किताबों में महकती ख़ामोशी

SHARE:

उस दिन के बाद राघव ने कभी किसी किताब पर नई जिल्द नहीं चढ़ाई। वह हर शाम उसी खिड़की की तरफ ताकते हुए अपनी दुकान की चौखट पर बैठता रहा, जहाँ अब सिर्फ हवाए

किताबों में महकती ख़ामोशी


हाड़ों की तलहटी में बसे उस छोटे से पुराने शहर में, जहाँ शाम होते ही चीड़ के पेड़ों से ठंडी हवा बहने लगती थी, राघव की पुरानी किताबों की जिल्दसाज़ी की एक छोटी सी दुकान थी। उसी दुकान के ठीक सामने वाले पुराने मकान की खिड़की पर रोज़ शाम अनन्या बैठती थी, हाथ में एक अधूरी डायरी और आँखों में गहरी ख़ामोशी लिए। दोनों के बीच कभी घंटों बातें नहीं हुईं, मगर जब भी अनन्या अपनी पसंदीदा किताबों की उधड़ी जिल्दें ठीक कराने लाती, कागज़ और पुरानी स्याही की सौंधी महक के बीच दोनों की नज़रें चुपचाप एक-दूसरे का पूरा जहाँ पढ़ लिया करती थीं।

किताबों में महकती ख़ामोशीराघव उसके लिए किताबों के पन्नों के बीच अक्सर सूखे हुए गुलमोहर के लाल फूल रख दिया करता था, और अनन्या उन फूलों को अपनी हथेलियों में समेटकर एक हल्की, कृतज्ञ मुस्कान उसकी तरफ उछाल देती। यह प्रेम किसी वादे या इज़हार का मोहताज नहीं था; यह उन अनकही मुलाक़ातों, अधूरी नज़रों और ढलती धूप में चुपचाप खिलता था। राघव जानता था कि अनन्या का स्वास्थ्य अक्सर नासाज़ रहता था, पर उसकी आँखों की चमक हमेशा यह भरोसा दिलाती थी कि सब ठीक रहेगा।

सर्दियों की एक बेहद सर्द सुबह, जब पूरे शहर पर धुंध की मोटी चादर बिछी थी, सामने वाली खिड़की का पर्दा नहीं उठा। राघव की बेचैन नज़रें दिनभर उस बंद खिड़की पर टिकी रहीं, लेकिन शाम ढलते ही अनन्या की जगह उसका छोटा भाई दुकान की चौखट पर आकर खड़ा हो गया। उसने कांपते हाथों से एक भारी, भूरी डायरी राघव को थमा दी। अनन्या उस शहर को और इस नश्वर दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह चुकी थी।

राघव ने उस रात जब डायरी का पहला पन्ना खोला, तो उसकी आँखें आंसुओं से धुंधला गईं। डायरी के हर पन्ने पर वही सूखे गुलमोहर के फूल करीने से चिपके थे, जो उसने बरसों से किताबों में छिपाकर भेजे थे। डायरी के आखिरी पन्ने पर कांपती लिखावट में बस इतना दर्ज था—"तुमने कभी कहा नहीं, मैंने कभी पूछा नहीं, मगर इस पूरी दुनिया में मेरी रूह को अगर किसी ने छुआ, तो वह सिर्फ तुम्हारी ख़ामोशी थी।"

उस दिन के बाद राघव ने कभी किसी किताब पर नई जिल्द नहीं चढ़ाई। वह हर शाम उसी खिड़की की तरफ ताकते हुए अपनी दुकान की चौखट पर बैठता रहा, जहाँ अब सिर्फ हवाएँ अनन्या के नाम का अधूरा, मगर मुकम्मल तराना गुनगुनाती थीं।

COMMENTS

Leave a Reply

इन्हे भी अवश्य पढ़ें -

Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy बिषय - तालिका