मोहन राकेश द्वारा रचित प्रसिद्ध नाटक 'आधे अधूरे' में बिन्नी (बड़ी बेटी) एक अत्यंत महत्वपूर्ण और जटिल पात्र है।
आधे अधूरे नाटक में सावित्री की बेटी बिन्नी का चरित्र चित्रण
मोहन राकेश द्वारा रचित प्रसिद्ध नाटक 'आधे अधूरे' में बिन्नी (बड़ी बेटी) एक अत्यंत महत्वपूर्ण और जटिल पात्र है। वह आधुनिक मध्यवर्गीय परिवार की पारिवारिक घुटन, दांपत्य जीवन के असंतोष और अतीत के साये में जीने की त्रासदी का प्रतिनिधित्व करती है।
बीना अर्थात् बिन्नी 'आधे-अधूरे' का एक महत्वपूर्ण सहायक चरित्र है। वह ऐसे वातावरण में पली-बढ़ी लड़की है, जिसके माँ-बाप अर्थात् महेन्द्रनाथ और सावित्री कभी समृद्ध थे और वे उनकी यह लाड़ली बेटी बड़े स्वच्छन्द-रूप से उस समृद्धि का आनन्द लेती थी, लेकिन अब घर की समृद्धि चली गई। माँ नौकरी करने लगी और पिता एक नाकारा जीवन जी रहा है। इसके अतिरिक्त परिवार के सदस्यों में परस्पर कोई सामंजस्य नहीं, कोई आपसी सौहार्द्र भी नहीं। नाटककार उसका परिचय इन शब्दों में देता है- "बड़ी लड़की। उम्र बीस से अधिक नहीं। मन में परिस्थितियों से संघर्ष का अवसाद और उतावलापन। कभी-कभी उम्र से बढ़कर बड़प्पन। साडी : माँ से साधारण । व्यक्तित्व में बिखराव ।" इस रूप-रेखा में साड़ी आदि का ब्यौरा तो बाह्य परिस्थितिजन्य स्थितियों का द्योतक है, जबकि 'मन में अवसाद और उतावलापन' जैसे शब्द उसके अन्तःचरित्र की संकेतक रेखाएं हैं। 'उम्र से बढ़कर बड़प्पन-जैसी अभिव्यक्ति इस बात की परिचायक है कि दह ऐसी सन्तान है, जिसने अपने घर के बड़ों का कभी उचित आदर-सम्मान न किया हो, अर्थात् सामाजिक शील का, जिसमें अभाव हो और 'व्यक्तित्व में बिखराव' शायद उसी तरह जैसा बिखराव उसकी माँ में है। 'नाटककार' अवश्य इन शब्दों में यही बताना चाहता है। यह रूप-रेखा बड़ी लड़की बिन्नी या बीना को अपनी माँ के चरित्र से कुछ अलग देखने की प्रेरणा नहीं देती, बल्कि लगता यही है कि वह अपनी माँ का ही युवा-संस्करण है। उसके व्यक्तित्व एवं चरित्र का निर्माण किन परिस्थितियों में हुआ है, उसी के शब्दों में पढ़कर उसके मनोवैज्ञानिक पहलुओं को समझा-परखा जा सकता है। नाटक के अन्त के पृष्ठों में वह कहती है-
"आप नहीं जानते, हमने इन दोनों के बीच क्या-क्या गुजरते देखा है घर में।में यहाँ थी, तो मुझे कई बार लगता था कि मैं एक घर में नहीं, चिड़ियाघर के एक पिंजरे में रहती हूँ जहाँ आप शायद सोच भी नहीं सकते कि क्या-क्या होता रहा है, यहाँ । डैडी का चीखते हुए मम्मी के कपड़े तार-तार कर देना उनके मुँह पर पट्टी बाँधकर उन्हें बन्द कमरे में पीटना चीखते हुए गुसलखाने में कमोड पर खींचकर ले जाना (सिहरकर) मैं तो बयान भी नहीं कर सकती कि कितने-कितने भयानक दृश्य देखे हैं इस घर में मैंने। कोई भी बाहर का आदमी उस सबको देखता-जानता, तो यही कहता कि क्यों नहीं बहुत पहले ये लोग ?
