जादू की झप्पी | हिंदी कहानी आज काणमू परिवार में बहुत बड़ा उत्सव, त्यौहार है। वैसे तो भारत में प्रति दिन कोई ना कोई उत्सव होता है।
जादू की झप्पी | हिंदी कहानी
आज काणमू परिवार में बहुत बड़ा उत्सव, त्यौहार है।
वैसे तो भारत में प्रति दिन कोई ना कोई उत्सव होता है। कहा जाता है तीन सौ पैंसठ दिन मे सात सौ उत्सव है। विभिन्न धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र, जाति, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय उत्सव लोगों को हर्षित करते है। आपस में शुभ कामना, बधाई, मिठाई, उपहार का आदान प्रदान होता है। लोगों मे नई उर्जा का संचालन होता है। बुझ चेहरा मुस्करा उठता है। पनीलि आँख चमक उठती है। पुराने कपड़े छू मंतर हो जाते है, नई पोशाक धारण कर लेते है। घर सुगंध, पकवानों की सुगंध से भर जाता है। आने जाने वालों का तांता, मेले की रेलम पेल, आनंद, हंसी खुशी का नाम, का कारण है उत्सव।
आज काणमू परिवार का बिन्ता री-नीट परीक्षा के लिए जा रहा है।
***
पिछली परीक्षा निरस्त हो गयी थी। बिन्ता का हौसला पस्त। कितनी तैयारी करी थी। बचपन से सपना देखा, दिखाया गया था, डाकटर बिन्ता काणमू। मानवता का सच्चा सेवक, बीमार को स्वस्थ करने का कार्य। जीवन बचाने वाला, जीवन दान देने वाला।
बिन्ता ऐसा ही कार्य करना चाहता था। मार धाड, गोली बंदूक उसे पसंद ना थी।
जैसे ही पहली परीक्षा निरस्त हुई, उस का रो रो बुरा हाल हो गया।
“सारी मेहनत पर पानी फिर गया। अब रात रात जग कर कुछ नहीं पढ़ पाऊँगा। अब तो क्यूट का भी परीक्षा का फॉर्म छूट गया। मुझे गाँव भेज दो, वहीं दादी नानी के साथ खेती कर लूंगा। भूल जाओ, डक्ट्ररी, अपना खेत, अपने पशु, अपना गाँव।”
उस की हताशा देख मम्मी ने पापा से कहा
“जैसा कह रहा है करो। कोई जोर नहीं। कल ही अम्मा के पास छोड़ देंगे।”
“अरे ऐसे हिम्मत नी हारते। तैयार तो है। फिर से पेपर देना है। एक बार बात करता हूँ।”
भोजन के समय बात चीत होती रही। बीच में पापा बोले
“बेटा बिन्ता, दे लो री-नीट। हार जीत जीवन है।”
बिन्ता अंगुली मेजपोश पर घिसता रहा। मम्मी ने एक चम्मच सब्ज़ी और डाल दी।”
पानी पी, बिन्ता, खाना छोड़ उठ गया।
“क्या हुआ? खाने से नी नाराज़ होते। आ बिन्ता, चल दादी के पास चल, दो चार दिन नानी के पास रह लेना। अब परीक्षा की बात नहीं होगी। देखो जी, बिन्ता होशियार है, जो चाहे करे, हम उस के साथ रहेंगे।”
मम्मी ने बिन्ता के कपड़े रोलर बैग में संभाल दिये।
पापा ने मोबाइल में रिचार्ज करवा कर, बिन्ता को कार में बैठा कर दादी के पास छोड़ने चल दिये।
***
दादी ने बिन्ता और पापा को गले लगा लिया। दो घर दूर रहने वाली नानी आ गयी। बिन्ता को गले से लगा कर, लीची छील कर देने लगी।
प्यार की झप्पी लगते ही बिन्ता को बचपन की याद आ गयी।
नई कमीज़, पैंट, जूते, मोजे, बैग, पानी की बोतल, रबड़, पेंसिल, कापी, सब कुछ नया। नये दोस्त, नये खेल, नया लंच बॉक्स। बिन्ता, बहुत खुश था।
रोज़ जिद करता था,
स्कूल भेजो, चुमुरि दीदी के साथ जाना है।
उस ने बाहर देखा, सुंदर, सुहानी धूप खिली है, बरसात के बाद वाली। नीला आकाश, हरी कोपल, फूल से लदे पेड़ और झाडी। सफेद, पीला फूल, लाल गुलाब।
ऐसा ही दिन था। दादी के पास बैठ पांच वर्षीय बिन्ता कह रहा था।
"दादी मेरे दोस्त कहाँ गए? मुझे खेलना है? मेरा भाई कहाँ गया? "
"स्कूल, तू भी स्कूल जाना, थोड़ा बड़ा हो जा।"
"मैं तेरे साथ रहूँगा। तू चलेगी स्कूल? "
"हाँ, मेरा बच्चा, तेरा बैग ले कर चलूँगी।"
"मेरे दोस्त स्कूल कैसे गए? चुमुरि स्कूल कैसे गयी?"
