शैक्षिक अनुसंधान का अर्थ,परिभाषा,आवश्यकता एवं महत्व

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शैक्षिक अनुसंधान Educational Research वह प्रक्रिया है जो शिक्षा के क्षेत्र में समस्याओं के समाधान, नई पद्धतियों के विकास और मौजूदा व्यवस्था में सुधार

शैक्षिक अनुसंधान का अर्थ,परिभाषा,आवश्यकता एवं महत्व


शैक्षिक अनुसंधान (Educational Research) वह प्रक्रिया है जो शिक्षा के क्षेत्र में समस्याओं के समाधान, नई पद्धतियों के विकास और मौजूदा व्यवस्था में सुधार के लिए वैज्ञानिक और व्यवस्थित तरीके से की जाती है। सरल शब्दों में, शिक्षा को अधिक प्रभावी और व्यावहारिक बनाने के लिए किया जाने वाला शोध ही शैक्षिक अनुसंधान है।

शैक्षिक अनुसन्धान की परिभाषा व अर्थ

मानव में नवीनता को ढूँढ़ निकालने और अज्ञात को खोज निकालने की प्रवृत्ति स्वाभाविक है। इस प्रवृत्ति के कारण मानव द्वारा वस्तुओं या घटनाओं के बारे में जानने या खोजने का कार्यक्रम निरन्तर चल रहा है और इस कार्यक्रम का प्रयास का उद्देश्य ज्ञान की वृद्धि, अस्पष्ट ज्ञान का स्पष्टीकरण व मौजूदा ज्ञान का सत्यापन करना है। इसी को शोध या अनुसन्धान कहते हैं। इस प्रकार शिक्षा के बारे में अधिक से अधिक वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए 'शैक्षिक अनुसन्धान' का प्रयोग किया जाता है।
 
इसमें अनुसन्धानकर्ता वैज्ञानिक पद्धति के प्रयोग से शिक्षा के बारे में ज्ञान प्राप्त करता है और शैक्षिक व्यवहार के बारे में प्राप्त तथ्यों के आधार पर सामान्य सिद्धान्तों को निकालता है फिर भी शैक्षिक अनुसन्धान के अर्थ को भली-भाँति समझने के लिए विभिन्न विद्वानों की परिभाषाओं का अध्ययन करना आवश्यक है। वास्तव में सर्वप्रथम शैक्षिक अनुसन्धान की परिभाषा आदि को भली-भाँति समझना आवश्यक होगा -

  1. श्रीमती यंग- “शैक्षिक अनुसन्धान को एक वैज्ञानिक योजना के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसका उद्देश्य तार्किक एवं क्रमबद्ध पद्धतियों के द्वारा नवीन तथ्यों की खोज, पुराने तथ्यों के सत्यापन, उनकी क्रमबद्धताओं व अन्तर्सम्बन्धों, कार्य-कारण व्याख्याओं तथा उन्हें नियन्त्रण करने वाले स्वाभाविक नियमों की खोज करना है। 
  2. ह्विटने - शैक्षिक अनुसन्धान के अन्तर्गत मानव समूह के शिक्षण सम्बन्धों का अधययन होता है। 
  3. मोसर - “शैक्षिक घटनाओं व समस्याओं के बारे में नवीन ज्ञान को प्राप्त करने के लिए किये गये व्यवस्थित अनुसंन्धान को शैक्षिक अनुसन्धान कहते हैं।

शिक्षा में अनुसन्धान या शैक्षिक अनुसन्धान की आवश्यकता (Need of Research in Education of Educational Research) शिक्षा में अनुसन्धान की आवश्यकता एवं महत्त्व अनुसन्धान का तात्पर्य किसी नवीन वस्तु अथवा ज्ञान का कुछ नवीन सिद्धान्तों के आधार पर अन्वेषण करना है। इसका उद्देश्य सरल और सुव्यवस्थित विथियों द्वारा किसी क्षेत्र की प्रमुख समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करना है। इस दृष्टि में अनुसन्धान एक सोद्देश्य एवं सविचार प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य मानव-समाज के ज्ञान को विकसित और परिमार्जित कर उपयोगी बनाना है। इसके महत्त्व के बारे में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग का मत है कि अनुसन्धान के बिना अध्ययन मृतप्रायः हो जाएगा। अतः ज्ञान के विकास के हेतु अनुसन्धान अत्यावश्यक है और यह ज्ञान का विकास जीवन के विकास के लिए अत्यावश्यक है।
 

