श्रीनगर नालंदा डायलॉग 2026 सम्पन्न ज्ञान, सांस्कृतिक संवाद और सतत विकास को लेकर वैश्विक सहमति
श्रीनगर नालंदा डायलॉग 2026 सम्पन्नज्ञान, सांस्कृतिक संवाद और सतत विकास को लेकर वैश्विक सहमति
श्रीनगर, 21 जून 2026: नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल (नालंदा लिटफेस्ट) के तत्वावधान में एसकेआईसीसी, श्रीनगर (जम्मू-कश्मीर) में आयोजित श्रीनगर–नालंदा डायलॉग 2026 का समापन ‘श्रीनगर–नालंदा घोषणा’ को अपनाने के साथ हुआ। इस घोषणा के माध्यम से समकालीन वैश्विक चुनौतियों के समाधान हेतु संवाद, ज्ञान-विनिमय, सांस्कृतिक आदान-प्रदान तथा सतत विकास की आवश्यकता और प्रासंगिकता को पुनः सुदृढ़ किया गया।
समापन सत्र (श्रीनगर–नालंदा घोषणा सत्र) में प्रतिष्ठित विद्वानों, नीति-निर्माताओं, सांस्कृतिक नेतृत्वकर्ताओं और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने सहभागिता की तथा कश्मीर और नालंदा के बीच विद्यमान उन स्थायी बौद्धिक संबंधों पर विचार-विमर्श किया, जिन्होंने एशिया की सभ्यतागत सोच और ज्ञान परंपरा को आकार देने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। ये दोनों ही इतिहास के महत्वपूर्ण ज्ञान-केंद्र रहे हैं।
मंचासीन विशिष्ट अतिथियों में नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल के अध्यक्ष एवं संरक्षक पद्म विभूषण डॉ. कर्ण सिंह; सांसद एवं प्रख्यात लेखक डॉ. शशि थरूर; वरिष्ठ जनबुद्धिजीवी एवं पूर्व आईएएस अधिकारी श्री नितीश्वर कुमार; कश्मीर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. नीलोफर खान; फेस्टिवल की चेयरपर्सन सुश्री डी. आलिया; फेस्टिवल निदेशक श्री गंगा कुमार; डॉ. के. महेश तथा नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल के अंतरराष्ट्रीय सलाहकार डॉ. विक गैफनी शामिल रहे।
समापन सत्र के मुख्य वक्तव्य में डॉ. शशि थरूर ने इस आयोजन को ज्ञान की दो महान परंपराओं के प्रतीकात्मक पुनर्मिलन के रूप में वर्णित किया। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक रूप से श्रीनगर और नालंदा दोनों ही विचार, विद्वत्ता और सांस्कृतिक संवाद के महत्वपूर्ण केंद्र रहे हैं।
डॉ. थरूर ने कहा, “संवाद ज्ञान का केवल एक सहायक तत्व नहीं है, बल्कि वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से ज्ञान का विस्तार और विकास होता है।” उन्होंने इस बात पर बल दिया कि समाज तभी समृद्ध होते हैं जब विचारों का स्वतंत्र रूप से आदान-प्रदान होता है। उन्होंने आगे कहा, “संस्कृतियाँ बहिष्कार से नहीं, बल्कि परस्पर आदान-प्रदान से मजबूत होती हैं,” और प्रतिभागियों को यह भी स्मरण कराया कि “ज्ञान अर्जन केवल व्यक्तिगत प्रयास नहीं, बल्कि मानवता का साझा उपक्रम है।”
वैश्विक बौद्धिक इतिहास में कश्मीर के योगदान को रेखांकित करते हुए डॉ. थरूर ने तिब्बती विद्वान थोनमी संभोटा की यात्रा का उल्लेख किया, जो भाषाई परंपराओं का अध्ययन करने के लिए कश्मीर आए थे और बाद में तिब्बती लिपि के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि यह प्रसंग इस बात का प्रतीक है कि कश्मीर ऐतिहासिक रूप से विविध सभ्यताओं और ज्ञान परंपराओं को जोड़ने वाले सेतु के रूप में कार्य करता रहा है।