मैं बोनसाई बनी अपने छोटे से गमले में जड़ें जमाए स्थिर खड़ी हूं।मैं बच्ची से वसुधा कभी न बन सकूं क्योंकि मैं बोनसाई हूं।
बोनसाई | संस्मरण
यह संस्मरण सन् 1986 में लिखा था।जिंदगी के चालीस साल निकल गए पर कहानी नहीं बदली।वहीं कहानी संस्मरण के रुप में आपके सामने है।वक्त बदल गया है, लड़कियां वहां तक। पंहुच रही है जहां वे जाना चाहती हैं पर यह संस्मरण उस समय का है जब लड़कियों के लिए कोई उड़ान नहीं थी।
बड़े से सीमेंट के गमलों में लगी आम अमरूद और आड़ू। की बोनसाई की कांट छांट मुंदी को करनी पड़ती। बेतरतीब बढ़ती शाखाएं व जड़ें देखने में भद्दी लगतीं।लाॅन में लगे पौधों को पालने पोसने और तराशने का काम मेरा है।कैंची और खुरपी लिए जब तब कुछ न कुछ करती रहती हूं।
किस पौधे पर कब कली आनी है,कब फूल खिलना है, कितनी कलियां हैं, कितने फूल हैं,पानी और खाद कब देना है,कौन सी किस्म अच्छी है और कौन सी खराब,पल भर में सब कुछ बता सकती हूं। पौधों से मुझे लगाव है।अक्सर मुझे लगता है कि लाॅन में खिलने वाले पौधे आंगन में खेल कर बड़े हुए मेरे अपने बेटा बेटी हैं। जिन्हें मैं अपने हाथ से सजाती संवारती हूं और बदलते देख खुशी से झूम उठती हूं।
जब भी मैंने गमले में लगी बोनसाइयों को तराशने के लिए कैंची उठाई है मैं स्वंय गमले में बोनसाई के स्थान पर जाकर खड़ी हो गई हूं।मेरी बुद्धि और तर्कों ने या कहूं मेरी स्थिति ने मुझे ही बोनसाई बना दिया है। जाने क्यों मुझे हर लड़की अपनी ही तरह गमले में उगी बोनसाई ही नजर आती है।
मैंने बहुत बार मन से तर्क किया है,इस विचार को झिड़क कर निखिल फेंकना चाहा है,पर जहां नारी समानाधिकार की बात आदर्श की बलुई सतह से उठकर यथार्थ से टकराती है तो सब बिखर जाता है।झूठ की डोर भी टूट जाती है।
जन्मते ही लड़की के चारों ओर रीति रिवाजों, संस्कारों और वर्जनाओं की एक अभेद्य ऊंची दीवार खिंच जाती है।जबकि लड़कों के लिए विस्तृत धरती औरआकाश की असीम ऊंचाइयां जैसा स्वच्छ आकाश सामने रहता है।उनके लिए हवा और पानी में कोई घुटन नहीं है।
मैंने इस सतही अंतर को होगा है और आज भी बोनसाई बनी घरनुमा सीमेंट के गमले में खड़ी हूं।जाने कितने मौसम बदले,वसंत आए और चले गए, मैंने जब भी अपने व्यक्तित्व को निखारना संवारना चाहा,जब भी वृक्ष बनकर शीतल छांव देनी चाही तब बड़ी बेरहमी से मेरी महत्वकांक्षाओं की शाखाएं संस्कारों और मान्यताओं की दुहाई देकर काट डालीं गई और मैं मात्र औसत मध्यम दर्जे की,समय से लड़ती जूझती,जीवन को ढोती एक अकिंचन नारी ही रह गई।
बचपन के वे दिन कितने आह्लादित थे,खेल खेल में कब पढ़ लेती पता ही न चलता।बचपन फुर्र से उड़ गया।कालेज में कदम रखा तो महत्वकांक्षाओं के ताने-बाने सुनने लगी। क्योंकि मैं स्वंय को भावी वृक्ष ही समझती थी।
मुझे पता ही न चला कब वर्जनाओं का घेरा मेरे चारों तरफ डाल दिया गया। पहली बार मां ने टोका-"बच्ची,अब तू इतनी छोटी नहीं रही कि दो चोटियों में रिबिन डाल कर फूल बांधे।कालेज जाने लगी है।सीधी सी छोटी किया कर।और याद रख अब स्कर्ट नहीं सलवार सूट चलेगा।
चौंक कर मैंने हैरत से मां की तरफ देखा।मैं बड़ी हो गई हूं यह भी मां बताएंगी।यदि ऐसा है तो मैं अभी तक मां के लिए बच्ची क्यों हूं। मां पूरा नाम लेकर क्यों नहीं बुलाती।एक साथ ऐसे ही छोटे बड़े प्रश्न मेरे मन में उठे थे। मुझे बड़ा अटपटा लगा था।घंटों दर्पण में स्वयं को निहारा था। मुझे स्वयं में कोई परिवर्तन नजर नहीं आया।रोज ही तो दर्पण में स्वयं को निहारा करती हूं। मां ने किसी विशेष दृष्टिकोण से मुझे देखा होगा।ऐसा सोचकर मन को तसल्ली दी।
"अब तुम असीम के साथ मत खेला करो"-एक दिन मां ने टोका।
"क्यों मां अब क्या हो गया है।बचपन से ही तो साथ खेलते आ रहे हैं।"-मैने प्रतिवाद किया।
"वह लड़का है और तू लड़की "-मां ने तीखी आवाज में कहा।
"तो क्या हुआ।रीतेश भी तो लड़का है।मेरा भाई है। मुझसे दो साल बड़ा है।जब रीतेश के साथ खेल सकती हूं तो असीम के साथ क्यों नहीं?"
