मोहन राकेश द्वारा रचित नाटक 'आधे अधूरे' मध्यवर्गीय पारिवारिक विघटन, मानसिक अकेलेपन और स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलता का दस्तावेज है।
आधे अधूरे नाटक में जुनेजा का चरित्र चित्रण | मोहन राकेश
मोहन राकेश द्वारा रचित नाटक 'आधे अधूरे' मध्यवर्गीय पारिवारिक विघटन, मानसिक अकेलेपन और स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलता का दस्तावेज है। इस नाटक में जुनेजा एक अत्यंत महत्वपूर्ण और केंद्रीय चरित्र है। यद्यपि वह नाटक में केवल अंत में प्रत्यक्ष रूप से सामने आता है, लेकिन उसकी उपस्थिति और प्रभाव पूरे नाटक में महसूस होता है।
नाटककार ने तो जुनेजा के व्यक्तित्व को इस रूप में विश्लेषित कर दिया है-काले सूट वाले पुरुष का अन्तिम रूप-जुनेजा, जो नाटककार के परिचयात्मक शब्दों में, "पतलून के साथ पुरानी काट का लम्बा कोट । चेहरे पर बुजुर्ग होने का खासा एहसास। साथ ही काईयाँपन ।" क्या वह वास्तव में ऐसा ही है? यदि सावित्री की दृष्टि से देखा जाये तो वह तो उसे अपने पति महेन्द्रनाथ की दुर्बलताओं और पतन का कारण मानती है और यदि उसके सोच को, जो उसने महेन्द्रनाथ के प्रति प्रकट किया है कि महेन्द्रनाथ की सबसे बड़ी दुर्बलता सावित्री के प्रति उसका अन्धा प्रेम है। इस सन्दर्भ में जुनेजा यह स्वीकार करता है कि यदि सावित्री के साथ महेन्द्रनाथ इस सीमा तक न बँधा होता, तो निश्चय ही उसका अपना एक अलग से व्यक्तित्व और महत्व होता । एक तरह से नाटककार ने जुनेजा को नाटक के कथ्य और कथानक के पर्यवेक्षक की भूमिका प्रदान की है। उसकी चरम परिणति और निष्कर्ष भी जुनेजा के माध्यम से ही सामने आते हैं। इन सब कारणों से पुरुष चार के रूप में जुनेजा का एक अलग महत्व एवं व्यक्तित्व है। यद्यपि सावित्री के शब्दों में वह भी एक ही चेहरा है-अलग मुखौटे वाला एक ही पुरुष का चेहरा । वास्तविक चरित्रगत विशेष्ना, जो भी किसी पात्र की नाटककार दिखाना चाहता है, वह उसे सावित्री की - अर्थात् एक आधुनिक भौतिक युग की तृषा-पीड़ित नारी के दृष्टिकोण के अन्तर्गत रखना चाहता है। वह प्रत्येक पुरुष को उसके स्वतन्त्र व्यक्तित्व में नहीं देखती, वह उसे केदल ऐसे पुरुष के रूप में देखना चाहती है, जो समर्थ हो, अर्थात् पूर्ण हो और उसकी पूर्णता की परिभाषा, सावित्री की अपनी परिभाषा है।
नाटक में जुनेजा की चर्चा महेन्द्रनाथ अपने परम सहायक के रूप में करता है-"सोच रहा था जुनेजा के यहाँ हो आता। वह छः महीने बाहर रहकर आया है। हो सकता है कोई नया कारोबार चलाने की सोच रहा हो, जिसमें मेरे लिये ।" इसके विपरीत सावित्री उसे अपनी बरबादियों का मूल कारण समझते हुए कहती है-"तुम्हारे लिए तो पता नहीं क्या-क्या करेगा वह जिन्दगी में, पहले ही कुछ कम नहीं किया है।" और जब महेन्द्रनाथ जुनेजा द्वारा