महासू महाराज हनोल की यात्रा का वृतांत

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ग्रीष्म अवकाश का अर्थ अनेक परिवार में भ्रमण काल है। बच्चों की पढाई, अवकाश गृह कार्य, नौकरी से अवकाश लेना, घर परिवार का इंतज़ाम करना फिर भ्रमण पर जाना।

महासू महाराज हनोल की यात्रा का वृतांत


ग्रीष्म अवकाश का अर्थ अनेक परिवार में भ्रमण काल है। बच्चों की पढाई, अवकाश गृह कार्य, नौकरी से अवकाश लेना, घर परिवार का इंतज़ाम करना फिर भ्रमण पर जाना। मन पसंद स्थल पर रहने की व्यवस्था, गाड़ी- चालक की समुचित व्यवस्था हो जाये, तब भ्रमण पर चलें।
 
इन सब का निवारण होने के पश्चात हम १४ लोगों का दल झरिपनि, मसूरी, उत्तराखंड से पश्मि, जिला सिरमौर, हिमाचल प्रदेश दो दिन सड़क मार्ग यात्रा पर निकले।बोलेरो संचालक, श्री बिष्ट जी, के अनुभव का लाभ लेते हुए रविवार प्रातः साढ़े छ: बजे सब ने अपने अपने घर से गाड़ी में स्थान ले लिया। बालक बालिका बहुत उत्साहित थे। युवा नींद का आनंद ले रहे थे। प्रौढ़ और बुजुर्ग कहानी किस्से में लगे थे। 

सर्व प्रथम, किन्क्रेग् के पेट्रोल पंप पर रुक कर टंकी फुल करवानी थी। वहाँ पहले ही डेढ़ सौ वाहन लगे खड़े थे। दोनों पम्प पर अति चहल पहल थी। जैसे तैसे, आगे पीछे, बात चीत कर टंकी फुल करवा ली।लाईब्रारि बस स्टॉप, गाँधी चौक की भीड़ जाम को धीरे धीरे पार कर ज़ीरो पॉइंट से केंप्टी रोड़ पर गाड़ी सरपट चल पड़ी। हल्के धुंध के कारण, हिमाछादित हिमालय की चोटी के दर्शन न हो सके।

राह मे पड़ने वाले गाँव, रंग बिरंगे घर, मक्की के खेत और बकरी के झुंड मन मोहते रहे।केंप्टी बाजार की रौनक देखने लायक थी। विभिन्न प्रकार के भोज्य पदार्थो की खुशबू चारों ओर फैल रही थी। अनेक यात्री ठंडी हवा में भुना भुट्टा, निम्बू लगा कर खाने में व्यस्त थे।

महासू मार्ग (हनोल) की यात्रा वृतांत
नये एकल वाहन मार्ग का प्रयोग कर हमारी गाड़ी यमुना ब्रिज पहुँच गयी। पुल पार कर, दस किलोमीटर पहाड़ी मार्ग से सर्व प्रथम दर्शन लखवार महासू बौण्ठा महाराज के हुए। साथ में कैलाश में विराजमान शिव गंगा का मूर्त रूप श्रधालूऊँ  के मोबाइल कैमरे में असांख्य बार कैद हो रहा था। रविवार भंडारा लगा था। मन्दिर समिति सेवक बड़े आग्रह से सब को हलवा व जल परोस रहे थे। प्रांगण में काले, सफेद, भूरे, चितकबरे बकरे सहज रूप से विचरण कर रहे थे। अपने प्रसाद का कुछ अंश लोग बकरों को खिला रहे थे। ये  बकरे श्रधालु स्वेच्छा से बौण्ठा महाराज को भेंट स्वरूप देते हैं।द्वि मंजिला मन्दिर की काष्ठ की काश्तकारी कलाकारों की योग्यता का प्रमाण है।यह मंदिर मुख्य रूप से देवदार की लकड़ी और पत्थरों से बनी पारंपरिक वास्तुकला के लिए जाना जाता है। ये स्थानीय जौनसारी संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र है।