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ. कर्ण सिंह ने कश्मीर और नालंदा के बीच लगभग 2000 वर्षों पुराने ऐतिहासिक संबंधों का उल्लेख किया और कश्मीर को “नालंदा का उत्तरी बौद्धिक समकक्ष” बताया। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र बौद्ध, शैव और सूफी परंपराओं के अद्वितीय समन्वय का प्रतीक रहा है। इस संदर्भ में उन्होंने सम्राट कनिष्क द्वारा आयोजित चतुर्थ बौद्ध संगीति, शाह-ए-हमदान की आध्यात्मिक विरासत तथा कश्मीर शैव दर्शन के स्थायी दार्शनिक योगदान को स्मरण किया।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर डॉ. सिंह ने योग के व्यापक अर्थ पर प्रकाश डालते हुए कहा कि योग व्यक्ति की चेतना का परम चेतना से मिलन है। उन्होंने योग के चार शास्त्रीय मार्गों—ज्ञान योग (ज्ञान), भक्ति योग (समर्पण), कर्म योग (कर्म) और राज योग (आध्यात्मिक अनुशासन)—की व्याख्या करते हुए युवाओं से आग्रह किया कि वे योग को केवल शारीरिक अभ्यास के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के समग्र दर्शन के रूप में अपनाएं।अपने संबोधन के समापन पर डॉ. सिंह ने प्राचीन संस्कृत प्रार्थना का पाठ किया—“सर्वे सुखिनः सन्तु, सर्वे सन्तु निरामयाः।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥”अर्थात— सभी सुखी हों, सभी निरोग हों, सभी मंगल का दर्शन करें और कोई भी दुःख का भागी न बने।
दिनभर चले संवाद के निष्कर्षों का सार प्रस्तुत करते हुए डॉ. विक गैफनी ने भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराओं को समकालीन वैश्विक शैक्षणिक विमर्श से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक संस्थानों की भूमिका जवाबदेह शासन को प्रोत्साहित करने, विरासत संरक्षण सुनिश्चित करने तथा अनुसंधान, संवाद और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से सतत विकास को बढ़ावा देने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
दिनभर की चर्चाओं का समापन करते हुए डॉ. गैफनी ने कहा, “कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) ने समाज के हाशिये पर खड़े समुदायों के लिए भी ऐसी जानकारी तक पहुँच संभव बनाई है, जो पहले उनके लिए उपलब्ध नहीं थी। इतना ही नहीं, सोशल मीडिया जैसे माध्यमों के जरिए वे अपने विचार और संदेश व्यापक स्तर तक पहुँचा सकते हैं, जिससे उनकी आवाज़ समाज तक प्रभावी ढंग से पहुँच सके।”सत्र को संबोधित करते हुए कश्मीर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. नीलोफर खान ने कश्मीर और नालंदा के बीच विद्यमान गहरे ऐतिहासिक एवं बौद्धिक संबंधों को रेखांकित किया और उन्हें ज्ञान तथा चिंतन की सतत एवं समृद्ध परंपराओं के केंद्र के रूप में वर्णित किया। उन्होंने दर्शन, साहित्य और ज्ञान परंपराओं के क्षेत्र में कश्मीर के सदियों पुराने योगदान का उल्लेख करते हुए उसे भारत की व्यापक सभ्यतागत विरासत से जोड़ा। उन्होंने कहा, “नालंदा उदारता, संवाद और ज्ञान की सार्वभौमिक खोज का प्रतीक रहा है। कश्मीर भी हमारी सभ्यता के बौद्धिक इतिहास में एक विशिष्ट और गौरवशाली स्थान रखता है।” उन्होंने स्वदेशी ज्ञान परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता पर विशेष बल दिया।