हमेशा अपनी मदद करने की बात कहता है, तो सावित्री तल्ख हो उठती है-"न करता मदद, तो उतना नुकसान न होता जितना उसके मदद करने से हुआ है।" जुनेजा के साथ मिलकर किये गये काम-धन्धों में पड़ने वाले घाटों के बारे में वह फिर कहती है-"पहली बार में जो हुआ, सो हुआ। दूसरी बार फिर क्या हो गया ? वही पैसा जुनेजा ने लगाया, वही तुमने लगाया। एक ही फैक्ट्री लगी, एक ही जगह जमा-खर्च हुआ। फिर भी तकदीर ने उसका साथ दिया, तुम्हारा नहीं दिया।" स्पष्ट है और कहने का तात्पर्य यह है कि जुनेजा के सम्बन्ध में सावित्री और महेन्द्रनाथ के विचार परम्पर एकदम विरोधी हैं। जुनेजा को अपना सच्चा हमदर्द मानकर ही महेन्द्र अक्सर घर में दंगा-फिसाद कर शुक्र-शनीचर को, फिर लौट आने के लिए उसके घर चला जाया करता है। अब भी वह पत्नी (सावित्री) की चख चख से ऊबकर जुनेजा के यहाँ ही चला जाता है।
जुनेजा के प्रत्यक्ष दर्शन पुरुष चार के रूप में हमें नाटक के अन्तिम पृष्ठों में ही होते हैं। वह महेन्द्रनाथ के कहने से ही अन्तिम बार सावित्री को समझाने का प्रयत्न कर देखने के लिए उनके यहाँ आता है, ताकि चख-चख खत्म हो और सभो शान्ति से रह सकें। पर सवित्री का उस पर अविश्वास उसे काइयाँ समझने के कारण ही अधिक है । आर्थिक और व्यापारिक दृष्टि से जुनेजा का जीवन सफल भी है। जुनेजा महेन्द्रनाथ की दुर्बलतायें पहचानता है और मानता है कि सावित्री को आन्तरिक रूप से चाहना ही उसकी सबसे बड़ी दुर्बलता है, वह बिन्नी को बताता है कि उसी कारण वह सावित्री को अन्तिम बार समझाने के लिए वहाँ आया है। अपनी मान्यताओं के अनुसार ही सावित्री से मुलाकात होने पर वह उससे स्पष्ट कहता है-"तुम किसी तरह छुटकारा नहीं दे सकती उस आदमी को ? तुमने इस तरह शिकंजे में कस रखा है उसे कि वह अब अपने दो पैरों पर चल सकने लायक भी नहीं रहा।" इस प्रकार की बातें और जुनेजा के विचार मनोवैज्ञानिक धरातल पर ही उचित प्रतीत होते हैं। इस प्रकार नाटक में महेन्द्रनाथ की आन्तरिक असमर्थताओं को व्यक्त करने वाला पात्र तो जुनेजा है ही, सावित्री की आन्तरिक स्थितियों को भी उघाड़कर नाटक के दर्शकों और पाठकों के सामने लाता है । जुनेजा महेन्द्रनाथ के जीवन में कहाँ तक घुसा हुआ है, सावित्री के शब्दों में पढ़िये-
'जब से मैंने उसे जाना है, मैंने हमेशा हर चीज के लिए उसे किसी-न-किसी का सहारा ढूँढ़ते हुए पाया है। खासतौर से आप (जुनेजा) का। यह करना चाहिए या नहीं - जुनेजा से पूछ लूँ। यहा जाना चाहिए या नहीं-जुनेजा से राय कर लूँ। कोई छोटी-से-छोटी चीज़ खरीदनी है, तो भी जुनेजा की पसन्द से। कोई बड़े-से-बड़ा खतरा उठाना है - तो भी जुनेजा की सलाह से । यहाँ तक कि मुझसे ब्याह करने का फैसला भी कैसे किया उसने? जुनेजा की हामी भरने से।" जुनेजा लाख दम भरे महेन्द्रनाथ की दोस्ती का और उसके