व्यापक जीवन अनुभवों की 'अक्षर लीला'

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अक्षर लीला, श्री रमेश कुमार सोनी का नवीन हाइकु-संग्रह है, इसके पूर्व उनके दो हाइकु- संग्रह- 'रोली अक्षत' और 'पेड़ बुलाते मेघ' प्रकाश में आ चुके हैं।

व्यापक जीवन अनुभवों की 'अक्षर लीला'


क्षर लीला, श्री रमेश कुमार सोनी का नवीन हाइकु-संग्रह है, इसके पूर्व उनके दो हाइकु- संग्रह- 'रोली अक्षत' और 'पेड़ बुलाते मेघ' प्रकाश में आ चुके हैं। श्री सोनी हिंदी साहित्य की अनेक विधाओं में सृजनरत तो हैं ही साथ ही वे पर्यावरणविद भी हैं,पर्यावरण संरक्षण हेतु किए गए कार्यो के लिए उन्हें राज्य स्तर पर कई बार सम्मानित भी किया गया है। 

कवि स्वभावतः संवेदनशील होते हैं, प्रकृति के प्रति अनुराग भी व्यक्ति की संवेदना को सघन करता है,स्वाभाविक ही है कि श्री सोनी जी के हृदय में संवेदना एवं भावाकुलता  अत्यंत सघन है। भावों की यह सघनता उनकी रचनाओं में अनेक रूपों में देखी जा सकती है। उनके समस्त रचना-संसार में उनकी यह प्रवृत्ति  ही विविध रूपों में प्रतिबिम्बित  देखी जा सकती है, उनका यह नवीन हाइकु -संग्रह उसी भावाकुल प्रवृत्ति की एक कड़ी है। इस संग्रह के प्रारम्भ में प्रसिद्ध साहित्यकार श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' जी द्वारा 'रमेश कुमार सोनी का अनुभव संसार' शीर्षक से लिखा हुआ परिचयात्मक आलेख संग्रह की विशिष्टता को सिद्ध करता है।
       
'अक्षर लीला' के समस्त हाइकुओं को कवि ने चौदह शीर्षकों में विभाजित किया है। इनमें प्रकृति है, घर -परिवार हैं, तीज-त्यौहार हैं, समसामयिक समस्याएँ हैं और जीवन -जगत के दार्शनिक प्रश्न हैं।  प्रकृति के प्रति स्वाभाविक अनुराग संग्रह के  हाइकुओं में सहज रूप में अभिव्यक्त हुआ है।हाइकु अपनी प्रकृति से ही  प्रकृति की  कविता है अतः सोनी जी के हाइकुओं में उनके प्रकृति प्रेम को स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्ति के अनेक अवसर मिले हैं।'अक्षर लीला' में प्रकृति अपने विविध रूपों के साथ उपस्थित है। हिंदी कविता में प्रकृति चित्रण के जितने रूप मिलते हैं सोनी जी के हाइकुओं में भी प्रकृति के लगभग समस्त रूप चित्रित हैं, उनमें प्रकृति का यथातथ्य चित्रण हैं, उसके अलंकारिक, उपदेशक और मानवीकरण-रूप भी विद्यमान हैं। रमेश सोनी जी प्रकृति के जिस रूप का चयन करते हैं,उसका अत्यंत सहज  बिम्ब उपस्थित करते हैं। उदाहरण के लिए नदी तट पर पेड़ के नीचे पानी पीते हुई एक चीते का एक स्वाभाविक चित्र दृष्टव्य है -

नदी का तट / पानी पी रहा चीता / पेड़ की छाँव।

ठीक इसी प्रकार एक और सहज चित्र देखा जा सकता है -

झूमे सैलानी / बर्फबारी जो हुई /बाज़ार गर्म।
      
यद्यपि प्रकृति के सहज और स्वाभाविक सौंदर्य को को कवि ने अनेक हाइकुओं में अत्यंत सहज रूप में चित्रित किया है, पर उसमें साथ-साथ वे आलंकारिकता और कलात्मकता का स्पर्श भी देते चले हैं। वर्षा का एक बिम्ब है, जब वर्षा की प्रथम फुहार धरा को भिगोती है तो मिट्टी से जो सोंधी महक उठती है उसे कवि ने विलक्षण उपमा प्रदान की है -

