आज आवश्यकता केवल नई योजनाएं बनाने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि जो योजनाएं पहले से मौजूद हैं, उनका लाभ गांव के सबसे जरूरतमंद व्यक्ति तक सम
योजनाओं की पहुँच से बदल सकती है गांव की तस्वीर
किसी भी गांव का विकास केवल सड़क, बिजली या भवनों के निर्माण से नहीं मापा जा सकता।असली विकास तब दिखाई देता है जब गांव का हर व्यक्ति, चाहे वह किसी भी जाति, वर्ग, धर्म, आयु या आर्थिक स्थिति से जुड़ा हो, सम्मान के साथ अपना जीवन जी सके। जब किसी महिला को प्रसव के समय इलाज के लिए दर-दर न भटकना पड़े, जब किसी किशोरी को केवल पानी भरने के लिए स्कूल छोड़ने के लिए मजबूर न होना पड़े।
जब किसी बुजुर्ग को पेंशन पाने के लिए बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें और जब किसी गरीब परिवार को राशन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष न करना पड़े, तभी यह कहा जा सकता है कि सरकारी योजनाएं अपने वास्तविक उद्देश्य तक पहुंची हैं। दुर्भाग्य से आज भी बिहार के अनेक ग्रामीण इलाकों में योजनाओं और जरूरतमंद लोगों के बीच एक बड़ी दूरी बनी हुई है।
सरकार हर वर्ष ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, रोजगार, आवास, स्वच्छता, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक सुरक्षा के लिए अनेक योजनाएं लागू करती है। कागज़ों पर ये योजनाएं गांव के हर व्यक्ति के जीवन को बेहतर बनाने का वादा करती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर अक्सर ऐसा नहीं हो पाता। कई परिवार ऐसे हैं जिन्हें ये तक मालूम नहीं होता कि वे किन योजनाओं के पात्र हैं। कई लोग जानकारी के अभाव में आवेदन नहीं कर पाते, तो कई लोग दस्तावेजों की कमी, तकनीकी परेशानियों या प्रशासनिक लापरवाही के कारण लाभ से वंचित रह जाते हैं। सबसे अधिक नुकसान उन लोगों को होता है जिनकी आवाज़ पहले से ही कमजोर है, जैसे गरीब महिलाएं, किशोरियां, विधवाएं, दिव्यांग व्यक्ति, भूमिहीन मजदूर और समाज के हाशिए पर रहने वाले परिवार।
यदि गांव में सरकार द्वारा संचालित सभी योजनाओं का लाभ सही समय पर और सही व्यक्ति तक पहुंचने लगे, तो गांव की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है। इसका सबसे बड़ा असर महिलाओं और किशोरियों के जीवन में दिखाई देगा। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश महिलाएं परिवार की जिम्मेदारियों का सबसे बड़ा हिस्सा निभाती हैं, लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी सीमित रहती है। वे पानी लाने से लेकर खाना बनाने, बच्चों की देखभाल, पशुपालन और खेतों में काम तक हर जिम्मेदारी निभाती हैं, फिर भी उन्हें अपने अधिकारों और सरकारी सुविधाओं की पूरी जानकारी नहीं मिल पाती। यदि उन्हें योजनाओं की जानकारी, उन तक पहुंच और उनका लाभ मिलने लगे, तो उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा और वे अपने परिवार तथा समुदाय में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकेंगी।
किशोरियों के जीवन में भी इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है। यदि शिक्षा, छात्रवृत्ति, साइकिल, पोषण, स्वास्थ्य, डिजिटल शिक्षा और कौशल विकास जैसी योजनाएं पूरी ईमानदारी से लागू हों, तो बहुत-सी लड़कियां बीच में पढ़ाई छोड़ने के बजाय उच्च शिक्षा तक पहुंच सकेंगी। उन्हें कम उम्र में विवाह के दबाव से भी राहत मिलेगी, क्योंकि शिक्षा और आर्थिक अवसर उन्हें अपने भविष्य के बारे में निर्णय लेने का साहस देंगे।
