मलयालम साहित्य के सबसे बड़े अंतर्विरोधों में से एक ख़साक की दास्तान के स्वीकृति-इतिहास के इर्द-गिर्द निर्मित हुआ है।
ख़साक की दास्तान: एक प्रतिपाठ
मलयालम साहित्य के सबसे बड़े अंतर्विरोधों में से एक ख़साक की दास्तान के स्वीकृति-इतिहास के इर्द-गिर्द निर्मित हुआ है। आधुनिकता के सत्ता-केंद्रों पर प्रश्नचिह्न लगाने वाली एक कृति स्वयं बाद में आलोचना से परे एक सत्ता-केंद्र में बदल जाती है। ख़साक की दास्तान आज केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि एक विश्वास-व्यवस्था है। इसलिए इसकी आलोचना को अक्सर साहित्यिक असहमति के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अवमानना के रूप में देखा जाता है।
इस उपन्यास के बारे में सबसे बड़ी भ्रांति यह है कि यह किसी समुदाय का महाकाव्यात्मक आख्यान है। वास्तव में ख़साक नामक गाँव कोई स्वतंत्र सामाजिक यथार्थ नहीं है। वह रवि के मन का एक प्रतीकात्मक भूगोल है। चिट्टम्मा के साथ निषिद्ध यौन-संबंध से उपजे अपराधबोध को ही उपन्यास का केंद्र कहा जा सकता है। ख़साक के लोग, विश्वास, मिथक और घटनाएँ उसी अपराधबोध के रूपकों की तरह कार्य करती हैं।
इसलिए ख़साक कोई गाँव नहीं, बल्कि रवि का मानसिक उपमहाद्वीप है। वहाँ के लोग स्वयं नहीं बोलते; उनकी सभी आवाज़ें रवि की चेतना के माध्यम से ही सुनाई देती हैं। अर्थात् ख़साक किसी सामाजिक इतिहास का आख्यान नहीं, बल्कि रवि के विखंडित व्यक्तित्व की आध्यात्मिक आत्म-चिकित्सा का मंच भर है।
उपन्यास में मुस्लिम जीवन का चित्रण भी अत्यंत समस्याग्रस्त प्रतीत होता है।
ख़साक के मुस्लिम पात्र जीवंत सामाजिक मनुष्यों के रूप में सामने नहीं आते। वे जीते हैं, प्रेम करते हैं, संघर्ष करते हैं, इस यथार्थ की अपेक्षा चमत्कारों, किंवदंतियों और आध्यात्मिक धुंध के हिस्से के रूप में अधिक उपस्थित हैं। वे इतिहास, राजनीति या वर्ग-संबंधों के अंग नहीं बनते, बल्कि एक विचित्र पौराणिक संसार के निवासी दिखाई देते हैं।
यहीं एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है: क्या यह सहानुभूति है, या फिर अन्यीकरण? क्योंकि किसी समुदाय से घृणा किए बिना भी उसे इतिहास से बाहर किया जा सकता है। सम्मान का आभास देते हुए भी उसे वास्तविक मानव-समाज के रूप में न देखा जा सकता है। एडवर्ड सईद द्वारा विश्लेषित ओरिएंटलिज़्म का सबसे सूक्ष्म रूप यही है। दूसरे को अपमानित करना नहीं, बल्कि उसका मिथकीकरण करना; मानवीय स्वाभाविकता से वंचित करके उसे एक हास्यास्पद प्रतीक में बदल देना।
नैजामअली का चरित्र इसी समस्या के केंद्र में स्थित है। ख़साक की आध्यात्मिक ऊर्जा के स्रोत के रूप में प्रस्तुत नैजामअली, सूक्ष्म पाठ में उपन्यास के सबसे कृत्रिम रूप से निर्मित पात्रों में से एक प्रतीत होता है। उसका रूपांतरण किसी आंतरिक जीवन-विकास का परिणाम नहीं लगता। दो भिन्न चरणों में वह या तो बीड़ी-व्यवसाय का मालिक बन सकता था अथवा एक दृढ़ कम्युनिस्ट नेता; किंतु इसके बजाय वह एक अत्यंत अपमानजनक आत्मसमर्पण और क्षमायाचना के माध्यम से दोषमुक्त होकर ख़ालियार जैसे प्राचीन मुस्लिम समुदाय की पवित्र पदवी धारण कर लेता है। इस परिवर्तन के पीछे अनुभवों की कोई सुसंगत निरंतरता भी नहीं दिखाई देती। इसके विपरीत, लेखक की प्रतीकात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप एक इस्लामोफ़ोबिक आख्यान नैजामअली को रूपांतरित करता हुआ प्रतीत होता है।
नैजामअली एक जीवित मनुष्य से सीधे आध्यात्मिक रूपक में बदल जाता है। इस छलाँग के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक गलियारों का पर्याप्त निर्माण उपन्यास में नहीं मिलता।यहीं वह खतरा उत्पन्न होता है, जहाँ चरित्र मनुष्य से घटकर एक विचार-मात्र बन जाता है।
ब्रिटिश शासन के समक्ष क्षमायाचनाएँ प्रस्तुत करने और सहयोगवादी राजनीति अपनाने के कारण आलोचना के घेरे में आए विनायक दामोदर सावरकर की परंपरा के प्रतिपक्ष में एक मुस्लिम आध्यात्मिक उपस्थिति को स्थापित करने के प्रयास के रूप में भी नैजामअली को पढ़ा जा सकता है।
इस दृष्टि से देखें तो ख़साक की दास्तान मुस्लिम जीवन को उसके ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों से वंचित करके उसे "बौद्धिक-शून्य मिथक" में अनूदित कर देती है। वह जीवित मनुष्य को एक अस्वाभाविक आध्यात्मिक प्रतीक में बदल देती है। इस प्रक्रिया में सहानुभूति भी वस्तुकरण का रूप धारण कर लेती है।
उपन्यास की आधुनिकता में भी यही समस्या दिखाई देती है। विजयन पश्चिमी आधुनिकता के विरुद्ध एक वैकल्पिक आधुनिकता की रचना करते हैं। किंतु यह वैकल्पिकता प्रायः ऐतिहासिक और सामाजिक विश्लेषण को त्यागकर मिथकीयता और आध्यात्मिकता की ओर लौट जाती है। वर्ग, जाति, भूमि, उत्पादन और सत्ता जैसे ठोस प्रश्न प्रतीकों और दृष्टांतों की धुंध में विलीन हो जाते हैं।
इसलिए ख़साक की दास्तान कोई मुक्ति-कथा नहीं है। यह एक महान बहुआख्यानात्मक संरचना अवश्य है, किंतु साथ ही इतिहास को मिथक में और मनुष्यों को प्रतीकों में रूपांतरित करने वाली एक सांस्कृतिक यांत्रिकी भी है।इसलिए मलयालम की अत्यंत विशिष्ट कृति होने के साथ-साथ ख़साक को इस आधार पर भी परखा जाना चाहिए कि वह कितनी चुप्पियों को अपने भीतर छिपाकर रखती है।
उन चुप्पियों का भूगोल ही वास्तव में ख़साक की दास्तान का सच्चा महाकाव्य है।
- Binoy.M.B,
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