दुनिया एक प्यारा झूठ है, हर चेहरे के पीछे छिपा एक रूप है। यहाँ सब नक़ाब में जी रहे हैं, अपने असली चेहरे को छिपा रहे हैं। झूठा भी सच का गीत सुनाता है
कब मरता है इंसान
कब मरता है इंसान...
क्या जब गोली से उसका जिस्म गिर जाता है?
या जब खंजर से दिल चीर दिया जाता है?
क्या जब रास्तों पर कोई गाड़ी उसे कुचल जाए,
या भूख से तड़पकर वह ख़ुद ही बिखर जाए?
आख़िर कब मरता है इंसान...?
क्या मौत सिर्फ़ जिस्म का रुक जाना है,
या साँसों का धीरे से थम जाना है?
या कुछ और भी होता है इसके पीछे,
जो आँखों से नहीं, सिर्फ़ दिल से दिखे...
इंसान तब मरता है...
जब लोग उसे धीरे-धीरे भूल जाते हैं,
उसकी बातें, उसकी यादें सब धुँधली हो जाती हैं।
जब कोई नाम लेकर उसे पुकारता नहीं,
और उसका ज़िक्र कहीं भी होता नहीं।
इंसान तब मरता है...
जब उसकी उम्मीदें टूटकर बिखर जाती हैं,
और ख़ुद से ही उसकी राहें दूर हो जाती हैं।
जब दर्द भी महसूस होना बंद हो जाए,
और दिल भीतर ही भीतर पत्थर-सा बन जाए।
जब कोई समझने वाला पास नहीं होता,
और हर रिश्ता बस एक एहसास नहीं होता...
तब ख़ामोशी के अँधेरे में, चुपचाप कहीं,
धीरे से
मर जाता है एक इंसान वहीं…
अधूरी सी बातें
कभी–कभी दिल में इतना भर जाता है,
कि हर एहसास भीतर ही मर जाता है।
न आँसू गिरते हैं, न शब्द निकल पाते हैं,
बस ख़ामोशियाँ सीने में घर बना लेती हैं।
भीड़ में रहकर भी खुद से पराए रहते हैं।
रात ढले जब सन्नाटा पास आता है,
हर दबा हुआ दर्द फिर जाग जाता है।
लोग कहते हैं — “तुम बहुत मज़बूत हो”,
काश समझ पाते ये भी एक बोझ होता है।
मज़बूती कोई नेमत नहीं होती,
यह तो टूटकर भी न रोने की आदत होती।
कुछ घाव शब्दों से नहीं भरते,
वे हर धड़कन के साथ और गहरे उतरते।
सीने में चुभती रहती हैं अधूरी सी बातें,
जैसे बंद कमरे में भटकती हों रातें।
हम मुस्कुराते हैं ताकि सवाल न उठें,
क्योंकि हर “क्या हुआ?” से ज़ख्म फिर खुलें।
आईना भी अब अजनबी सा लगता है,
चेहरा अपना होकर भी पराया सा लगता है।
दिल में जमा दर्द जब भारी हो जाता है,
तो इंसान खुद से ही हारा हो जाता है।
हर रोज़ भीतर एक तूफ़ान मरता है,
और बाहर का चेहरा बस चुप रहता है।
काश कोई ख़ामोशी पढ़ पाता,
बिना पूछे बस पास आ जाता।
धीरे से कह देता — “मैं हूँ ना…”
तो शायद यह दिल थोड़ा कम टूटता।
वाह रे दुनिया
दुनिया एक प्यारा झूठ है,
हर चेहरे के पीछे छिपा एक रूप है।
यहाँ सब नक़ाब में जी रहे हैं,
अपने असली चेहरे को छिपा रहे हैं।
झूठा भी सच का गीत सुनाता है,
सच्चाई की चादर ओढ़कर आता है।
कमज़ोर ख़ुद को शक्तिशाली बताता है,
डरपोक भी ख़ुद को वीर दिखाता है।
खुशकिस्मत भी अपना दर्द जताता है,
बदनसीब भी ख़ुद को खुश बताता है।
चेहरे सबके साफ़ नज़र आते हैं,
दिल के कोने में अँधेरे छिप जाते हैं।
सबको चाहिए यहाँ सम्मान,
पर देना भूल गए इंसान।
सामने तारीफ़ के फूल खिलाते हैं,
पीछे ज़हर के तीर चलाते हैं।
वाह रे दुनिया, वाह रे दुनिया,
कितने रूप बदलती है दुनिया।
जितना एक चेहरा हटाओगे,
उतने नए चेहरे पाओगे।
आज रावण भी तुझे देखकर मुस्कुराता होगा,
उसके दस सिर थे, तुझमें अनगिनत छिपे होंगे।
हर सिर में झूठ और चाल छिपी है,
हर रूप में एक नई कहानी लिखी है।
वाह रे दुनिया... वाह रे दुनिया,
तेरी सच्चाई सबसे जुदा है, दुनिया।
एक सवाल
क्यों हर बार,
जब कोई बच्चा
हवा से बातें करने निकलता है,
उसके पंखों पर
किताबों का बोझ रख दिया जाता है?