उस पर भरोसे का, पर सावित्री की दृष्टि में यह सब उसका काइयाँपन ही है। तभी तो वह मानती है कि जुनेजा ने अपने स्वार्थ की दृष्टि से उसके पति महेन्द्रनाथ का मनमाना इस्तेमाल किया है, परिणामस्वरूप अपने आप में एक व्यक्ति के रूप में वह कुछ भी नहीं रह गया। जुनेजा के काइयाँपन की पोल खोलते हुए वह स्पष्ट कहती है- इस बोध को और कोई नहीं ढो सकता, महेन्द्रनाथ दो लेगा। प्रेस खुला, तो भी। फैक्टरी शुरू हुई, तो भी। खाली खाने भरने की जगह पर महेन्द्रनाथ, और खाने भर चुकने पर? महेन्द्रनाथ कहीं नहीं। महेन्द्रनाथ अपना हिस्सा पहले ही ले चुका है, पहले ही खा चुका है। स्पष्टतः इन सब कारणों से ही नाटककार ने पुरुष चार के रूप में जुनेजा का परिचय देते हुए उसके लिए 'काइयाँपन', शब्द का प्रयोग किया है, उसे 'काइयाँ' विशेषंण से सम्बोधित करने के लिए नाटककार ने किन्हीं यथार्थ क्रिया-प्रतिक्रिया का निर्धारण नहीं किया।
जो भी शब्द है या उसके चारित्रिक विश्लेषण को सावित्री जिस रूप में उजागर करती है, वही नाटककार स्वीकार करता है। इसे हम नाटककार की रचनात्मक निर्बलता भी कह सकते हैं। वैसे सावित्री द्वारा दिये गये उसके ब्यौरे से भी वह कांइयाँ कम, व्यावहारिक और व्यापारिक चरित्रपटु व्यक्ति अधिक लगता है। क्या ऐसा सम्भव है कि वह महेन्द्रनाथ का शोषण करता रहे और महेन्द्रनाथ हर हालत म उसके सामने हर स्थिति में स्वयं को प्रस्तुत करता रहे? और जुनेजा, मानवीयता के नैतिक मानदण्डों से गिरकर, जिनसे गिरा हुआ नहीं दिखाई देता. क्योंकि वह सावित्री के आचरण से महेन्द्रनाथ के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दिखाई देता है! सावित्री के उपर्युक्त ब्यौरों से वह वास्तव में सुलझा हुआ काइयाँ ही प्रमाणित होता है, जो अपना घर भरने के लिए दोस्ती की आड़ में दूसरों के साथ कोई-सा भी खिलवाड़ कर सकता है। सावित्री जुनेजा को एक प्रकार से इसी बारे में चुनौती देती हुई-सी कहती है- पर असल में उसकी बरबादी की नींव क्या चीज खोद रही थी... क्या चीज और कौन आदमी अपने दिल में आप भी जानते होंगे।" इस कथन से भी जुनेजा के चरित्र की वे आन्तरिक रेखाएँ, जो कि नाटककार एक पुरुष के चौथे व्यक्तित्व के रूप में अर्थात् पुरुष चार के रूप में उभारना चाहता है, स्पष्ट हुई-सी मालूम होती है, परन्तु स्पष्ट होती है, यह कहना उचित नहीं है। यह तो सावित्री और जुनेजा के बीच विवाद की बात है।