"सड़क से।"
"ये, सड़क स्कूल जाती है?"
"नहीं, सड़क कहीँ नहीं जाती, एक जगह रहती है। लोग उस पर जाते है। कोई काम पर, कोई स्कूल, कोई घूमने।"
"घमनय् क्या होता है, दादी?"
"घूमना होता है, नई जगह जाना, किसी और जगह जाना।"
"हम कब जयेंगे घूमने? "
"जब छुट्टी होगी, बहन की, मम्मी की, पापा की, तब जायेंगे।"
"कहाँ जाएंगे?"
"चिड़िया घर।"
“चल देख। वो रहा चिड़िया का घर। उस मे चिड़िया का बच्चा है। देख अभी चिड़िया खाना लायेगी। चिड़िय अच्छी मम्मी है। चिड़ा अच्छा पापा है। चिड़िया आसमांन मे घूमती है।"
"ये, चिड़िया घर नहीं, चिड़िया घर में जानवर हैं। हिरण, हाथी, शेर, बाघ, लंगूर, सांप, कछुआ, मछली, दरयायी घोड़ा, मगरमछ।"
"ये चिड़िया घर में हैं? ये अपने घर में क्यों नहीं रहते? ये चिड़िया के दोस्त हैं? ये चिड़िया के मेहमान हैं?"
"नहीं, चिड़ियाघर इन सब का घर है। इन को जंगल से, नदी से ला कर रखा है।"
"जंगल से, जंगल इन का घर है, सब को इन के मम्मी, पापा, दादू, दादी, भाई, दीदी सब चिड़िया घर में हैं? ये चिड़िया घर घुमने आये?"
"नहीं, एक बाघ, चार हाथी, पचास हिरण, ऐसे रखा, इन का परिवार जंगल, नदी में है। इन को रखा है कि हम देख ले।"
"ये आपने घर कब जायेंगे?"
"कभी नहीं।"
"दादी मुझ भूख लगी है। चिड़िया को भूख लगी है। सांप को भूख लगी है। बंदर को भूख लगी है।"
"चल, क्या खायेगा?"
"मछली क्या खायगी? लंगूर क्या खायेगा? चीन्टी क्या खायगी? दादी, चिड़िया घर मे चीन्टी है?"