क्यों उसके हिस्से की धूप
चार दीवारों के नाम लिख दी जाती है?
और उसकी दौड़ती हुई साँसों को
कुर्सियों के हवाले कर दिया जाता है?
क्या सच में
आने वाला कल इतना बड़ा होता है
कि उसके लिए
आज की हँसी को दफ़ना दिया जाए?
क्या काग़ज़ पर लिखे हुए सपने
उस सपने से बड़े होते हैं
जो किसी बच्चे की आँखों में
खुले आसमान को देखकर जन्म लेता है?
और जब वही बच्चा
एक दिन बड़ा हो जाएगा,
इस दुनिया के तराज़ू में
'कामयाब' कहलाएगा,
तो क्या कोई बता पाएगा—
उसकी ख़ामोशी में
क्या कमी रह गई है?
या फिर
कुछ खेल सचमुच अधूरे नहीं छूटते,
वे बस बड़े होकर
इंसान के भीतर
उम्र भर खेलते रहते हैं?
नफ़रत
नफ़रत क्या है, मैं जान न पाया,
किसी के घावों पर हँसना दिल को कभी भाया न पाया।
मेरी रूह ने तो बस इतना सीखा है,
गिरते हुए को थाम लेना, उसे और गिराया न जाए।
कहते हैं नफ़रत एक ऐसी चिंगारी है,
जो पहले अपने ही सीने में अंगार उतारी है।
जिसे लोग हथियार समझकर थाम लेते हैं,
वही उनकी मुस्कानों की अंतिम हत्यारी है।
यह मन के दर्पण पर धुंध बिछा देती है,
हर चेहरे में एक दुश्मन दिखा देती है।
फिर अपने भी अजनबी लगने लगते हैं,
और रिश्तों की धड़कन तक सज़ा बन जाती है।
नफ़रत धीरे-धीरे नहीं मारती,
यह तो भीतर एक शोर उगाती है।
जहाँ कभी प्रेम की नदियाँ बहती थीं,
वहाँ पछतावे की वीरानियाँ बसाती है।
अंतरमन का दर्पण यह दिखाता है,
जिससे तुम सबसे अधिक घृणा करते हो,
वह अक्सर तुम्हारे मन के उसी घाव का प्रतिबिंब होता है,
जिसे तुम वर्षों से छिपाकर रखते हो।
नफ़रत दूसरों का चेहरा नहीं जलाती,
यह तो आत्मा का आईना धुँधला करती है।
यह ऐसी कैद है जिसका दरवाज़ा खुला रहता है,
मगर क़ैदी स्वयं बाहर नहीं निकलता।
वह अपने ही विचारों की सलाखों में,
हर दिन थोड़ा-थोड़ा बिखरता, थोड़ा-थोड़ा मरता है।
नफ़रत की राहों में फूल नहीं खिलते,
वहाँ केवल सन्नाटों के जंगल मिलते हैं।
हर जीत भी हार सी लगती है,
हर उत्सव में अधूरे पल मिलते हैं।
मैंने प्रेम की वह लौ देखी है,
जो आँधियों में भी जलना जानती है।
जो टूटे हुए मन को फिर से जोड़ दे,
जो बंजर रूहों में भी धड़कन बोना जानती है।
इसलिए नफ़रत को अपनाया नहीं मैंने,
उसकी चौखट पर सिर झुकाया नहीं मैंने।
क्योंकि जो दिलों को बाँटकर जीतना चाहे,
उसे इंसान होना अभी आया नहीं।
यदि कभी तुम्हारे भीतर नफ़रत जन्म ले,
तो अपने मन की गहराइयों में उतर जाना।
जिसे मिटाने को आग उठाओगे,
कहीं ऐसा न हो
उसकी लपटों में अपना ही वजूद जला आना।
क्योंकि नफ़रत का अंतिम सत्य यही है,
वह किसी और को ख़ाक करे न करे,
अपने रखने वाले को ज़रूर राख बना जाती है।
नकारा (सुजल गुप्ता) हिंदी साहित्य के एक अत्यंत संवेदनशील युवा रचनाकार हैं। उनके लिए कविता केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन, समय, मानवीय संबंधों और मनुष्य की गहन संवेदनाओं को शब्द देने का एक विनम्र व ईमानदार प्रयास है। उनकी लेखनी समकालीन यथार्थ और मनुष्य के अंतर्मन को बेहद आत्मीयता से टटोलती है। संपर्क: +91 62963 22253 | sg264702@gmail.com


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