राजस्थान की पहचान लंबे समय तक केवल रेगिस्तान, ऊँट और पर्यटन तक सीमित मानी जाती रही है, लेकिन आज यह राज्य देश में पशुपालन और डेयरी क्षेत्र
महिलाओं की आर्थिक मजबूती की पहचान बनता पशुपालन
राजस्थान की पहचान लंबे समय तक केवल रेगिस्तान, ऊँट और पर्यटन तक सीमित मानी जाती रही है, लेकिन आज यह राज्य देश में पशुपालन और डेयरी क्षेत्र की भी एक मजबूत पहचान बन चुका है। कम वर्षा और सीमित कृषि संसाधनों वाले इस राज्य में पशुपालन लाखों परिवारों की आजीविका का आधार बन चुका है। यही कारण है कि खेती के साथ-साथ पशुपालन यहाँ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सबसे भरोसेमंद सहारा बन गया है। बदलते समय में जब खेती की आय अनिश्चित होती जा रही है, तब पशुपालन नियमित आय, पोषण और रोजगार का ऐसा माध्यम बनकर उभरा है, जिसने गाँवों में आर्थिक स्थिरता की नई संभावनाएं पैदा की हैं।
हाल ही में मुझे राजस्थान के उदयपुर जिला से करीब 8 किमी दूर गिरवा तहसील स्थित सपाटिया गाँव जाने का अवसर मिला। करीब दो हजार की आबादी वाले इस गांव में प्रवेश करते ही एक बात साफ दिखाई दी कि लगभग हर घर में पशु के रूप में कोई न कोई जानवर मौजूद है। बातचीत के दौरान गाँव की महिलाओं ने बताया, "हमारे यहाँ लगभग हर परिवार पशुपालन से जुड़ा है। यही हमारे घर की आय का सबसे बड़ा सहारा है।" उनकी बातों से महसूस हुआ कि यहाँ पशुपालन केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन का अभिन्न हिस्सा है।
इसी दौरान मेरी मुलाकात रूपलाल डांगी और उनके परिवार से हुई। उन्होंने बताया, "हमारे गाँव में लगभग हर दूसरे घर में डेयरी का काम होता है। लोग मिलकर इसे आगे बढ़ा रहे हैं और इससे आमदनी भी लगातार बढ़ रही है।" उनकी बातों से स्पष्ट था कि जब पूरा समुदाय किसी एक आजीविका से जुड़ता है, तो उसका लाभ केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे गाँव की आर्थिक स्थिति मजबूत होने लगती है।
रूपलाल डांगी के परिवार की सबसे प्रेरक बात यह लगी कि पशुपालन की जिम्मेदारी केवल पुरुषों तक सीमित नहीं थी। उनकी तीनों बेटियां कॉलेज में पढ़ाई करने के साथ पशुओं की देखभाल, दूध निकालने, चारा प्रबंधन और डेयरी से जुड़े कई कार्यों में बराबर की भागीदारी निभाती हैं। परिवार की महिलाएं केवल श्रम नहीं करती, बल्कि आय बढ़ाने और काम के संचालन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
ग्रामीण भारत के अनेक हिस्सों में पशुपालन महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित रखने के बजाय आर्थिक भागीदारी का अवसर देता है। जब महिलाओं की आय बढ़ती है, तो उसका असर बच्चों की शिक्षा, परिवार के पोषण और स्वास्थ्य पर भी दिखाई देता है। यही कारण है कि पशुपालन आर्थिक मजबूती के साथ महिलाओं के आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता को भी बढ़ाता है।
राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो पशुपालन भारत की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा पशुधन वाला देश है और वैश्विक स्तर पर दूध उत्पादन में पहले स्थान पर है। वर्ष 2023-24 में देश का दूध उत्पादन लगभग 239.3 मिलियन टन रहा और पशुधन क्षेत्र का योगदान देश के कुल सकल मूल्य वर्धन (Gross Value Added) में लगभग 5.5 प्रतिशत रहा। कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों के भीतर भी पशुधन की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है, जो इस क्षेत्र के बढ़ते आर्थिक महत्व को दर्शाती है।
पशुपालन के क्षेत्र में राजस्थान देश के अग्रणी राज्यों में शामिल है। 20वीं पशुधन गणना (2019) के अनुसार राजस्थान में देश के कुल पशुधन का लगभग 10.6 प्रतिशत हिस्सा है। राज्य ऊँटों की संख्या में देश में पहले स्थान पर है तथा भेड़, बकरी और ऊन उत्पादन में भी अग्रणी राज्यों में शामिल है। दूध उत्पादन में राजस्थान देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है और राष्ट्रीय दूध उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी लगभग 14.5 प्रतिशत है। यही कारण है कि राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन की भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही है।
पशुपालन का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह गांवों से शहरों की ओर होने वाले आर्थिक पलायन को कम करने में मदद करता है। जब परिवारों को अपने गाँव में ही नियमित आय का साधन मिल जाता है, तो उन्हें रोजगार की तलाश में शहरों की ओर जाने की मजबूरी कम होती है। इससे एक तरफ जहां पलायन की समस्या खत्म होती है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय अर्थव्यवस्था भी मजबूत होती है।
सरकार भी इस क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं संचालित कर रही है। राष्ट्रीय गोकुल मिशन के माध्यम से देशी नस्लों के संरक्षण और सुधार पर काम किया जा रहा है। राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत प्रशिक्षण, चारा विकास और आधुनिक तकनीकों की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। इसके अलावा पशुधन बीमा जैसी योजनाएं पशुपालकों के जोखिम को कम करने में सहायक हैं। यदि इन योजनाओं की जानकारी और लाभ अंतिम व्यक्ति तक प्रभावी ढंग से पहुँचे, तो लाखों ग्रामीण परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।
हालाँकि इसमें चुनौतियां भी कम नहीं हैं। पशुओं के लिए गुणवत्तापूर्ण चारे की उपलब्धता, पशु चिकित्सकों तक समय पर पहुँच, उचित बाजार मूल्य और सरकारी योजनाओं की जानकारी आज भी कई ग्रामीण इलाकों में सीमित है। यदि इन समस्याओं का समाधान किया जाए, तो पशुपालन की क्षमता कई गुना बढ़ सकती है। विशेष रूप से महिलाओं तक प्रशिक्षण, ऋण, बीमा और बाजार की पहुँच सुनिश्चित करना इस क्षेत्र की नींव बन सकता है।
बहरहाल, सपाटिया गाँव का अनुभव यह बताता है कि पशुपालन केवल दूध उत्पादन या आय अर्जित करने का माध्यम नहीं है। यह परिवारों को आर्थिक सुरक्षा देता है, युवाओं को गाँव में ही रोजगार के अवसर उपलब्ध कराता है और महिलाओं को आर्थिक नेतृत्व निभाने का अवसर देता है। ऐसे उदाहरण बताते हैं कि यदि पशुपालन को बेहतर बाजार, आधुनिक तकनीक और सरकारी सहयोग मिले, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत आधार बन सकता है।(यह लेखिका की निजी राय है)
- निकिता
उदयपुर, राजस्थान


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