कवि कलाकार ही सबसे ऊपर रहा है। विभिन्न विधाओं में सृजन करने के साथ आलोचना के क्षेत्र में भी निराला जी को अग्रसर होना पड़ा था । यद्यपि वे इस क्षेत्र में आने को उत्सुक नहीं थे तथापि साहित्य जगत की परिस्थितियों ने उन्हें इस दिशा में अग्रसर होने को प्रेरित किया है । निराला जी के साहित्य के प्रवेश करने के समय हिन्दी आलोचना का कोई स्वस्थ स्वरूप नहीं निर्धारित हुआ था । तथाकथित समीक्षक लोग अपनी व्यक्तिगत रुचि और मानदण्डों के अनुसार कृतियों तथा उनके रचयिताओं की आलोचना कर रहे थे । कहने का आशय यह है कि समालोचना का कोई व्यवस्थित व आदर्श रूप न होने के कारण इस दिशा में एक बिखराव की स्थिति थी । निराला जी ने जिस समय काव्य-क्षेत्र में पदार्पण किया उस समय उन्हें कई दिशाओं में संघर्ष करना पड़ा है। पहला संघर्ष तो उन्हें अपने समय की प्रचलित काव्य-रूढ़ियों से करना पड़ा । एक ओर रीतिकालीन कविता का रुग्ढ़ शृंगार नवीन अर्थ-सन्दर्भों में अपनी हीन-भाव भूमि के साथ ब्रज-भाषा के बासी छंदों के बीच उन्हें चुनौती दे रहा था तो दूसरी ओर प्रशंसक तथा आलोचकों का एक दल भी ऐसी रचनाओं की वाहवाही लूटने में लगा हुआ था । निराला जी का दूसरा संघर्ष उस क्षेत्र में था जिसमें द्विवेदी युगीन कवि और आलोचक अपनी बुद्धिवादी दृष्टिकोण के साथ इतिवृत्तात्मक शैली में लिखे काव्य का समर्थन कर रहे थे ।
मैथिली शरण गुप्त, अयोध्यासिंह उपाध्याय, अनूप शर्मा और रामचरित उपाध्याय, आदि इस वर्ग के प्रतिष्ठा प्राप्त कवि थे और अपने समय की पत्र-पत्रिकाओं में इन्हीं का बोलबाला था । उस समय के सम्पादक आलोचकों से भी इन्हें प्रोत्साहन मिलता था । निराला जी की रचनाएँ 'सरस्वती' जैसी पत्रिकाओं में इसीलिए स्थान नहीं पा सकीं, क्योकि उस समय की काव्य-चेतना का निर्माण इसी द्विवेदी युगीन इतिवृत्तात्मक काव्य से हुआ था । निराला जी के संघर्ष का तीसरा पक्ष स्वयं छायावाद तथा उसके प्रशंसकों द्वारा नियोजित था । क्योंकि निराला जी अपने मुक्त छंद के साथ काव्य-भूमि में प्रविष्ट हुए थे और छायावादी कवियों के द्वारा प्रयुक्त छंदों की तुलना में उनका वह छंद अलग से सबका ध्यान आकृष्ट कर रहा था । इस वर्ग ने निराला जी पर आक्षेप किया कि यह बंगला का अनुकरण है और हिन्दी की प्रकृति से इसका मेल नहीं बैठता है। पंत जी द्वारा 'पल्लव की भूमिका में इस प्रकार का आक्षेप किया गया था । इस त्रिकोणात्मक संघर्ष में निराला जी अकेले थे। फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपनी प्रतिरक्षा के साथ प्रहार भी करते हुए संघर्षरत रहे । यही निराला जी के आलोचक स्वरूप के जन्म की पृष्ठभूमि थी । निराला जी ने आलोचना के क्षेत्र में प्रवेश करने से पूर्व अपने कुछ निश्चित सिद्धान्त बनाये और उनके अनुरूप अपनी आलोचना पद्धति का निर्माण किया। वैसे निराला जी कवि के साथ आलोचक कब बन गये इसका शायद उन्हें पूर्वाभास नहीं हुआ होगा परन्तु इस दिशा में उनकी क्रियाशीलता ने जब मूर्त रूप धारण किया तो वे स्वयं चकित रह गये तथा अन्य लोग तो चौंके ही ।