महाराज से आज्ञा ले, हम लिग्यासु महासू मन्दिर की राह पर चल पड़े। ये मन्दिर भी वास्तुकला का अद्भुत साक्ष्य देता है। ठंडाली में विश्राम कर मन्दिर में प्रवेश करा। रंग  बिरंगी कलाकृतियाँ, लकड़ी की सीढ़ी, और प्रांगण के आस पास की वनस्पति अति आकर्षक थी। पुजारी ज्योइं ने सब के हल्दी चंदन का टीका लगा आशीर्वाद दिया। 

महासू देवता को न्याय का देवता माना जाता है और यह भगवान शिव का ही एक रूप हैं। महासू देवता चार भाइयों का एक समूह है। इन चारों भाइयों की पूजा अलग-अलग क्षेत्रों में की जाती है। लिग्यासु भी उसी श्रृंखला की एक कड़ी है।चारों तरफ पहाड़ी चोटियाँ देखते ही बनती है। उन पर बादल समूह दृश्य को  आंखो में समेटने को मजबूर करता रहा।

जल ग्रहण कर गाड़ी में पहाड़ी गीत, आम के पेड़ देखते हुय बिसोइ ग्राम की ओर बढे। साथ में बहती नदी का आनंद अलग ही था। मन कर रहा था, नदी में उतर जल क्रीड़ा करें।बिसोइ मन्दिर की काष्ठ कला बहुत ही हृदय स्पर्शी थी। वहाँ की ठंडाली व्यवस्था अति आकर्षक थी। भंडारे के हलवे का रसा स्वादन कर, कुछ छाया चित्र लिए। ढोल धमाऊ व अन्य वाद्य यंत्र एक सुंदर कक्ष में सजे थे। इन का प्रयोग करने वाले संगीतज्ञ भी विराजमान थे।
 
बाशिक महासु (या वासिक महासु) उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र में पूजे जाने वाले चार  महासू भाइयों (बाशिक, पबासिक, बोथा और चालदा) में से एक हैं।दूर दूर तक पर्वत श्रृंखला अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। मंदीर के चारों ओर ग्रामीण जीवन के अद्भुत साक्ष्य थे। चूल्हा, भड्डु, लकड़ी के गठ्ये, घास के पूलए, स्वच्छ प्राकृतिक जल धारा। गाँव की पतली संकरी गली में घूमते पशु और अनेक ताला बन्द दरवाजे। लोग गाँव छोड़ शहर जा बसे। आने जाने का सुगम साधन मोटर साइकिल ही अपनों से मिलवाता है। अति आश्चर्य की इधर कोई पेट्रोल पम्प नहीं हैं। नैनबाग विकास नगर जा कर पेट्रोल भरवा सकते हो।
 
पैर लम्बे कर गाड़ी में चढ़ कर थैना की ओर निकल गए। गर्मी बढ़ रही थी, पर चलती गाड़ी में कम महसूस हो रही थी। गाड़ी की खिड़कियाँ खुली थी सो चीड़ की हवा बहुत सुखदायी थी। चकराता मोड से ढलान पर रास्ता था। दिखने को तो मन्दिर सामने था पर पहाड़ी रास्ते पर पचीस तीस मिनट में थैना का आकर्षक मन्दिर दिख गया। चप्पल जूते उतारते ही तलवे जलने लगे। भला हो थैन्ना ग्राम समिति का जिंहोइँ ने टाट और उन पर बहती जल धरा की व्यवस्था करी हुई है। बढ़ते ताप मान से परेशान बकरे भी यहाँ वहाँ छाया ढूंढ खड़े हो मिमया रहे थे।जौनसार-बावर और हिमाचल प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में इन्हें सर्वोच्च न्याय के देवता के रूप में पूजा जाता है। स्थानीय लोग किसी भी विवाद का निपटारा इन्हीं की चौखट पर करते हैं।