ग्रामीण विकास की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सभी परिवारों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं होतीं। एक गरीब महिला की समस्याएं केवल गरीबी तक सीमित नहीं होतीं। यदि वह भूमिहीन भी है, अशिक्षित भी है, बच्चों की देखभाल भी करती है और सामाजिक रूप से वंचित समुदाय से भी आती है, तो उसके सामने कई स्तरों की कठिनाइयां होती हैं। ऐसे परिवारों तक योजनाएं पहुंचाने के लिए केवल समान व्यवस्था पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी वास्तविक परिस्थितियों को समझते हुए विशेष प्रयास करने होंगे। जिन लोगों को सबसे अधिक जरूरत है, उन्हें सबसे पहले और सबसे सरल तरीके से योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए। यही किसी भी कल्याणकारी व्यवस्था की सबसे बड़ी कसौटी है।
यदि हर पात्र परिवार को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत सुरक्षित घर मिले, हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचे, हर महिला को उज्ज्वला योजना का लाभ मिले, हर गर्भवती महिला को समय पर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हों, हर बच्चा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करे और हर जरूरतमंद परिवार को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिले, तो गांव में गरीबी, कुपोषण, बीमारी और असमानता स्वतः कम होने लगेगी। इससे महिलाओं का समय और श्रम भी बचेगा। जो समय वे पानी लाने या ईंधन जुटाने में लगाती हैं, उसी समय का उपयोग वे आजीविका, शिक्षा, स्वयं सहायता समूहों या अन्य सामाजिक गतिविधियों में कर सकेंगी। इससे परिवार की आय बढ़ेगी और महिलाओं की आर्थिक भागीदारी भी मजबूत होगी।
इसके लिए केवल सरकार की जिम्मेदारी तय करना पर्याप्त नहीं है। पंचायत, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, आशा कार्यकर्ता, जीविका समूह, स्वयं सहायता समूह, विद्यालय, स्थानीय सामाजिक संगठन और गांव के नागरिकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। प्रत्येक गांव में समय-समय पर 'जागरूकता एवं अधिकार शिविर' आयोजित किए जाने चाहिए, जहां सभी सरकारी योजनाओं की जानकारी सरल भाषा में दी जाए। पात्रता की जांच, दस्तावेज़ बनाने, आवेदन भरने और शिकायत दर्ज कराने की सुविधा भी एक ही स्थान पर उपलब्ध हो।
विशेष रूप से उन परिवारों की सूची तैयार की जाए जो अब तक किसी योजना से नहीं जुड़े हैं। घर-घर जाकर उनसे संवाद किया जाए और उनकी आवश्यकताओं के अनुसार योजनाओं से जोड़ा जाए। किशोरियों और महिलाओं के लिए अलग संवाद सत्र आयोजित किए जाएं ताकि वे बिना संकोच अपनी समस्याएं साझा कर सकें और योजनाओं की जानकारी प्राप्त कर सकें।
साथ ही, गांव स्तर पर सामाजिक निगरानी की व्यवस्था भी मजबूत होनी चाहिए। ग्राम सभा की बैठकों में योजनाओं की प्रगति सार्वजनिक रूप से साझा की जाए। लाभार्थियों की सूची खुली हो, शिकायतों का समयबद्ध समाधान हो और स्थानीय समुदाय स्वयं यह सुनिश्चित करे कि किसी पात्र व्यक्ति को केवल जानकारी, पहचान, जाति, आर्थिक स्थिति या सामाजिक प्रभाव के अभाव में वंचित न रहना पड़े। जब समुदाय स्वयं योजनाओं की निगरानी करेगा, तब पारदर्शिता भी बढ़ेगी और लोगों का भरोसा भी मजबूत होगा।
आज आवश्यकता केवल नई योजनाएं बनाने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि जो योजनाएं पहले से मौजूद हैं, उनका लाभ गांव के सबसे जरूरतमंद व्यक्ति तक सम्मानपूर्वक पहुंचे। दरअसल, योजनाओं की सफलता का मूल्यांकन केवल बजट और आंकड़ों के आधार पर नहीं, बल्कि इस आधार पर किया जाना चाहिए कि गांव का सबसे कमजोर और सबसे पीछे छूटा व्यक्ति कितना आगे बढ़ पाया है? यही वह रास्ता है जो एक आत्मनिर्भर ग्रामीण भारत की नींव को मज़बूत बना सकता है।(यह लेखिका की निजी राय है)
- प्रियंका कुमारी
सीतामढ़ी, बिहार


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