डॉ. निर्मल जिन्दल ने निराला जी जी की आलोचना पद्धति पर दृष्टि निक्षेप करते हुए लिखा है कि उन्होंने 1923 ई. में 'मतवाला' के माध्यम से आलोचना क्षेत्र में प्रवेश किया था तबसे 1945 ई. तक वे निरन्तर इस दिशा में योग देते रहे । 'मतवाला' से लेकर पुस्तक-समीक्षा तक उनके साहित्य में आठ पद्धतियाँ उभरकर आयीं है : स्वच्छंदतावादी आलोचना, समाजशास्त्रीय आलोचना, शोधपरक आलोचना, तुलनात्मक आलोचना, मनोवैज्ञानिक आलोचना, परिचयात्मक आलोचना, व्यंग्यात्मक आलोचना और सैद्धान्तिक आलोचना । स्वच्छन्दतावादी आलोचना 'रवीन्द्र-कविता- कानन' में विशेषतः मुख़ित हुई है । उन्होंने इसमें सौन्दर्यशास्त्र के अतिरिक्तं समाजशास्त्र का भी अ. बार ग्रहण किया है ।
वस्तुतः निराला जी ने जहाँ एक ओर रवीन्द्र की कविताओं के भावात्मक और कलात्मक सौन्दर्य का उद्घाटन किया है, वहाँ दूसरी ओर तत्कालीन समाज में उनकी उपयोगिता पर भी विचार किया है । इस प्रकार इसमें स्वच्छन्दतावादी आलोचना और समाजशास्त्रीय आलोचना का समानान्तर विकास हुआ है । किन्तु 'पन्त और पल्लव' में 'पन्त के शब्द चयन' परिच्छेद के अन्तर्गत केवल सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टिकोण प्रधान रहा है । इसके अतिरिक्त पन्त की कविताओं पर रवीन्द्र का प्रभाव दिखाने के प्रयत्न में शोधपरक आलोचना और दोनों कवियों की परस्पर तुलनात्मक आलोचना प्रमुख रही है। शोधपरक आलोचना 'रवीन्द्र-कविता-कानन' में रवीन्द्र की जीवनी से सम्बद्ध अध्याय में व्यक्त हुई है ।
निराला जी ने आलोचना के अन्तर्गत मनोविज्ञान की नवीन कसौटी को भी प्रश्रय दिया है । परिचयात्मक आलोचना का स्वरूप निराला जी कृत पुस्तक-समीक्षाओं और विविध गद्य-पद्य ग्रन्थों की भूमिकाओं में व्यक्त हुआ है । व्यंग्यात्मक आलोचना 'मतवाला' तथा 'पन्त और पल्लव' में विशेषतया व्यक्त हुई है । सैद्धान्तिक आलोचना की प्रवृत्ति भी निराला जी में पर्याप्त मात्रा में मिलती है, किन्तु उसकी व्याप्ति विशेषत: आलोचनात्मक निबन्धों में हैं। वैसे, 'गीतिका', 'परिमल', की भूमिकाओं तथा 'पन्त और पल्लव' और 'रवीन्द्र-कविता-कानन' में भी निराला जी ने काव्यशास्त्रीय सिद्धान्तों पर अल्प मात्रा में विचार किया है । इन्होंने इसमें मुक्त छंद की स्वरूप व्याख्या का ऐतिहासिक कार्य किया है। 'गीतिका' में गीतिकाव्य की परिभाषा और उसमें संगीत के स्थान आदि का मौलिक विश्लेषण उपलब्ध होता है। इसके अतिरिक्त अन्य ग्रन्थों में काव्य-हेतु, आलोचना आदि से सम्बद्ध सिद्धान्तों पर यत्किंचित प्रकाश डाला गया है।
आलोचक के लिए आलोच्य विषय का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना अत्यावश्यक गुण है इस दृष्टि से निराला जी अपने विषय में सिद्धहस्त थे । उनका बंगला और अंग्रेजी का ज्ञान भी इसमें सहायक था। उनके आलोचक रूप की एक अन्य विशेषता यह है कि वे आलोचना में केवल भावाभिव्यक्ति को नहीं परखते थे, अपितु भाषा के व्याकरण सम्मत रूप के प्रति भी अत्यधिक सतर्क थे । छायावादी कवियों में केवल निराला जी की ही यह विशेषता रही है कि वे शब्द चयन, वाक्य-विन्यास आदि की शुद्धता के प्रति अत्यन्त आग्रही रहे हैं।