और तभी मेरी जिज्ञासा का समाधान एक झन्नाटेदार थप्पड़ से हुआ।डाल पर पड़े चांटे की पीड़ा को भूल मैं हतप्रभ सोच रही थी कि मैंने क्या ग़लत कहा था? कहां भूल कर दी थी।क्या लड़कियों की बात का जबाब ऐसे ही दिया जाता है।
हाई स्कूल के बाद जब इंटर में आई और बात विषय चुनने की हुई तो मुझे अच्छी तरह याद है पिता जी ने कहा था-"बच्ची, विज्ञान लेकर क्या करेगी। हमें कौन नौकरी करानी है।बस साहित्य लेकर पढ़ो।"
पिताजी ने एकतरफा निर्णय दे दिया। मुझसे पूछने की जरूरत किसी को न थी।जबकि हाई स्कूल में मैंने सबसे अधिक अंक पाए थे।मैं तिलमिला उठी थी।मेरी महत्वकांक्षाओं पर पहला प्रहार था।
साहित्यिक वर्ग की छात्रा बन इंटर में प्रवेश लिया।मेरी दबी महत्वकांक्षाएं कालेज की प्रतियोगिताओं में मुखरित होने लगी।मैं शीघ्र ही कालेज की अध्यापिकाओं की नजरों में चढ़ गई। मकड़ी की जाली की तरह सपने बुनने लगी।मैं जहां ऊपर आकाश में उड़ने का प्रयास करती वहीं मर्यादा की दुहाई देकर मुझे ज़मीन पर ला पटका जाता।मैं आहत हो उठती।यही खेल बी.ए. तक आंख मिचौली करता रहा।
मैं चाहती थी कि बी.ए.के बाद एम.ए.करुं और फिर पी.एच.डी.।पर तभी उसी वर्ष मुझे दुल्हन बना डोली में बिठा बिदा कर दिया गया।मेरी महत्वाकांक्षाओं की शाखाएं काट डालीं गई।मैं सचमुच बोनसाई बना सीमेंट की चारदीवारी में रोप दी गई।पर बच्ची से सुधा ने बन सकी। मां ने मरते समय भी मुझे बच्ची कहकर ही पुकारा।अनन्त अपने पति के लिए भी मैं बच्ची ही रही।
बोनसाई की तरह एक सीमित दायरे में भी फली फूली, खुशबू फैलाई।अपना व्यक्तित्व बिल्कुल दब गया।हां सीमेंट की गमले नुमा चारदीवारी, जिसे घर भी कहते हैं,का महत्व बढ़ गया।सास द्वारा नियम कायदों की एक लम्बी सूची मुझे थमा दी गई।
यहां एक वाकया का जिक्र करुंगी।जब डोली से उतरी और ससुराल में पहला भोजन परोसा गया तो सास नन्द रबड़ी की कटोरी उठाकर अपने हाथ से खिला रही थीं।यह उनका लाड़ था और मेरा संकोच कि मैं नहीं खा रही थी। पुनः ससुराल गयी और यह सोचकर कि जो भी खिलाएंगी निःसंकोच खा लूंगी,पर वह रबड़ी की कटोरी फिर सामने नहीं आई।सासू मां घर दिखाकर कि ये रसोई है,यह गुसलखाना है ये बैठक है-गुम हो गई और मैं हमेशा के लिए सफाई वाली,भोजन बनाने वाली बन गई।
शादी से पहले कैंची मां बाप के साथ में थी,उसके बाद पति, ससुराल और पूरे समाज के हाथों में आ गयी।सब अपनी अपनी तरह काटते छांटते,मैं अपनी तरह से जीना क्या अपनी रुचि ही भूल गयी।जो पति और पति के परिवार की पसंद होती वहीं मेरी भी।मेरा व्यक्तित्व अस्तित्व हीन हो गया। मुझसे सभी को अपेक्षाएं हो गई,सबकी ख़ुशी मेरी खुशी हो गई।मैं मैं न रहकर सबमें घुल गई।बच्ची अपने लिए जीना भूल एक बोनसाई बना गमले में समा गयी।
जैसे एक पेड़ को बोनसाई बना गमले में रोप देते हैं, मुझे भी किसी ने अपने नाम के अनुरूप ढलने नहीं दिया।मैं बोनसाई बनी अपने छोटे से गमले में जड़ें जमाए स्थिर खड़ी हूं।मैं बच्ची से वसुधा कभी न बन सकूं क्योंकि मैं बोनसाई हूं।
- सुधा गोयल
290-ए, कृष्णानगर, डा दत्ता लेन, बुलंदशहर -203001
मोबाइल नंबर -9917869962


COMMENTS