आगे यात्रा लम्बी थी सो सलाह हुई कि भोजन कर के चलें। रावत जी के गोदाम में, पंखे की हवा के नीचे बैठ, सीमा गजीरा, अनिल सुनील के द्वारा तैयार पूरी परांठे और आलू भुजी सब ने पेट भर खाई। पानी की बोतल में ठंडा जल भरा, हांथ मुख धो गाड़ी से पश्मि के लिए निकल पड़े।

ये सुन की चार पांच घंटे लगेंगे, बच्चे सोने का उपक्रम करने लगे। नदी का दृश्य और साथ में बारिश से यात्रा का आनंद बढ़ गया। एक बार फिर आम के पेड़ दिखने लगे। बहुत हल्ले गुल्ला, मिन्नत के वाद गाड़ी खड़ी कर के, एक दो पेड़ से दस  बारह हरे आम तोड़े गए। फिर तो गाड़ी चली सो चली। एक पहाड़ी झरने पर रुकवा कर पैर सीधे करे।

सूर्यास्त  से आधा घंटा पहले हम पेश्मि पहुँच गए। वहाँ करीब ७०० व्यक्ति पाट खुलने की प्रतिक्षा में बैठे थे।पश्मि महासू, हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में स्थित गांव का एक प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मंदिर  है। यह स्थान भगवान शिव के अवतार 'चालदा महासू' महाराज के २०२५ में पधारने की  खुशी में और एक भव्य मंदिर के निर्माण के कारण सुर्खियों में है।

चालदा महासू महाराज इतिहास में पहली बार टोंस नदी पार कर लंबे समय तक प्रवास के लिए हिमाचल के सिरमौर (शिलाई क्षेत्र) पहुंचे हैं।  वर्ष 2020 में पश्मि गांव में एक दुर्लभ और शांत स्वभाव की बकरी प्रकट हुई थी। 14 दिसंबर 2025 को देवता को इस मंदिर में विराजमान किया गया था, जिसमें भारी संख्या में श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया था।

सब ही श्रद्धालु शांत स्वभाव से बैठे थे। ग्राम वासी सारी व्यवस्था आयोजित करने में संलग्न थे। पूरे वर्ष का निशुल्क खान पान, रहन सहन की पूरी जिम्मेवारी उन की ही है। दो समय का भोजन, दो टाइम की चाय का प्रबन्ध, समय समय से साफ सफाई करते हुए बालक, बालिका, वृद्ध, युवा अतिथि स्वागत में लगे देख कर मन प्रफुल्लित हो गया। 
रात्रि भोज के समय पारंपरिक संगीत पर बलिकाओं व महिलाएं तन्दि, नाटी की प्रस्तुति देते हुए, अतिथि से भी सम्मलित होने का आग्रह करती रहीं। एक तरफ जौनपुरी घाघरा, वंडी, कुर्ती और ढण्डु तो दूसरी तरफ हिमाचली पैजामा, कुर्ता ढूंढ़ऊ अनोखी छटा बिखेर रहे थे।
 
रात को चमकते चंद्रमा, शुक्र और बुद्ध ग्रह की निराली छटा आकाश को निहारने पर मजबूर करती रही। करीब ४०० महिला पुरुष भोजन कक्ष व अन्य ३०० ठंडाली में निडर सो गये। ग्राम वासी रात भर निगरानी करते रहे।४ बजे ब्रह्म मूर्त में वाद्य यन्त्र ने प्रातः कालीन पूजा अर्चना की घोषणा कर दी।

साढ़े छ: बजे तक रात्रि कालीन अतिथि घर की ओर और नये अथिति मन्दिर प्रांगण की तरफ चल दिये।लौटते समय टोंस नदी के किनारे, मेंद्रथ में, दैविक वनस्पति के दर्शन करे। विश्वास है कि इन्ही पौधों से चारों भाई उत्पन्न हुए है। टोंस नदी की कल कल धरा एक टक देखते रहे। कुछ समय बाद हाथ पैर धो, आगे हनोल के लिए निकले।
 