निराला जी की आलोचना पद्धति के विभिन्न रूपों पर दृष्टि निक्षेप करने के साथ डॉ. प्रेम प्रकाश भट्ट ने लिखा है कि काव्य-चिन्तन में भी निराला जी ने अपना योगदान किया है।छायावादी कवियों ने अपने काव्य-संग्रहों की भूमिकाओं के रूप में और अन्य साहित्यिक वाद-विवादों में भाग लेकर विचार व्यक्त किये हैं। महादेवी और पन्त जी की भूमिकाओं की तो काफी धूम रही है—'पल्लव' की भूमिका को तो छायावाद का ऐतिहासिक घोषणा-पत्र तक कहा गया है । निराला जी ने छायावाद के विरोध का मुकाबला अकेले किया, वे एक प्रकार से अपने में नवीनता के नवीन प्रयोगों के प्रतीक थे। अपने विचार-प्रधान लेखों में और प्रयोगात्मक आलोचकों में उन्होंने छायावाद की व्याख्या की है। यह विशेष ध्यान देने की बात है कि निराला जी ने कविता के क्षेत्र में आये हुए इस नये आन्दोलन-छायावाद को ऐतिहासिक सन्दर्भ में विश्लेषित किया है। उनके लिए न तो यह भाषागत लाक्षणिक प्रयोगों का आन्दोलन था, न स्थूल के विरुद्ध सूक्ष्म का विद्रोह और न ही किसी बाहरी साहित्यिकवाद का अनुकरण । बल्कि वह सीधे-सीधे विकासशील हिन्दी साहित्य के भीतर से उत्पन्न नवीनता का प्रकाशन था । निराला जी ने अपने विवेचन को छायावाद के पक्ष विशेष पर ही केन्द्रित नहीं किया, बल्कि सम्पूर्ण-आन्दोलन के कला-भाव व भाषा के सभी पक्षों का व्याख्यान बहुत बड़े ऐतिहासिक परिदृश्य का अंग मानकर किया । छायावादी इतिहास को नया साहित्य मानकर पुराने साहित्य से वे उसकी विशेषता इन शब्दों में प्रकट करते हैं "पुराना साहित्य हिन्दी का अच्छा था, पर नया और अच्छा होगा, इस दृष्टि से उसकी साधना की जायेगी । पुराने साहित्य का जितना दायरा था, नये का उससे बहुत अधिक बढ़ गया है ।" इस नये साहित्य-छायावाद के कला-पक्ष का भी निराला जी ने विवेचन किया है । विशेष रूप से मुक्त छंद, उनका कवित्त छंद से सम्बन्ध, उसमें स्वरों का प्रसार तथा उसकी पठनीयता आदि पर निराला जी ने सविस्तार विचार किया है।
काव्य-कला के विवेचन में निराला जी का दृष्टिकोण वाक्य-शास्त्र के रूढ़ सिद्धान्तों से मुक्त हो रहा है। हालाँकि उनके विवेचन में विश्लेषण की ही प्रधानता है, तब भी वे कलाकृति के खण्ड-दृष्टि से देखने के पक्ष में नहीं हैं, बल्कि उसे उसकी सम्पूर्णता में देखने के ही पक्ष में है।
इससे यह स्पष्ट है कि निराला जी जी की आलोचना की दृष्टि कृति के वर्ण्य विषय और उसके अभिव्यंजना-शिल्प अर्थात् उसे सम्पूर्णता में देखने की थी।वस्तुत: वे एक सर्जनात्मक समालोचक थे और रचनाकार के रचना धर्म पर उनकी दृष्टि विशेष रूप से केन्द्रित रहती थी । संक्षेप में कहें तो निराला की आलोचना पद्धति शास्त्रीयता और आधुनिक प्रगतिशील चेतना का अनोखा मिलन है। उन्होंने रामचंद्र शुक्ल के 'लोक-मंगल' के आदर्श को आगे बढ़ाते हुए हिंदी समीक्षा को एक स्वतंत्र, जीवंत और आत्मनिर्भर मार्ग दिखाया।


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