भारतीय लोकतंत्र और छात्र आंदोलनों का ऐतिहासिक सफर छात्र आंदोलन समाज और राजनीति के विकास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऊर्जावान भूमिका निभाते रहे हैं।
भारतीय लोकतंत्र और छात्र आंदोलनों का ऐतिहासिक सफर
छात्र आंदोलन समाज और राजनीति के विकास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऊर्जावान भूमिका निभाते रहे हैं। युवा ऊर्जा, वैचारिक जागृति और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की स्वाभाविक प्रवृत्ति का नाम ही छात्र आंदोलन है। जब-जब देश में राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक व्यवस्था में विसंगतियां उभरी हैं, तब-तब छात्रों ने अपने सामूहिक बल से व्यवस्था को सही दिशा में मोड़ने का प्रयास किया है। छात्र केवल कक्षाओं में बैठकर ज्ञान प्राप्त करने वाले शिक्षार्थी ही नहीं होते, बल्कि वे समाज के सजग प्रहरी भी होते हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि छात्रों की चेतना ने न केवल शैक्षणिक संस्थानों के माहौल को प्रभावित किया है, बल्कि कई बार देशों के राजनीतिक नक्शे और सरकारों के भविष्य को भी बदल कर रख दिया है।
भारत के संदर्भ में यदि छात्र आंदोलनों के इतिहास पर दृष्टि डाली जाए, तो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ही इनकी मजबूत नींव पड़ चुकी थी। महात्मा गांधी, भगत सिंह और अन्य महान नेताओं के आह्वान पर हजारों छात्रों ने अपनी पढ़ाई-लिखाई छोड़कर देश की आजादी की लड़ाई में कदम रखा था। 'भारत छोड़ो आंदोलन' हो या 'असहयोग आंदोलन', छात्रों की सक्रिय भागीदारी ने इन जन-आंदोलनों को नई धार दी थी। उस दौर में छात्रों का मुख्य उद्देश्य देश को औपनिवेशिक गुलामी से आजाद कराना और एक संप्रभु राष्ट्र का निर्माण करना था। स्वतंत्रता के बाद भी यह सिलसिला थमा नहीं, बल्कि नए रूपों में सामने आया।
स्वतंत्र उत्तर-भारत में छात्र आंदोलनों का सबसे प्रभावशाली और दूरगामी रूप सत्तर के दशक में देखने को मिला। बिहार और गुजरात से उठे छात्र आंदोलनों ने उस समय की राष्ट्रीय राजनीति को हिलाकर रख दिया था। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले 'संपूर्ण क्रांति' आंदोलन में छात्रों की मुख्य भूमिका थी। इस आंदोलन ने भ्रष्टाचार, महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर सत्ता को सीधी चुनौती दी, जिसके परिणामस्वरूप देश को आपातकाल जैसी ऐतिहासिक घटना का सामना करना पड़ा। इस दौर ने सिद्ध कर दिया कि संगठित छात्र शक्ति देश की राजनीति की दिशा बदलने का सामर्थ्य रखती है।
इसके अलावा, क्षेत्रीय और सामाजिक मुद्दों को लेकर भी छात्र आंदोलनों ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। असम में घुसपैठ के खिलाफ चला छात्र आंदोलन इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जिसने बाद में एक मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी का रूप लिया। इसी तरह, नब्बे के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने पर देशव्यापी छात्र प्रदर्शन हुए, जिन्होंने भारतीय समाज और राजनीति में जातिगत और आरक्षण के समीकरणों को हमेशा के लिए बदल दिया। शैक्षणिक संस्थानों की फीस वृद्धि, गिरते शैक्षणिक स्तर, और प्रशासनिक तानाशाही के खिलाफ भी समय-समय पर विश्वविद्यालयों में छात्र आवाज उठाते रहे हैं।
वर्तमान डिजिटल युग में छात्र आंदोलनों का स्वरूप और कार्यप्रणाली काफी बदल चुकी है। आज का युवा केवल सड़कों पर उतरकर ही विरोध दर्ज नहीं कराता, बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी आवाज को कुछ ही मिनटों में वैश्विक स्तर तक पहुंचा देता है। हैशटैग अभियानों और ऑनलाइन याचिकाओं के जरिए विचार-विमर्श और विरोध प्रदर्शनों को तेजी से संगठित किया जाता है। हालांकि, इस नए दौर में छात्र आंदोलनों के सामने कई नई चुनौतियां भी खड़ी हुई हैं। कई बार इन आंदोलनों पर राजनीतिक दलों का प्रभाव या उनका दलीय हित हावी होने लगता है, जिससे आंदोलन का मूल शैक्षणिक और सामाजिक उद्देश्य भटक जाता है।
अंततः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि छात्र आंदोलन किसी भी जीवंत लोकतंत्र की आत्मा की तरह होते हैं। वे समाज में व्याप्त जड़ता को तोड़ते हैं और नए विचारों तथा बदलाव का मार्ग प्रशस्त करते हैं। यद्यपि आंदोलनों को अहिंसक, अनुशासित और तार्किक होना अत्यंत आवश्यक है, ताकि वे अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त कर सकें। यदि छात्रों की इस असीमित ऊर्जा का दिशा-निर्देशन सही और राष्ट्रहित में हो, तो छात्र आंदोलन एक बेहतर, न्यायपूर्ण और प्रगतिशील समाज के निर्माण का सबसे सशक्त माध्यम बने रह सकते हैं।


COMMENTS