पहली वर्षा / खुली इत्र की शीशी / महकी मिट्टी।

वर्षा होने पर इत्र की शीशी खुलने की उपमा सर्वथा अनूठी और मौलिक है, ऐसे और भी अनेक बिम्ब हैं जहाँ कवि ने प्रकृति के उपादानों को नवीन उपमाओं से सुसज्जित किया है, यथा -

तीखी है मिर्च / कौन सौतन तेरी?/ जलन बड़ी।

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भोर का मौन/ पाखी ने मंत्र पढ़ा / दुनिया जागी।

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सन्यासी वृक्ष/ पतझड़ की ऋतु / केश लुंचन। 

व्यापक जीवन अनुभवों की 'अक्षर लीला'
तीखी मिर्च की सौतन ढूँढना, भोर में पक्षियों का मंत्र उच्चारण करना और पतझड़ की केश लुंचन से तुलनाएँ सर्वथा नवीन हैं । इस प्रकार की नवीन उपमाओ के लिए वे लोक जीवन में व्याप्त प्रतीकों को चुनते हैं जैसे पृथ्वी द्वारा मेघ -पत्रों को बाँचना और धुंध द्वारा धूप से नेग माँगना, ये लोक जीवन के प्रचलित उदाहरण हैं किन्तु इन्होने हाइकुओं में एक अद्भुत सौंदर्य की सृष्टि कर दी है।                     

मेघों का पत्र/ बाँचती रही पृथ्वी/हरित भाषा।

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धूप के द्वारे/धुंध हठीली खड़ी/  नेग माँगती।

प्रकृति के माध्यम से विविध मानवीय मनोभावों की अभिव्यक्ति भी सोनी जी के हाइकुओं में अत्यंत स्वाभाविक रूप में व्यक्त हुई हैं। यथा-

धूप ने चूमे /टमाटर के गाल/गुस्से में लाल।

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लू महारानी/ गश्त पर निकली / सन्नाटा फैला

विषयों की भाँति रमेश सोनी जी के हाइकुओं की भाषा में भी विविधता है,भाषा में व्यंजना है, प्रतीकात्मकता है आलंकारिकता है, इसके साथ ही लोक जीवन में प्रचलित अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग हैं। इस वैविध्य ने संग्रह के हाइकुओं को जीवंत बनाते हुई लोक मन के निकट स्थित कर दिया है। मुहावरों और लोकोक्तियों के सार्थक प्रयोग भी उनकी भाषा में विद्यमान है। कुछ हाइकु दृष्टव्य हैं -

शेखी बघारे/काँटों बीच गुलाब/जेड प्लस में। 

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पेड़ों के पंछी / ऑर्केस्ट्रा सुनाते हैं / भोर -साँझ में 

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बेटी विदाई/साथ ले जाती घर /मकान बाकी।

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धर्म जो लड़े /जातियाँ उग आयीं/सत्ता की भाषा।

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मेघों का स्कूल/ बूंदो की पूरी छुट्टी/सावन हँसे।

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गाँव के मेले/पीपल पंखा झेले/ खुश बटोही।
       
कवि एक पर्यावरणविद भी है अतः स्वाभाविक रूप से पर्यावरण की चिंता भी उनके हाइकुओं में विद्यमान है। संग्रह के चौदह भागों में 'प्रदूषण का दर्द' शीर्षक से एक भाग है जिसमें पर्यावरण संबंधी हाइकु ही हैं। इसमें विकास के नाम पर कटते जंगल , बढ़ते पॉलीथिन के प्रयोग, पराली का जलना, पटाखों के प्रयोग इत्यादि से बढ़ते प्रदूषण की पीड़ा और चिंता साफ देखी जा सकती है-