श्री नितीश्वर कुमार ने अपने संबोधन में समाज में परिवर्तनकारी शक्ति के रूप में संवाद के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि युवा पीढ़ी इतिहास और संस्कृति के नए-नए अर्थों की निरंतर खोज करती रहती है। उन्होंने कहा कि भारत की सभ्यतागत विरासत के संरक्षण के साथ-साथ नवाचार और रचनात्मकता को प्रेरित करने के लिए बौद्धिक आदान-प्रदान अत्यंत आवश्यक है।‘श्रीनगर–नालंदा घोषणा’ को अपनाने के साथ इस संवाद का औपचारिक समापन हुआ। घोषणा में शैक्षणिक संस्थानों, नीति-निर्माताओं और सांस्कृतिक संगठनों के बीच अधिक सहयोग का आह्वान किया गया, ताकि ज्ञान-आधारित सुशासन को सुदृढ़ किया जा सके, सांस्कृतिक एवं पारिस्थितिक विरासत का संरक्षण सुनिश्चित हो तथा शांति, पारस्परिक समझ और आर्थिक विकास के माध्यम के रूप में सतत पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके।
घोषणा में बहुलतावाद, सभ्यतागत संवाद और आधुनिक चुनौतियों के समाधान में प्राचीन ज्ञान परंपराओं की निरंतर प्रासंगिकता पर भी विशेष जोर दिया गया। प्रतिनिधियों ने विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर की समृद्ध सांस्कृतिक और पर्यावरणीय विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।इससे पूर्व सत्र के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री श्री अनुराग भदौरिया ने संवाद के सफल आयोजन के लिए फेस्टिवल निदेशक श्री गंगा कुमार और आयोजन टीम को बधाई दी। उन्होंने डॉ. कर्ण सिंह की उल्लेखनीय बौद्धिक ऊर्जा और सक्रियता की सराहना करते हुए डॉ. शशि थरूर के सार्वजनिक विमर्श, विद्वता और नेतृत्व में दिए गए योगदान की प्रशंसा की।
औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए डॉ. के. महेश ने नालंदा की सांस्कृतिक महत्ता के समकालीन पुनर्जागरण पर प्रकाश डाला और बिहार की प्रसिद्ध बावन बूटी साड़ियों को हाल ही में प्राप्त भौगोलिक संकेतक (जीआई) मान्यता का उल्लेख किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि बौद्धिक और सांस्कृतिक पहलों का लाभ जमीनी स्तर तक पहुँचे तथा वे सार्थक सामाजिक और आर्थिक विकास में परिवर्तित हों।डॉ. के. महेश ने कार्यक्रम की सफलता में योगदान देने वाले सभी विशिष्ट अतिथियों, प्रतिनिधियों, शिक्षकों, विद्यार्थियों और आयोजन से जुड़े सभी सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल द्वारा दिए गए उद्घाटन संबोधन का उल्लेख करते हुए उनका धन्यवाद किया। साथ ही, कश्मीर विश्वविद्यालय में एनएलएफ टीम की मेजबानी के लिए प्रो. नीलोफर खान के प्रति आभार प्रकट किया तथा इस पहल को सफलतापूर्वक साकार करने में फेस्टिवल निदेशक श्री गंगा कुमार और फेस्टिवल चेयरपर्सन सुश्री डी. आलिया के नेतृत्व और योगदान की सराहना की।
श्रीनगर–नालंदा डायलॉग 2026 के समापन के साथ प्रतिभागियों ने भारत की सभ्यतागत ज्ञान परंपरा के संरक्षण के प्रति अपनी साझा प्रतिबद्धता को दोहराया, साथ ही सहयोग, विद्वत संवाद और सांस्कृतिक समझ के नए मार्ग विकसित करने का संकल्प व्यक्त किया। श्रीनगर से उभरकर आया संदेश स्पष्ट था— स्थायी प्रगति केवल संस्थाओं के निर्माण से नहीं, बल्कि संवाद, जिज्ञासा और विभिन्न संस्कृतियों, क्षेत्रों तथा पीढ़ियों के बीच विचारों के सतत आदान-प्रदान से संभव होती है।


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