भारत की विदेश नीति स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से ही विश्व राजनीति में एक विशिष्ट पहचान बनाने का प्रयास करती रही है।
भारत की विदेश नीति : गुटनिरपेक्षता से बहुध्रुवीय कूटनीति तक
भारत की विदेश नीति स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से ही विश्व राजनीति में एक विशिष्ट पहचान बनाने का प्रयास करती रही है। 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब विश्व दो महाशक्तियों — संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ — के बीच शीत युद्ध की छाया में बंटा हुआ था। ऐसे समय में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने यह निर्णय लिया कि भारत किसी भी सैन्य गुट का हिस्सा नहीं बनेगा और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का निर्माण करेगा। इसी सोच से गुटनिरपेक्षता की अवधारणा जन्मी, जो आगे चलकर भारत की विदेश नीति की आधारशिला बनी।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन का औपचारिक स्वरूप 1961 में बेलग्रेड सम्मेलन में सामने आया, जिसमें भारत के साथ यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो, मिस्र के जमाल अब्दुल नासिर, इंडोनेशिया के सुकर्णो और घाना के क्वामे नक्रूमा जैसे नेताओं ने मिलकर एक नई शक्ति समूह की नींव रखी। इसका मूल उद्देश्य यह था कि नवस्वतंत्र राष्ट्र किसी महाशक्ति के प्रभाव में आए बिना अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप निर्णय ले सकें और वैश्विक शांति, निरस्त्रीकरण तथा उपनिवेशवाद-विरोध जैसे मुद्दों पर स्वतंत्र रूप से अपनी आवाज उठा सकें। गुटनिरपेक्षता का अर्थ तटस्थता नहीं था, बल्कि यह एक सक्रिय और सिद्धांतवादी नीति थी जिसके तहत भारत प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर अपने विवेक और नैतिक दृष्टिकोण के आधार पर रुख अपनाता था। पंचशील के सिद्धांत, जिनमें एक-दूसरे की प्रादेशिक अखंडता और संप्रभुता का सम्मान, अनाक्रमण, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना, समानता और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व शामिल थे, इसी नीति के दार्शनिक आधार बने।
शीत युद्ध के दौर में भारत की गुटनिरपेक्ष नीति की कई बार परीक्षा हुई। 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1965 तथा 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों जैसी परिस्थितियों ने भारत को अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने के लिए विवश किया। 1971 में भारत ने सोवियत संघ के साथ शांति, मित्रता और सहयोग की संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसे कई विश्लेषक गुटनिरपेक्षता से एक व्यावहारिक विचलन मानते हैं, यद्यपि भारत ने औपचारिक रूप से गुटनिरपेक्ष आंदोलन की सदस्यता कभी नहीं छोड़ी। इस दौर में भारत ने आर्थिक क्षेत्र में भी आत्मनिर्भरता और नियोजित विकास की नीति अपनाई, जिसका सीधा प्रभाव उसकी विदेश नीति पर भी पड़ा, क्योंकि सीमित संसाधनों और घरेलू प्राथमिकताओं के चलते भारत वैश्विक मंच पर सैन्य रूप से अधिक मुखर नहीं हो सका।
1991 में सोवियत संघ के विघटन ने विश्व राजनीति की संपूर्ण संरचना को बदल दिया। शीत युद्ध की समाप्ति के साथ ही द्विध्रुवीय व्यवस्था का अंत हो गया और संयुक्त राज्य अमेरिका एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा। इस भूराजनीतिक परिवर्तन ने गुटनिरपेक्षता की मूल अवधारणा को ही अप्रासंगिक बना दिया, क्योंकि अब कोई गुट शेष नहीं रहा जिससे निरपेक्ष रहा जाए। ठीक इसी समय भारत गंभीर आर्थिक संकट से भी जूझ रहा था, जिसके परिणामस्वरूप 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में आर्थिक उदारीकरण की नीतियां लागू की गईं। इस आर्थिक खुलेपन ने भारत की विदेश नीति की दिशा को भी मौलिक रूप से प्रभावित किया, क्योंकि अब विदेश नीति केवल राजनीतिक और सामरिक हितों तक सीमित न रहकर आर्थिक कूटनीति, व्यापार, निवेश और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण जैसे आयामों को भी समाहित करने लगी।
1990 के दशक के उत्तरार्ध और 2000 के दशक में भारत ने धीरे-धीरे अपनी विदेश नीति को व्यावहारिकता और बहुआयामी सोच की ओर मोड़ना शुरू किया। इसी दौर में भारत ने पूर्वी एशिया के साथ संबंधों को प्राथमिकता देते हुए 'लुक ईस्ट' नीति अपनाई, जो बाद में नरेंद्र मोदी सरकार के समय 'एक्ट ईस्ट' नीति में विकसित हुई। 1998 में पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद भारत ने स्वयं को एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया, और आगे चलकर 2005 में अमेरिका के साथ ऐतिहासिक असैन्य परमाणु समझौते ने भारत-अमेरिका संबंधों में एक नए युग की शुरुआत की। यह इस बात का प्रमाण था कि भारत अब शीत युद्धकालीन हिचकिचाहट को त्यागकर व्यावहारिक हित-आधारित कूटनीति की ओर बढ़ रहा था।
इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में विश्व व्यवस्था में एक नया परिवर्तन दिखाई देने लगा। अमेरिका का एकध्रुवीय प्रभुत्व धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा, जबकि चीन एक आर्थिक और सैन्य शक्ति के रूप में तेजी से उभरा। इसके साथ ही रूस, यूरोपीय संघ, जापान और भारत जैसे कई अन्य केंद्र भी वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में अपनी भूमिका सुदृढ़ करने लगे। इस प्रकार विश्व एक बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर अग्रसर हुआ, जिसमें शक्ति किसी एक या दो केंद्रों में केंद्रित न होकर कई राष्ट्रों और क्षेत्रीय समूहों में बंटी हुई है। इस बदलते परिदृश्य में भारत ने स्वयं को एक महत्वपूर्ण और स्वतंत्र ध्रुव के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है।
वर्तमान भारतीय विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह किसी एक विचारधारा या गुट से बंधी नहीं है, बल्कि 'रणनीतिक स्वायत्तता' के सिद्धांत पर आधारित है। भारत आज एक साथ अमेरिका, रूस, यूरोपीय संघ, जापान, इजरायल और खाड़ी देशों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए हुए है, जबकि चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों का मिश्रित संबंध बनाए रखता है। भारत क्वाड जैसे मंच का हिस्सा है, जो अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए कार्य करता है, और साथ ही ब्रिक्स तथा शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों का भी सक्रिय सदस्य है, जहां रूस और चीन जैसे देश प्रमुख भूमिका निभाते हैं। यह विरोधाभासी प्रतीत होने वाला संतुलन वास्तव में भारत की बहुध्रुवीय कूटनीति की सबसे बड़ी शक्ति है, जिसके माध्यम से भारत हर प्रमुख शक्ति के साथ संबंध बनाए रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को अधिकतम करने का प्रयास करता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत का रुख इस नई कूटनीतिक परिपक्वता का सबसे स्पष्ट उदाहरण रहा है। पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद भारत ने रूस के साथ अपने पारंपरिक संबंधों को बनाए रखा और सस्ते दामों पर तेल आयात जारी रखा, जबकि साथ ही युद्ध की समाप्ति और संवाद के माध्यम से समाधान की वकालत करता रहा। इस नीति ने यह सिद्ध किया कि भारत अब किसी बाहरी दबाव में आकर अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करता, बल्कि अपनी शर्तों पर संबंध स्थापित करता है। इसी प्रकार वैश्विक दक्षिण के देशों के प्रतिनिधि के रूप में भारत ने जी-20 की अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो यह दर्शाता है कि भारत आज केवल अपने हितों तक सीमित न रहकर विकासशील देशों की आवाज को भी वैश्विक मंच पर प्रभावी ढंग से रख रहा है।
आर्थिक कूटनीति भी वर्तमान भारतीय विदेश नीति का एक अभिन्न अंग बन चुकी है। आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसी पहलों के माध्यम से भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी भूमिका को सुदृढ़ करने का प्रयास कर रहा है, विशेष रूप से उस दौर में जब कई देश चीन पर अत्यधिक निर्भरता कम करना चाहते हैं। प्रवासी भारतीय समुदाय, जो विश्व के विभिन्न देशों में फैला हुआ है, भी भारत की सॉफ्ट पावर कूटनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। इसके अतिरिक्त जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद-विरोध, आपदा प्रबंधन और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना जैसे क्षेत्रों में भारत ने वैश्विक नेतृत्व प्रदान करने का प्रयास किया है, जैसा कि अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की स्थापना और कोविड-19 महामारी के दौरान वैक्सीन मैत्री कार्यक्रम में देखा गया।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि भारत की विदेश नीति ने अपनी स्थापना काल की आदर्शवादी गुटनिरपेक्षता से आरंभ होकर आर्थिक उदारीकरण के दौर से गुजरते हुए वर्तमान की व्यावहारिक और बहुध्रुवीय कूटनीति तक एक लंबी और महत्वपूर्ण यात्रा तय की है। यह परिवर्तन केवल वैश्विक परिस्थितियों के अनुकूलन का परिणाम नहीं है, बल्कि भारत की उस मूल सोच की निरंतरता भी है जो प्रारंभ से ही स्वतंत्र निर्णय क्षमता, राष्ट्रीय हितों की प्राथमिकता और वैश्विक शांति में योगदान पर आधारित रही है। आज का भारत किसी गुट का अनुयायी नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में एक आत्मविश्वासी और प्रभावशाली भागीदार है, जो अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए वैश्विक मंच पर अपनी उपस्थिति को निरंतर सुदृढ़ कर रहा है।


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