"हौ, सब को खाना दे।"
"चिड़िया चिंटी खायगी, बंदर फूल खायेगा। मै बिस्कुट खाऊँगा।"
"आ, जल्दी आ।"
"चुर्मरि दीदी कहती है
शैतान बच्चा डांट खायेगा, अच्छा बच्चा माल खायेगा।
चोर, पुलिस की मार खायेगा, मेहनती माल पायेगा।
मेहनत कर, याद कर ।
...आ.... च, छ, ज...... ज्ञ।"
"दादी, मैं अच्छा बच्चा हूँ।"
बिन्ता को एक एक बात याद आ रही थी।
चिर प्रतिकक्षित दिन आ गया। बड़ी प्रतिक्षा के बाद आया।
पापा के लाये कपड़े, नानी के दिये जूते मोजे, स्कूल बैग देख कर बिन्ता खुश हुआ। रात को समान छू छू कर देखता रहा।
सुबह सुबह उठ गया।
"ददूडी उठ, मुझे नहला " अपनी दादी की रजाई खिंचते हुआ बोला।
"सो जा बेटा, अभी बहुत समय है, नौ बजे जायेंगे।"
"नहीं, तैयार कर, मुमुरि दीदी चली जायेगी।”
"नहीं जाती बेटा, साथ ले जायेगी। अच्छे से ले जायेगी।
स्कूल में भी ध्यान रखेगी। कुछ होगा तो बता देना।"
"मैं बड़ा हो गया, मैं देख भाल कर लूंगा। आज तैयार कर दे, कल से सब अपने आप करूँगा।"
दादी उठ गयी।
"आ, दूध पी ले।" मम्मी ने आवाज़ लगाई।
"नहीं नहा कर पि यू गा।"
"मम्मी, टिफिन में हलवा, पुरी चना रखना।"
"अच्छा"
"और दो केले, एक मेरे दोस्त के लिए। "
"दोस्त? तेरे दोस्त भी बन गये? "
"हाँ, राजू भी मेरी क्लास में आ रहा है। चुर्मुरि दीदी ने बताया। उस की बहन, रमा बहन ने चुर्मुरि से कहा।"
चार माह पहले प्रवेश परीक्षा हुई थी। अपने शहर, थात्यु के सब से जाने माने विद्यालय मे प्रवेश कठिन था, पर मेहनत कर के काणमू परिवार का बिन्ता प्रवेश पा गया।
बिन्ता को दादी की प्यारी झप्पी में बंधे सब बात याद आ गयी।
"दादी, कहानी सुना।"”
“बिन्ता बेटे, बचपन में भी येही अग्रह था तेरा। याद कर।”
“ठीक से बता, दादी। नानी तुम बताओ।”
नानी ने एक मीठी झप्पी लगते हुए कहा
“तू कहानी कहता, दादी कहती।”
"कहानी? पहले क, ख, ग सुना।"
"कहानी सुना, दत्य की कहानी। "
"दत्य कुछ नी होता।"
"होता है, रात को रोता है, जब हम सोता है। परदे के पीछे रहता है। मैं खत्म कर दूगां। "
"नी बच्चा, तू रहने दे। रात को जानवर आवाज़ करता है। "
"कौन जानवर?"
"बाघ, काकर, उल्लू, कुत्ता, बिलौटा।"
"आवाज़ क्यो करते हैं?"
"बाघ, उल्लू, बिलौटा शिकार करते हैं, काकर् आपने साथी को आवाज़ देता, कुत्ता चोर पकड़ता है।"
"चौकीदार कहता है, जागते रहो"।
"हाँ, जागते रहो।"
"चौकीदार सोता नहीं?"
"नहीं, वो सोता नहीं, दिन में सोता है।"
"मैं भी दिन में सोता हूँ, रात को भी सोता हूँ। "
"अच्छा बच्चा, मैं भी दिन में सोती, रात को सोती हूँ। "
"अच्छी दादी, प्यारी दादी, जल्दी से एक पैसा दे दे, प्यारी दादी, तू कंजूसी छोड़ दे।"
"क्या करेगा पैसा का ?"
"पैसा, पैसा, पैसा से क्या करते, गुल्लक मे भरते। गुल्लक में डालो! "
"फिर? "
"जब भर जायेगी, तब फोडुगा। झूं, झा झुँ।"
"अच्छा, कितना पैसा है तेरी गुल्लक में?"
"एक, दो, चार, पांच, सात, दस, तेरा, सोलह, सत्रों, बीस, आड नौ। "
"ठीक से बोल।"
"उनिस्, बीस, पांच, सात, आठ, नौ, ग्यावा, तेरा, पंद्रह।
भाग गया बंदर। ये बंदर कहाँ भाग गया।"
"आपने घर, वन में। "
"वन, टू, थ्री, सेवन, निंन, थिरतीं, ट्वाएँटी, सिक्स, सेवन, ईलवेंन।"
"वन माने जंगल, बंदर जंगल में रहता है।"
"उस का दोस्त कौन है?"
"एक और बंदर, बहुत से बंदर, जंगल में रहते हैं।"
"और शेर?"