हनोल का अपना ही महत्म है। महाभारत काल में पांडव यहाँ आये थे। मिट्टी कीचड़ में पड़े दो बड़े गोल पाथर सब को चुनौती देते हैं। मान्यता है कि ये भीम के कंचे हैं। प्रथा अनुसार प्रयास करने पर कुछ निश्छल व्यक्ति ही इन्हे कंधे से उप्पर उठा कर पीछे फेंक सकते हैं। यही बौठा महाराज का स्थायी निवास है। लकड़ी का द्वार, बलिकाओ की सेवा विशेष है।सामने थाडियार ग्राम में पवासु महासू महाराज का मन्दिर देख, हमारी गाड़ी उधर भी चली। टोंस नदी पुल से पैदल पार कर फॉरेस्ट रेस्ट हाउस  व पोस्ट आफिस दिखे।

कुछ गुज्जर परिवार वन में बसे थे। पुल स्टील की रस्सी और लोहे की  चादरें से तीस वर्ष पूर्व बना था। मोटर साइकिल सवार और खचचार वाले इस का खूब प्रयोग कर रहे हैं। नेपाली मूल के लोग टमाटर बेच रहे थे। साथ ही भांग  के पौधे उग रहे हैं।करीब एक किलोमीटर चल कर मन्दिर, साथ में शिव पार्वती, गणपति और नंदी के दर्शन हुये। धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देते हुए यहाँ पुनः निर्माण की बड़ी योजना आ रही है।
 
लौटते हुए बहुत सुंदर जंगली पुष्प देखे।अब यात्रा टोंस नदी के साथ थी। साथ ही चीड़ के लम्बे वृक्ष।इस जंगल में वन संरक्षण के लिए जीवन दान करने वाली महिला की स्मृति में एक पेड़ का तना सुरक्षित रखा है। पास ही नदी जल से देवों को अचमन कर, क्रिकेट मैच का आनंद ले आगे बढे।

सेब के बाग के पास रुक कर पहाड़ी थाली खा कर मन तृप्त हो गया। भोजनालय के मालिक ने उपहार स्वरूप सेब खिलाये। उसी समय झरिपनि छात्रावास के छात्र गाड़ी की छत पर बैठे पुरोला जा रहे थे। उन का विद्यालय हमारे साथ बैठे बच्चों का विद्यालय था। वे गाड़ी से ही बच्चों का नाम पुकारने लगे।

कुछ समय चल कर, भोजन कर, आगे बढे। टोंस नदी पार वापस उत्तराखंड के उत्तरकाशी जनपद में प्रवेश किया। सामने हिमाचल प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र और इधर धान की रुपाई करती कतार दर कतार मेहनती महिलाएं। पुरोला क्षेत्र बहुत ही विस्तृत और मन लुभावना था। किसी राजनेता की रैली चलते कुछ समय रुक कर पुरोला को देखते रह गए।

यात्रा कुछ निरस हो रही थी, तब ही छ: वर्षीय गोली प्रियांशु अपनी कविता सुना कर हँसाने लगा।

“बच्चा कहता है भूख लगी। आईस क्रिम दिला दो। 
आज पैसे नहीं लायी, 
ममी कहे चुप चाप दाल भात खा लो।”

अंतिम पड़ाव, लाखामंडल में प्राचीन मन्दिर, शिवलिंग और प्राचीन पांडव कंदरा का दर्शन करते हुए, फिर से केंप्टी मार्ग से लौट आये। बीच  में यमुना किनारे नया मार्ग का कार्य जोर शोर से चल रहा था।जिरू पॉइंट पर गाड़ी का जाम देख, वाहन चालक ने हरनाम सिंह मार्ग लिया, पर लाएब्रारी आते आते, एक लम्बे जाम को झेलना पड़ा। फिर भी समय से घर पहुँच आराम से निंद्रा के आगोश में आराम कर लिया। 

सब ही सह यात्री के साथ आनंद पूर्वक यात्रा पूरी हुई।

 
- मधु मेहरोत्रा

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