भारत की जनता को आज केवल एक ऐसी राष्ट्रीय चेतना की आवश्यकता नहीं है, जो राष्ट्र की कल्पना एक माँ के रूप में करे; उसे एक पिता की नैतिक उपस्थिति की आवश्य
भारत माता और राष्ट्रपिता की अनिवार्यता !
भारत की जनता को आज केवल एक ऐसी राष्ट्रीय चेतना की आवश्यकता नहीं है, जो राष्ट्र की कल्पना एक माँ के रूप में करे; उसे एक पिता की नैतिक उपस्थिति की आवश्यकता है। और उस पिता का नाम है मोहनदास करमचंद गांधी।
‘भारत माता’ की संकल्पना भारतीय देशभक्ति में गहराई से रच-बस चुकी है, लेकिन वह अनिवार्य नहीं है। मातृभूमि को माँ के रूप में देखने में प्रेम है, त्याग है और भावनात्मकता भी है। लेकिन जब किसी राष्ट्र की कल्पना केवल एक माँ के रूप में की जाती है, तब उसके नागरिकों को अक्सर संतानों की भूमिका में रख दिया जाता है। संतान अपनी माँ से प्रेम और उसकी पूजा तो कर सकती है, लेकिन जहाँ प्रश्न करना आवश्यक हो, वहाँ प्रश्न न करने की संभावना भी इसी संबंध में छिपी रहती है।
एक लोकतांत्रिक राष्ट्र को मातृ-स्नेह से अधिक ऐसी पितृ-सदृश नैतिक उपस्थिति की आवश्यकता है, जो नागरिकों को प्रश्न करना सिखाए।
गांधीजी ऐसे ही पिता थे।
उन्होंने भारतीयों से अंध आज्ञापालन की अपेक्षा नहीं की। इसके विपरीत, उन्होंने सत्ता के सामने भी सत्य बोलने का साहस सिखाया। वे ऐसे महामानव थे जिन्होंने अपने शरीर को हथियार बनाने के बजाय सत्य और अहिंसा को राजनीति के साधन में रूपांतरित किया। उनकी राजनीति सत्ता हथियाने की रणनीति से अधिक सत्ता को नैतिक कसौटी पर प्रश्नांकित करने का मार्ग थी।
गांधीजी को ‘राष्ट्रपिता’ कहना उन्हें किसी दैवी प्रतिमा में बदलने का निमंत्रण नहीं है। बल्कि यह एक ऐतिहासिक रूपक है, जिसके माध्यम से उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है, जो एक पिता की तरह अपनी संतानों की गलतियाँ इंगित करने का उत्तरदायित्व निभाता है।
एक सच्चा पिता अपनी संतानों से कहेगा:
“मेरी पूजा मत करो; जो सही है, उसका अनुसरण करो।”
गांधीजी के जीवन में इस संदेश की अनगिनत प्रतिध्वनियाँ सुनाई देती हैं।
गांधी के भारत में धर्म मनुष्यों को अलग करने वाली दीवार नहीं था। जाति मनुष्य की गरिमा का मापदंड नहीं थी। गरीबी को किसी व्यक्ति का अपराध नहीं माना जाना चाहिए था। सत्ता जनता से दूर खड़ा कोई महल नहीं थी। राजनीति की जिम्मेदारी समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचने की थी।
आज के भारत में ‘राष्ट्र’ शब्द अक्सर अत्यंत ऊँचे और शोरपूर्ण नारे में बदल जाता है। झंडे ऊँचे उठते हैं, देशभक्ति के गीत गूँजते हैं और सीमाओं के नाम पर भावनाएँ उभारी जाती हैं। लेकिन इसी सबके बीच एक बुनियादी प्रश्न चुपचाप खड़ा रहता है:
भारत किसका है?
क्या वह निरंकुश प्रवृत्ति वाले शासकों का है?
किसी एक राजनीतिक दल का?
किसी एक धर्म का?
सवर्ण जातियों का?
किसी एक भाषा का?
या फिर उसके नागरिकों का?
गांधी की राजनीति हमें अंतिम प्रश्न की ओर वापस ले जाती है।
उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासकों को हटाकर उनकी जगह अपने शासकों को बैठा देना नहीं था। भय से मुक्ति, अन्याय से मुक्ति, असमानता से मुक्ति और घृणा से मुक्ति भी स्वतंत्रता के आवश्यक अंग थे।
इसीलिए आज भारत को गांधी की तस्वीर वाले सिक्कों से अधिक गांधीवादी विचारों वाले मनुष्यों की आवश्यकता है।
प्रतिमाएँ खड़ी करना आसान है।
उन पर फूल चढ़ाना उससे भी आसान है।
लेकिन गांधी के आदर्शों को जीवन में उतारना इतना आसान नहीं है।
अहिंसा को स्वीकार करना कठिन है।
दूसरों के मानवाधिकारों को स्वीकार करना कठिन है।
अपने ही पक्ष की गलती मान लेना उससे भी कठिन है।
और सत्ता की आलोचना करते समय वही नैतिक कसौटी अपनी राजनीति पर भी लागू करना शायद सबसे कठिन है।
लेकिन गांधी की वास्तविक पहचान वहीं है।
उन्हें प्रतिमाओं के चरणों में नहीं, बल्कि हमारे राजनीतिक आचरण में खोजा जाना चाहिए। संसद की बहसों में, सड़कों के आंदोलनों में, मीडिया की स्वतंत्रता में, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा में, गरीबों के अधिकारों में और अपने विरोधी के विचार को सुनने की हमारी क्षमता में।
‘भारत माता’ से प्रेम करना गलत नहीं है। लेकिन भारत को केवल एक माँ के रूप में पूजना और उसके लोगों को केवल छोटे बच्चों के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। उन बच्चों को नागरिक बनना होगा।
प्रश्न करने वाले नागरिक।
असहमति व्यक्त करने वाले नागरिक।
सत्ता से भयभीत न होने वाले नागरिक।
और यहीं गांधी की प्रासंगिकता सामने आती है। यहीं केवल ‘भारत माता’ के रूपक की सीमाएँ भी स्पष्ट होती हैं।
इसलिए आज भारत को किसी नई प्रतिमा की आवश्यकता नहीं है; उसे एक पुरानी अंतरात्मा के पुनर्जन्म की आवश्यकता है।
उस अंतरात्मा का नाम है:
मोहनदास करमचंद गांधी।
अब समय आ गया है कि राष्ट्रपिता को पूजा की वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि लोकतंत्र के नैतिक पिता के रूप में फिर से पढ़ा जाए।
क्योंकि किसी राष्ट्र को माँ के स्नेह से आगे बढ़कर उस पिता की दृढ़ आवाज़ की भी आवश्यकता होती है, जो रास्ता भटकने पर उसका हाथ पकड़कर उसे रोक सके।
वर्तमान भारत को आज उस आवाज़ की पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है।
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