ऐसी निरीह एवं अस्वाभाविक परिस्थितियों में पलने वाली एक नवयुवंती, जिसमें उम्र के साथ आकांक्षाएँ जन्म लेने लगती हैं, किस प्रकार की घुटन महसूस करती होगी, सोचा जा सकता है। माँ-बाप में से शायद कोई ऐसा नहीं जो अपनी नवयुवती बेटी की ओर देखे। अतः उसके स्वभाव में एक विद्रोह पैदा हो जाना स्वाभाविक ही था। चूँकि उसमें उम्र से बढ़कर बड़प्पन है, तो अहं की मात्रा भी बहुत होगी। उसे वह घर भी क्यों सुहाने लगा। घर उसे एक चिड़ियाघर-सा लगने लगा था और वह उस घर में रहना भी नहीं चाहती। शादी की उम्र है उसकी। बचपन में यदि कोई अभाव नहीं रहा हो, तो जवानी की ओर बढने वाली लडकी में कितना विक्षोभ होगा, अभावों से या घर से वह अवसर पाते ही, अपनी माँ के प्रेमी मनोज के साथ घर से भाग निकलती है। तभी तो उसका युवक भाई अशोक, उसके इस पलायन को प्रेम नहीं मानता, बल्कि घर से निकल भागने का एक जरिया या बहाना कहता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बिन्नी के बारे में इस प्रेम-सम्बन्ध और घर से पलायन को अशोक के शब्दों में उचित ही कहा जायेगा। तभी तो बिन्नी मनोज के साथ जाकर भी निभाव नहीं कर पाती। जिस असाधारण पारिवारिक परिवेश में वह पली थी, वह असाधारणता ससुराल में भी बनी रहती है। मनोज के साथ रहकर भी वह साथ नहीं रह पाती। माँ के समान वह भी अवसर पाते ही मनोज के प्रति निर्मम हो उठती है।
मन के असंगत-विद्रूप गुब्बारे छोड़ती रहती है। घर में उसके माँ-बाप परस्पर उत्पीड़न का आनन्द भोगते रहे हैं, अब ससुराल में जाकर बिन्नी भी उसी सब में अधूरे अहं की तुष्टि खोजने में ही जीवन की सार्थकता मान लेती है। एक ओर तो बिन्नी यह जानती और मानती है कि जिस अस्वाभाविक वातावरण में उसका निर्माण हुआ है, उसी ने अन्तदृष्टि से उसके व्यक्तित्व का विद्रूप बना दिया है, पर वह अपने पति के सामने यह सब स्वीकार नहीं करना चाहती। मनोज बिन्नी के ही शब्दों में अक्सर दृढ़ता के साथ कहा करता है उससे- "ऐसे में वह एक ही बात कहता है कि मैं इस घर से ही अपने अन्दर कुछ ऐसी चीज लेकर गई हूँ, जो किसी भी स्थिति में मुझे स्वाभाविक नहीं रहने देती ।"
मनौवैज्ञानिक दृष्टि से बिन्नी के बारे में मनोज के विचार शायद सत्य हैं। क्या लेकर आई है वह घर से? क्या पूरी न होने वाली महत्त्वाकांक्षायें या फिर मनोज कुछ और कहना चाहता है उससे, जो वह स्पष्ट नहीं कह पाता। उसने स्वयं उसकी माँ को अपनी प्रेमिका के रूप में देखा है, उसे जाना है, समझा भी है, अतः वास्तव में वह क्या कहना चाहता है? क्या यह कि जिस तरह उसकी माँ, अपने पति के होते हुए भी दूसरे लोगों से सम्बन्ध रखती है, बिन्नी भी वैसी ही है। या फिर मनोज के साथ रहकर उसने र भी समझ लिया है, जिस दशा में मनोज है, वह उसे आधुनिक जीवन की भौतिक सुख-सुविधाओं का जीवन व्यतीत करने की तृषित आकांक्षाओं की तृप्ति नहीं कर सकेगा। इसी कारण उसकी दृष्टि में मनोज भी आधा-अधूरा व्यक्ति बनकर रह गया है या फिर बिन्नी आन्तरिक दृष्टि से घर-परिवार की टूटन, घुटन और कुढ़न को ही साथ लेकर उसके साथ गई थी, तभी तो मनोज जैसे व्यक्ति के साथ भी वह निभाव नहीं कर पाती। वह स्वयं भी तो (माँ सावित्री के समान ही) नहीं जानती कि आखिर वह चाहती क्या है? इसी कारण वह स्वयं में अस्पष्ट है और स्वीकार कर लेना चाहती है कि उसकी अस्वाभाविकता और निर्वाहहीनता का कारण उसका अपना यह घर ही है। वह माँ सावित्री से स्पष्टतः कहती है-