"वो भी, जंगल में है।"
"शेर और बंदर दोस्त हैं।"
"बंदर, शेर को चॉकलेट देगा।"
"नहीं वो चॉकलेट नहीं खाते।"
"चॉकलेट खा, दाँत साफ कर, फिर सो जा, अच्छा बच्चा।"
बिन्ता, नानी की गोद में लेट गया। आँख लग गयी, सपना आया।
दादी ने बदन पोंछ कर कपड़े पहना दिये।
बिन्ता शिशे के सामने खडा़ हो गया।
"बाल अपने आप बनाउगा। " कह कर दोनों ओर से मुर्गे की कल्गी जैसे खड़े कर लिए।
दादी मुस्करा रही थी। बिन्ता दौड़ आया।
भरी दोपहर, पसीना पसीना, पेड़ की हवा, अच्छी लग रही है। अंदर से अच्छा बाहर है। गाड़ियां आ जा रहीं हैं। हेलिकॉप्टर, पीला हेलिकॉप्टर काफी नीचे उड़ कर चक्कर लगा रहा है। विभिन्न चिड़िया आस पास फुदक रही है। मुर्गा मुर्गी घूम रहे।
"दादी, मैं बाहर आऊँ?"
"हाँ, आ जा।"
"ये, क्या है?"
"चिंटी, नहीं हाथ मत लगा, नहीं बेटा, चीटी, नहीं पर जूता नहीं रखते।"
"क्यों? "
"चीन्टी में जान है। चीन्टी, मेहनती है।"
"मेहंति, चीन्टी नहीं मेहनत करती है?"
"हैं, एक एक दाना ले जाती है। जो दाना गिर जाता है, चीन्टीk, नहीं ले जाती है? देखा है?"
"ये, दाना कहाँ से आता है?"
"जब हम फसल जमा करते है। दाल चावल बीनते है, खाते समय खाना गिराते हैं, पौधे से बीज गिर जाते है। "
" चीन्टी सब ले जाती है। चिंटी मेहनती है। "
"चीन्टी, नहीं किसान की मेहनत को बर्बाद नहीं होने देती। कभी खाना मत फेकना।"
"चीन्टी, नहीं खाना नी फेकती।"
"दादी, देख, देख, ये क्या है?"
"तितली।"
"तितली उडी, बस में चढ़ी, ड्रिवर् ने कहा आ जा मेरे पास। तितली बोली हट बदमाश।"
"नि बच्चा ऐसा नी बोल, ऐसा बोल
तितली उडी, फूल ने कहा, आ जा मेरे पास
तितली कहे- मैं चली आकाश। "
"मैं पकड़ रहा तितली ?"
"तु नी पकड़ पाता।"
"मैं, सुपरमेन, हीरो हूँ, ये देख।"
"ये, तितली नहीं, रमुला पिट्ठू हैं।"
"पिट्ठु नहीं, मेरा दोस्त है दोस्त, ये नही काटता मुझे।"
"छोड़ दे, जाए उड़ जे। "
"ये नी काटता, मक्खी ने काटा, मेरी आँख सूज गयी। मैं नही रोया। मैं सुपर मन हीरो हो।"
"तब तो, मत पकड़, उड़ने दे।"
"हम उड़ सकते?"
"हाँ, हेलिकॉप्टर मे बैठ जा।"
"आ जा, हेलिकॉप्टर आ जा, आ यहाँ आ।"
"यहाँ नहीं उतार सकता।"
"क्यो?"
