कीलमार पार्टी हाउस

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कीलमार पार्टी हाउस हमारे गाँव में एक घर आज भी अपने असली नाम से नहीं जाना जाता।उसका वास्तविक नाम, मकान नंबर और बाकी सारी पहचान समय की धूल में कहीं खो

कीलमार पार्टी हाउस


मारे गाँव में एक घर आज भी अपने असली नाम से नहीं जाना जाता।उसका वास्तविक नाम, मकान नंबर और बाकी सारी पहचान समय की धूल में कहीं खो चुकी है। आज भी लोग उसे केवल एक ही नाम से जानते हैं।

"कीलमार पार्टी हाउस।"

इस नाम के पीछे एक इतिहास है। बल्कि इतिहास से भी बढ़कर, एक किंवदंती।

मेरे बड़े मामा की पत्नी पर समय-समय पर चोट्टानिक्करा भगवती का आवेश आ जाता था। कम से कम उनका और उनके भक्तों का यही विश्वास था। सामान्य दिनों में वे शांत स्वभाव की महिला थीं, लेकिन जैसे ही भगवती का आवेश आता, पूरा माहौल बदल जाता।

पहले उनकी आँखें फैल जातीं।

फिर उनकी आवाज़ बदल जाती।

और उसके बाद घरवालों की धड़कनें तेज हो जातीं।

क्योंकि भगवती का मुख्य कार्यक्रम आशीर्वाद देना या भविष्यवाणी करना नहीं था।

"असुर-वध!"

और वह भी एक बेहद अनोखे तरीके से।

वे घर में कहीं से एक कील और हथौड़ा उठा लातीं, फिर आसपास मौजूद किसी व्यक्ति को असुर घोषित कर देतीं। उसके बाद उस "असुर" के माथे में कील ठोंककर उसका नाश करने का प्रयास करतीं।

असुर की पहचान का मापदंड क्या था, यह आज तक कोई नहीं समझ पाया।

कभी पड़ोसी।

कभी कोई रिश्तेदार।

कभी कोई राहगीर।

एक बार तो दूधवाला भी संदेह के घेरे में आ गया था।

लेकिन इस महान असुर-विनाश अभियान की सबसे प्रसिद्ध घटना एक दोपहर को घटी।

उस दिन घर आई हुई एक बुज़ुर्ग महिला पर अचानक भगवती की दृष्टि पड़ी।

एक क्षण।

दो क्षण।

फिर निर्णय सुनाया गया।

कीलमार पार्टी हाउस
"असुर!"

इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, कील और हथौड़ा प्रकट हो चुके थे।

बुज़ुर्ग महिला के माथे पर एक कील का वार हुआ।

कील पूरी तरह नहीं घुसी, लेकिन उन्हें स्थिति की गंभीरता समझने के लिए इतना ही पर्याप्त था।

उन्होंने तत्काल निर्णय लिया कि वहाँ रुकना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।

अगले ही पल वे दौड़ पड़ीं।

दौड़ीं कहना भी शायद कम होगा।

वे मानो उड़ने लगीं।

आँगन पार।

सड़क पार।

खेत पार।

पीछे लोग।

उनके पीछे धूल का बादल।

और सबसे आगे वह बुज़ुर्ग महिला।

उनकी गति देखकर गाँववालों ने बाद में कसम खाकर कहा कि उस दिन यदि पी. टी. उषा भी वहाँ होतीं, तो शायद दूसरे स्थान पर आतीं।

कुछ लोगों का तो यह भी दावा है कि उन्होंने दौड़ नहीं लगाई थी, बल्कि कुछ क्षणों के लिए पृथ्वी के घूर्णन वेग का उपयोग कर लिया था।

सौभाग्य से उन्हें कोई गंभीर चोट नहीं लगी। लेकिन इस घटना की कहानी पूरे गाँव में फैल गई।

और उसी दिन से मेरे बड़े मामा के घर को एक नया नाम मिल गया।

शुरुआत में लोग मज़ाक में कहते थे।

फिर आदत बन गई।

और अंततः वही उसका स्थायी नाम बन गया।

"कीलमार पार्टी हाउस।"

बड़े मामा अब इस दुनिया में नहीं हैं।

घर में बहुत कुछ बदल गया।

पीढ़ियाँ बदल गईं।

लेकिन नाम नहीं बदला।

आज भी यदि किसी को रास्ता बताना हो तो गाँव वाले कहते हैं:

"उस चौराहे से सीधे जाइए। फिर बाईं तरफ मुड़िए। जो घर दिखाई देगा, वही कीलमार पार्टी हाउस है।"

इतिहास की पुस्तकों में शायद इस घर का कोई उल्लेख न मिले।

लेकिन गाँव की सामूहिक स्मृति में यह एक स्मारक की तरह जीवित है।

एक कील।

एक हथौड़ा।

एक भगवती।

एक बुज़ुर्ग महिला।

और पी. टी. उषा के रिकॉर्ड को चुनौती देने वाली एक दौड़।

इन्हीं सबने मिलकर उस घर को अमर बना दिया।
                                     



- बिनोय एम. बी.
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प्रथम मंजिल,चेलूर, सेवेंथ एवेन्यू
कोरापथ लेन,राउंड नॉर्थ,त्रिशूर - 680001
केरल, मोबाइल :9074487685

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