"क्योंकि मुझे कहीं लगता है कि कैसे बताऊँ क्या लगता है? वह जितने विश्वास के साथ यह बात कहता है, उससे उससे मुझे अपने से एक अजब-सी चिढ़ होने लगती है। मन करता है मन करता है आस-पास की हर चीज को तोड़-फोड़ डालूँ जिससे जिससे उसके मन को कड़ी से कड़ी चोट पहुँचा सकूँ। उसे मेरे लम्बे बाल अच्छे लगते हैं। इसलिए सोचती हूँ इन्हें ही जाकर कटा आऊँ कुछ भी ऐसी बात करूँ जिससे एक बार तो वह अन्दर से तिलमिला उठे। पर कर मैं कुछ भी नहीं पाती और जब नहीं कर पाती तो खीझकर।"
वह स्वयं भी शायद अपनी खीझ और कुण्ठाओं का कारण समझने-सोचने या ढूँढ़ने में असमर्थ-सी दिखाई देती है और ऐसा प्रतीत होता है मानो सावित्री का ही समूचा व्यक्तित्व बिन्नी में साकार हुआ है। वह अपने घरेलू संस्कार त्याग पाने में असमर्थ रहने के कारण ही खीझ एवं कुढ़न से भरी रहती है। वह न केवल अपने पति मनोज को ही अपनी इच्छा से संचालित करने की चेष्टा करती है, बल्कि कई बार अपनी माँ तक को असन्तुलन में भी सन्तुलित बनाने का प्रयत्न करती है। फिर अशोक और किन्नी तो उसके छोटे भाई-बहन हैं, उन पर यदि वह अपने को थोपने का प्रयत्न करे तो आश्चर्य ही क्या। ये सारे प्रयत्न उसके व्यक्तित्व एवं कृतित्व में असंगतियों, भ्रान्तियों और विकृतियों को ही मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बढ़ावा देने वाले प्रमाणित होते हैं, उसका अपना घर-संसार (ससुराल) बिखर रहा है, इस बात से नाटककार ने उसे उतना अधिक चिन्तित नहीं दिखाया है, जितना कि अपने मायके के परिवार के बिखराव एवं विघटन से। यह उसके चरित्र की एक विचित्र-सी विडम्बना है विवाह के बाद भी अपनी आन्तरिक चिन्ता के कारण ससुराल से नहीं, मायके से ही अधिक जुड़ी रहती है। वहाँ से बार-बार भागकर वह मायके का रुख करती है और इस प्रकार सम्भवतः वह मनोज के मन पर ही चोट पहुँचाने का प्रयत्न करती है।
जिस प्रकार विन्नी की माँ सावित्री को शादी के तत्काल बाद यह लगने लगता है कि वह (महेन्द्रनाथ) लिजलिजा आदमी है, अपने-आप में घर-घुसरा और अधूरा आदमी है, उसी प्रकार बिन्नी भी मनोज को कुछ वैसा ही, शादी के बाद कुछ अन्य-सा लगने वाला आदमी महसूस करने लगी है, फिर भी उसके शब्दों में- "ममा, ऐसा भी होता है क्या कि ....कि दो आदमी जितना ज्यादा साथ रहें, एक हवा में साँस लें, उतना ही ज्यादा अपने को एक-दूसरे से अज़नबी महसूस करें?" सो वह अपने घर की हवा से घुटकर भागी, यहाँ उसे चिड़ियाघर की-सी अनुभूति हुआ करती थी, अतः चली गई। पर बाहर की हवा भी उसे रास नहीं आ पाई - क्यों? क्योंकि नाटककार उसके चरित्र में मनोवेज्ञानिक ढंग से झाँकता है और उसकी वितृष्णा के कारणों की खोज वह उसकी माँ के घर में करता है, इससे यही आभासित होता है कि उसका निर्माण और पोषण जिन तत्वों से तथा जिस वातावरण में हुआ है, वह उसे कहीं भी अपने-आपको एडजस्ट नहीं करने देता । अतः घुटन, भटकाव और बिखराव ही उसकी नियति बन जाता है। वह अपनी