मैं प्रेमचंद जी को नमन करते हुए कहना चाहता हूँ कि उनकी अमर रचनाएँ सदैव हमारी पीढ़ी को प्रेरित करती रहेंगी।
प्रेमचंद जयंती पर भाषण | Munshi Premchand Jayanti 2026
माननीय अतिथिगण, प्रिय शिक्षकगण, आदरणीय प्रधानाचार्य महोदय और मेरे प्यारे साथियों,नमस्कार।
आज हम सभी यहाँ एकत्रित हुए हैं प्रेमचंद जयंती के इस पावन अवसर पर, वर्ष २०२६ में, उन महान साहित्यकार को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए जिन्होंने हिंदी साहित्य को न केवल नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया बल्कि उसे जन-जन की आवाज़ बनाया। ३१ जुलाई १८८० को जन्मे धनपत राय, जिन्हें हम मुंशी प्रेमचंद के नाम से जानते हैं, आज भी हमारे हृदय में जीवित हैं। उनकी रचनाएँ समय की दीवारों को पार कर आज भी हमें सोचने, महसूस करने और बदलने की प्रेरणा देती हैं।प्रेमचंद जी का जीवन संघर्षों से भरा था, फिर भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी। छोटी-छोटी नौकरियों से शुरू करके वे साहित्य की दुनिया में एक क्रांति लाने वाले लेखक बन गए। उन्होंने अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से उस समय की सामाजिक विसंगतियों को बेनकाब किया—चाहे वह जाति-प्रथा हो, स्त्री-शोषण हो, गरीबी हो या सामंती व्यवस्था की क्रूरता। उनकी कलम गरीब किसान, मजदूर, विधवा और छोटे-छोटे बच्चों की पीड़ा को शब्दों में उतारती थी।
"गोदान" पढ़ते समय हम होरी की पीड़ा महसूस करते हैं, "कफन" पढ़कर बुधिया और घीसू की मजबूरियों पर आँखें नम हो जाती हैं, और "ईदगाह" पढ़कर हमीद की मासूमियत हमें प्रभावित करती है।वे यथार्थवादी थे। उन्होंने साहित्य को आइना बनाया, जिसमें समाज खुद को देख सके। प्रेमचंद जी का मानना था कि साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज सुधार होना चाहिए। उन्होंने कभी भी अपनी रचनाओं में कृत्रिमता नहीं आने दी। उनकी भाषा सरल, सहज और आम जन की बोली थी, जिससे हर वर्ग का पाठक जुड़ सके। उन्होंने हिंदी को मात्र एक भाषा नहीं, बल्कि एक आंदोलन बनाया। ब्रिटिश शासन के समय जब स्वाधीनता की लहर उठ रही थी, तब प्रेमचंद ने अपनी कहानियों के माध्यम से राष्ट्रप्रेम और मानवीय मूल्यों को मजबूत किया।
आज २०२६ में, जब हम तेजी से बदलते विश्व में खड़े हैं, प्रेमचंद की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। आज भी हमारे समाज में अमीरी-गरीबी का फासला, महिला सुरक्षा, शिक्षा का अधिकार और नैतिक मूल्यों का क्षरण जैसे मुद्दे मौजूद हैं। उनकी रचनाएँ हमें याद दिलाती हैं कि साहित्य सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं होता, वह जीवन का हिस्सा है। वे हमें सिखाते हैं कि संवेदनशीलता, करुणा और न्याय की भावना हर इंसान में होनी चाहिए। अगर आज हम पर्यावरण, सामाजिक न्याय और समानता की बात करते हैं, तो प्रेमचंद जी के विचार हमें मार्गदर्शन देते हैं।प्रेमचंद जी केवल लेखक नहीं थे, वे एक दूरदर्शी विचारक भी थे। उन्होंने शिक्षा पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा था कि शिक्षा वह दीपक है जो अंधेरे को दूर करती है।
आज के युवाओं के लिए उनका संदेश बहुत महत्वपूर्ण है—कि हमें किताबों से जुड़ना चाहिए, सोचने की क्षमता विकसित करनी चाहिए और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। उनकी कहानियाँ हमें सिखाती हैं कि छोटी-छोटी खुशियाँ कितनी बड़ी होती हैं और त्याग व सेवा का महत्व क्या है।आज इस जयंती के अवसर पर हम संकल्प करें कि हम उनकी रचनाओं को न केवल पढ़ेंगे बल्कि उनमें निहित संदेशों को अपने जीवन में उतारेंगे। हम अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने समाज के प्रति समर्पित रहेंगे। प्रेमचंद जी की तरह हम भी सत्य को सामने लाने का साहस रखें, अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाएँ और मानवता की रक्षा करें।
अंत में, मैं प्रेमचंद जी को नमन करते हुए कहना चाहता हूँ कि उनकी अमर रचनाएँ सदैव हमारी पीढ़ी को प्रेरित करती रहेंगी। उनकी कलम कभी रुकी नहीं, उनकी भावनाएँ कभी मरी नहीं। वे आज भी हमारे बीच हैं—हर उस पन्ने में, हर उस पात्र में जो हमें इंसान बनने की याद दिलाता है।
धन्यवाद।
जय हिंद।जय प्रेमचंद।


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