ऐसा स्पष्ट लगता है कि सावित्री के मन में जुनेजा के प्रति आक्रोश तो है ही, वह उसकी तीक्ष्ण दृष्टि से भी शोषित रहती है और उससे अपने बचाव के लिए ही उस पर वार करती है, अर्थात् उसके व्यवहार की पर्तें उघाड़ती है, जिनके यथार्थ का चित्र क्या है, यह तो जुनेजा ही अधिक जानता है, सावित्री उतना नहीं, परन्तु जुनेजा सावित्री के हर भेद को जानता है, तभी तो वह सावित्री के अन्तर्मन की पर्तें एक- के बाद-एक उघाड़ता चला जाता है। विगत की बातों के दुहराने पर जब सावित्री कहती है कि वह जुनेजा की इज्जत करती थी, तब वह उसका मजाक उड़ाता हुआ कहता है कि- "तुम इज्जत कह सकती हो उसे, पर वह इज्ज़त किसलिए करती थीं? इसलिए नहीं कि एक आदमी के तौर पर मैं महेन्द्र कुछ बेहतर था, तुम्हारी नजर में। मगर सिर्फ इसलिए कि मैं जैसा भी था, जो भी था- महेन्द्र नहीं था। पहले कुछ दिन जुनेजा एक आदमी था, तुम्हारे सामने।" वह कहकर स्पष्ट करना चाहता है कि महेन्द्रनाथ से ऊबकर सावित्री ने उसकी तरफ भी प्रेम का पग बढ़ाया था, परन्तु वह अपनी इच्छा का पूरापन न पाकर वापिस लौट आई। अतः सावित्री के समूचे व्यक्तित्व का विश्लेषण जुनेजा इन शब्दों में करता है।
"असल बात यह है कि महेन्द्र की जगह इनमें से कोई भी आदमी होता तुम्हारी ज़िन्दगी में, तो साल-दो साल बाद तुम यही महसूस करतीं कि तुमने एक गलत आदमी से शादी कर ली है। उसकी जिन्दगी में भी ऐसे ही कोई महेन्द्र, कोई जुनेजा, कोई शिवजीत या कोई जगमोहन होता, जिसकी वजह से तुम यही सब सोचतीं, यही सब महसूस करती।" और फिर वह नाटक में पारिवारिक स्तर पर उभरी समस्या का सारा बोझ सावित्री पर डालते हुए- (शायद नाटककार भी यही विचार रखता और यही कहना चाहता है।)-कहता है-"क्योंकि तुम्हारे लिए जीने का मतलब रहा है, कितना कुछ एक साथ होकर, कितना कुछ एक-साथ पाकर, कितना-कुछ एक-साथ ओढ़कर जीना। वह उतना कुछ कभी तुम्हें एक जगह न मिल पाता, इसलिए जिस किसी के साथ भी जिन्दगी शुरू करतीं, तुम हमेशा इतनी ही खाली, इतनी ही बेचैन बनी रहतीं। वह आदमी भी इसी तरह तुम्हें अपने आस-पास सिर पटकता और कपड़े फाड़ता नज़र आता और तुम ।" जुनेजा के ये शब्द ही नाटक के कथ्य एवं कथानक को चरम परिणति देने वाले हैं।
नाटक के अन्य पात्रों के समान जुनेजा का व्यक्तित्व एवं चरित्र भी वास्तव में परिवेशगत ही अधिक चित्रित किया गया है। यह तथ्य जुनेजा के ही इस कथन से स्पष्ट हो जाता है कि जगमोहन को लेकर वह सावित्री से कहता है-"मैं जगमोहन के साथ हुई तुम्हारी बातचीत का सही अंदाजा लगा सकता हूँ, क्योंकि उसकी जगह मैं होता, तो मैंने भी तुमसे यही सब कहा होता।" जुनेजा का यह कथन उसे वास्तव में एक ही पुरुष का विभिन्न मुखौटा लगा एक ही चेहरा प्रमाणित कर देता है। इस प्रामाणिकता में ही उसके वास्तविक चरित्र की सफलता एवं सार्थकता है।
इस प्रकार जुनेजा 'आधे अधूरे' नाटक का वह सूत्रधार है जो अंतिम क्षणों में आकर नाटक के सभी पात्रों की 'अधूरेपन' की भावना को उजागर कर देता है। वह सावित्री के भ्रम को तोड़ता है और यह साबित करता है कि इंसान अपनी कमियों के साथ ही पूरा होता है; पूर्णता की तलाश एक छलावा है।


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