इस नियति को समझती है, वह महसूस करती है, फिर भी समझना और महसूस नहीं करना चाहती या फिर यह सब उसकी समझ और महसूस करने की शक्ति के बाहर है। सम्भवतः वह एक ऐसा चरित्र है, जो असंयत, सन्तुलनरहित और उद्देश्यरहित-सा दिखाई देता है। क्या वास्तव में ऐसा हुआ है कि उसे जो बनना चाहिए, जो उसे पाना चाहिए, वह पाती औन न ही जिसे पाना चाहती है, उसे पाती है। आखिर यह बाधा कहाँ है, क्या है और क्यों है जो कि उसके दम को घोंट रही है? वह अपनी माँ से असहाय-सी बनकर पूछती है-
.....और मैं आती हूँ कि एक बार फिर खोजने की कोशिश कर देखूँ कि क्या चीज है वह इस घर की जिसे लेकर बार-बार मुझे हीन किया जाता है तुम बता सकती हो ममा, कि क्या चीज है वह? और हाँ है वह? इस घर की खिड़कियों, दरवाजों में? छत में? दीवारों में? तुम में? डैडी में? किन्नी में? अशोक मैं? कहाँ छिपी है वह मनहूस चीज जो वह कहता है कि मैं घर से अपने अन्दर लेकर गई हूँ ?"
बताए कौन उसे? यही गुबार उसे घेरे रहता है, चैन से नहीं बैठने देता और वह भागती है, वापिस वहीं, जहाँ से उसे वह आन्तरिक अधूरापन मिला है। यह वापिसी, यह प्रत्यावर्तन, यहाँ-से-वहाँ की आवाजाही, इसी में उसके जीवन को चूक जाना है। इसका उत्तर नाटककार के पास नहीं है। न नाटककार के पास इसका कोई ऐसा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है कि बिन्नी के चरित्र में वह क्या स्पष्ट करना चाहता है। क्या केवल यह कि सावित्री ने जो कुछ जीवन में पाया है, लेखक उसको उसी का प्रतिफल सिद्ध करने के लिए नाटक में उसकी सृष्टि करता है? भले ही यह चेष्टा की जाये कि बिन्नी सावित्री' और महेन्द्रनाथ के टूटे हुए परिवार की उपज होने के कारण, वैसी हो गई है, जैसी उसे दिखाया गया है-अर्थात् एक परिवार की टूटन को दूसरे परिवार में पहुँचाने वाली या फिर दूसरे परिवार में भी अपने अविवाहित जीवन-काल के संस्कारों से दूसरे परिवार में पहुँचकर भी स्वयं में ही और टूटने वाली। इसके पीछे मान्यता कुछ भी हो सकती है, परन्तु एक मनोवैज्ञानिक अस्पष्टता तो साफ दिखाई देती है। हम केवल यह समझ पाते हैं कि लेखक उसे अपने माँ-बाप के टूटे परिवार मात्र के उत्पाद के रूप में प्रस्तुत करना चाहत है, जैसे उसके पास अपना कुछ नहीं कोई अपना व्यक्तित्व नहीं। न अपने वैवाहिक जीवन को, जो एक नये जीवन में प्रवेश करने वाली लड़की के हृदय में होना चाहिए, देने के लिए उसके पास कुछ है और यदि कुछ है भी तो यही समझने की चिन्ता कि वह ऐसा क्या लेकर आई है, अपनी मा के घर से, जो कि उसे हीन बनाता जा रहा है। शायद इस बात को लेकर लेखक भी नहीं जानता, अन्यथा वह इसे अवश्य स्पष्ट कर देता और बिन्नी के चरित्र को पूर्ण बना देता ।
संक्षेप में, बिन्नी का चरित्र 'आधे अधूरे' नाटक की उस मूल संवेदना को उजागर करता है जिसमें पुरानी पीढ़ी के टूटे हुए रिश्तों का प्रभाव नई पीढ़ी के जीवन और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक रूप से पड़ता है। वह आधुनिक नारी की उस दुविधा का प्रतीक है जो स्वतंत्रता और प्रेम चुनने के बावजूद आंतरिक पूर्णता और शांति हासिल नहीं कर पाती।


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