वन जो कटे  / ग्लेशियर भी टूटे /धरा उबली।

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वन डरते / विकास की कुल्हाड़ी / गर्दन काटे।

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प्लास्टिक-कूड़ा / हरियाली निगले / धरा कूकर।

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खतरे बड़े / पॉलीथिन कचरा /कभी न सड़े।

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विकास पथ /यात्री को छाँव कहाँ /ठूँठ बाकी हैं।

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इन सब चिंताओं के मध्य कवि निराश नहीं है उसे नई पीढ़ी से उम्मीद है, उसे उम्मीद है कि बच्चे ही प्रकृति को बचाएँगे-

धरती खुश/ बच्चे पौधा रोपते/उम्मीद जिन्दा। 

पर्यावरण की चिंता के साथ ही अनेक सामाजिक /सांस्कृतिक चिंताओं से भी कवि मन व्याकुल है। वर्तमान में झूठ का साम्राज्य फल-फूल रहा है, सत्य एकाकी एवं उपेक्षित सा है इस तथ्य को कवि ने हाइकुओं में अत्यंत गंभीरता से चित्रित किया है 

सच संत सा / झूठ रंगीला बड़ा / चले तनके।

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झूठ का मेला / सच, बचके लौटा / एंटीक पीस।

युद्धों की विभीषिका भी वर्तमान का बड़ा अभिशाप है।युद्ध का परिणाम सदैव विनाशक ही होता है,युद्ध स्वयं में गूंगा-बहरा होता है वह किसी प्रश्न के उत्तर नहीं देता। आश्चर्य तो यह है कि युद्धों की आवश्यकता का कारण लोग शांति की स्थापना बताया करते हैं। मानवता के आधार स्तंभ विद्यालय, अस्पताल भी जब युद्ध में नष्ट होते हैं तो गम्भीर संकट उपस्थित होता है, इसके दुष्परिणामों को कोई नहीं बताता,ऐसी अनेक  चिंताओं के हाइकु भी संग्रह में विद्यमान हैं-

कसूर पूछे / स्कूल अस्पताल भी /युद्ध गूंगा है। 

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लाशों के ढेर / शांति वार्ता बेमानी / जिंदगी हारी।
       
इन सबके साथ ही घर -परिवार, रिश्ते नाते, मेले बाज़ार, सभी उनके हाइकु के विषय हैं। उदाहरण के लिए पिता और माँ के इन हाइकुओं में सहजता, आत्मीयता और परिवार के स्नेह के अत्यंत स्वाभाविक चरित्र को देखा जा सकता है।

 बच्चों की जिद / घोड़ा बनते पिता / घर चहके।

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 माँ परोसती / भोजन संग प्यार / ढाबे में 'बिल'।
         
प्रकृति से लेकर जीवन -जगत और घर -परिवार तक की दुनिया के जितने हाइकु 'अक्षर लीला' में संकलित है वे कोरी कल्पना की उपज नहीं है वे सभी हाइकु कवि के जीवन अनुभवो से निःसृत हैं, उनमें कल्पना उतनी ही है जितनी काव्य सौंदर्य हेतु अनिवार्य है। अतः यह कहना समीचीन होगा कि यह संग्रह कवि के अनुभव संसार की 'अक्षर लीला' है।


- डॉ. शिवजी श्रीवास्तव-गौतम बुद्ध नगर, उ.प्र.
Email-   shivji.sri@gmail.com
Mobile-   9557518552
…..


- हाइकु-संग्रह ‘अक्षर लीला’-रमेश कुमार सोनी
भूमिका-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
अयन प्रकाशन दिल्ली, संस्करण - प्रथम, 2025
पृष्ठ-112,मूल्य-340/-₹
ISBN: 978-93-6423-264-7

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