"यहाँ पेड़ है।"
"पेड़ काट दो।"
"ना, मक्खी ने काटा, दर्द हुआ ना।"
"है हुआ, आँख सूज गयी। "
"तब पेड़ को भी दर्द होगा, पेड़ रोयेगा।"
"पेड़ मेरा दोस्त है, पेड़ पर झूला है। पेड़ पर शहतूत है। पेड़ मेरा दोस्त है। पेड़ नी काटना। पेड़ सुपर मन हीरो है।"
"शहतूत धो कर खा।"
"चीटी, शहतूत खा, मैं झूला मे उड़ रहा।"
बिन्ता की आँख खुल गयी।
नानी दादी प्यार से माथे पर आशीर्वाद का हाथ फेर रही थी।
कपड़े बदल, बिन्ता दूध पीने बैठ गया।
दादी को फिर याद आया। नानी को बताने लगीं।
“उस दिन, दिन भर झमा झम बारिश हुई, नये खिले कोपल, टूट टूट कर गिर गए। ओले इतने की पतों मे छेद हो गए। भीगते बच्चे घर लौट कर, आग के पास बैठ गए। काफुलि, मंदवा रोटी, मटर आलू और बुरांश की सब्ज़ी, चटकारे ले कर सब नेखाई। वाह, चावल का पापड़ और चौलाई का लड्डु ऊपर से घी।
सोच ही रहे थे क्या करें, कि अचानक से धूप खिल आई। पटली ले कर पेड़ के नीचे बैठ गयी।
पानी, खेत में, छत पर, पंखुरी पर, घास पर, चांदी सा चमक रहा था।
छोटा सा बादल, पहाड़ के बीच उड़ रहा था। बाकी बादल, घाटी पार, शिवालिक पर्वत माला के उप्पर जमा थे। आसमां कच नील। छोटी छोटी चिड़िया, फुदकती, उड़ती गा रही, दाना चुग रही। ये प्यारा बच्चा भी बाहर आ गया।
"दादी, ये बारिश क्यों होती है?"
"गहुँ को पानी चाहिये, नदी को पानी चाहिए।"
"क्या मस्त है ना बादल, जब चाहो घूमो, ऊपर नीचे, दिल्ली, कोलकत्ता, चेन्नै, इंदौर। क्या ये लन्दन भी जाता है?"
"जाता है, कहीं भी जाए, पानी बन कर समुद्र मे मिल जाता है, फिर भाप बन कर उड़ जाता है।"
"ये थकता नहीं?"
"सूरज देख, रोज़ रोज़ चक्कर काटता। थकता नहीं।"
"गलत, पृथ्वी घूम रही है, घूम घूम, गोल गोल, पृथ्वी घूम।"
"एक टांग पर घूम, और पेड़ के गोल घूम।"
"मुझे घूमना है, सब जगह।"
"पहले अपना शहर घूम, देश घूम।"
"घूमेगा कैसे? हमारे यहाँ ट्रेन नहीं है।"
"बस से चल।"
"पिछले रविवार को राज भवन में वसंत उत्सव देखा।"
"कितना मस्त, फूल, बाँस, बोनसाई या बौना पेड़।"
"नारंगी जूस और पुदीना जूस।"
"बढ़िया, बढ़िया, अबकी बार राजपुर या झंडे का मेला चले ? "
"ऐ, भूकांप, भूकांप"।
"कहाँ, क्या? "
"भूकम्प आया? "
"इधर से आया, तो मैं, उधर चला जाऊंगा"।
"अरे, भुकम्प नीचे से जमीन हिलती है।"
"हिलती है। हिल हिल। "
सूरज अस्त हो रहा था।
"बाय, सूरज, कल मिलना। "
"आज रात, बाहर ही रहो, तेज झटका ना आये।"
अस्तांचल मे सूर्य ढल गया, चंदा और तारे चमक उठ।
पापा, मम्मी, नानी, दादी आज बड़े प्रसन्न है।
आज विद्यालय प्रवेश उत्सव है।
सब से पहले दादी की दादी ने मनाया, जब वो स्कूल गयी थी। मिठाई बांटी, दादी भी बाँटेगी।
बिन्ता एक डिब्बा मीठा ले कर चुर्मुरि दीदी के साथ स्कूल चल दिया।
***
दादी नानी की प्यार की झप्पी ने स्कूल का पहला दिन, बिता बचपन याद दिला दिया।
बिन्ता सोचने लगा “कितनी हिम्मत थी बिन्ता में? मैं कितनी मेहनत की बात करता था। आज, अब क्या हो गया? एक री-टेस्ट से हिम्मत हार गया। दादी नानी, आज भी मेहनत करती हैं। खेती करती हैं। सब को प्यार करती हैं।”
बिन्ता खडा हो गया
“मैं फिर नीट टेस्ट दूंगा। पापा, सोच लिया, चलिए, जो हो सो हो, मैं री-नीट के लिये तैयार हूँ।”
दादी नानी की प्यार की झप्पी ने वो कर दिखाया जो कोई मनोवैज्ञानिक, शिक्षक या भाषण नहीं कर सकता था।
- मधु मेहरोत्रा


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