अनुसन्धान और शिक्षा

शिक्षा भी एक सोद्देश्य, सविचार प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीवन के विभिन्न पहलुओं का पोषण होता है। जॉन ड्यूवी (John Dewey) ने इसे प्रगतिशील प्रक्रिया कहा जाता है। प्रगति के अभाव में शिक्षा अपने कर्त्तव्य से च्युत हो जाएगी और इसकी सुस्थिर नींव पर निर्मित मानव सभ्यता एवं संस्कृति का विशाल भवन निष्प्राण हो जाएगा। अतः शिक्षा के अन्तर्गत प्रगति, परिर्माज एवं विकास हेतु अनुसन्धान की आवश्यकता निर्विवाद है।

अनुसन्धान तथा शिक्षा सम्बन्धी समस्याएँ

शैक्षिक अनुसंधान का अर्थ,परिभाषा,आवश्यकता एवं महत्व
आज शिक्षा का उद्देश्य मानव का सर्वांगीण विकास कर उसे समाज, राष्ट्र और विश्व की प्रगति में सहायक कुशल नागरिक बनाना है। जनतन्त्रीय शिक्षा व्यवस्था द्वारा व्यक्ति के व्यक्तिगत समादर, अवसर की समानता, स्वतन्त्रता तथा बन्धुत्व की उदात्त भावनाओं की स्थापना का उद्देश्य हम स्वीकार कर चुके हैं।
 
परन्तु सर्वत्र भावात्मक एकता में बाधक तत्व-वर्ग-भेद, धार्मिक असहिष्णुता, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, आर्थिक शोषण आदि- इस आदर्श की प्राप्ति में बाधक हो रहे हैं तथा लोगों को निराश कर रहे हैं। शिक्षण प्रक्रिया की समस्याएँ और भी दुरूह और असाध्य दिखायी नहीं पड़ रही हैं। सर्वत्र बाल-केन्द्रित शिक्षा, व्यक्तिगत शिक्षा, समाज शिक्षा, प्रौढ़ अनिवार्य शिक्षा के नारे तो बुलन्द हो रहे हैं परन्तु समुचित योजना, कुशल मार्ग-दर्शन एवं सुल साधन के अभाव में कोई भी प्रगति दिखायी नहीं पड़ रही है।

छात्रों में अनुशासनहीनता बढ़ती जा रही है, समाज में शिक्षकों की प्रतिष्ठा गिर रही है, विद्यालयों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, परन्तु गुणात्मक सफलता उतनी ही दूर भागती जा रही है। पाठ्यक्रम में पुस्तकीय ज्ञान हँस-हँस कर भरा गया है जो व्यावहारिकता से कोषों है। यद्यपि शिक्षण विधियों की भरमार लग गयी है परन्तु अध्यापक इन पर ध्यान भी नहीं दे रहे हैं। प्रशासकीय अधिकारी कार्यालय के कागजों में इस प्रकार उलझे हुए हैं कि शिक्षा की समस्याओं एवं उनके समाधान की बात सोचता उनके वश की बात नहीं है।


ऐसे समय में सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक अनुसनधान ही हमारी सहायता कर सकता है तथा इन समस्याओं का समुचित विश्लेषण, वैज्ञानिक अध्ययन एवं सुविचारित समाधान प्रस्तुत कर सकता है। इस दृष्टि में शिक्षा के क्षेत्र में अनुसन्धान आज अपरिहार्य हो गया है - 
  1. ज्ञान के विकास में सहायक (Helpful in the Development of Knowledge)- अनुसन्धान ज्ञान के किसी एक सूक्ष्म अंग का विस्तुत, सम्पूर्ण एवं नवीच चित्र प्रस्तुत करता है। इसके द्वारा ज्ञान कोषण में वृद्धि एवं विकास होता हैं। गुड तथा स्केट का कहना है कि विज्ञान का कार्य बुद्धि का विकास करना हे तथा अनुसन्धान का कार्य विज्ञान का विकास करना है। अतः यदि हम बुद्धिमत्ता का विकास चाहते हैं तो अनुसन्धान करना ही होगा।
  2. अनुसन्धान उद्देश्य प्राप्ति हेतु सर्वोत्तम-साधन प्रदान करता है- यह एक उद्देश्यपूर्ण क्रिया है। इसकी समुची क्रिया उसी निश्चित उद्देश्य की प्राप्ति की ओर अग्रसर रहती है। इसके अन्तर्गत बातों के लिए स्थान नहीं है। उदाहरणार्थ, यदि हमें धम्रनिरपेक्ष नागरिक उत्पनन करना है तो हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था को भी धर्म-निरपेक्ष बनाना होगा। इसके लिए सुव्यवस्थित कार्यक्रम का निर्माण करना होगा। इसी प्रकार, अन्य समस्याओं के समाधान हेतु मार्गदर्शन करना होगा। 
  3. मानव समाज के मन्द गति परिवर्तन में नवीन ज्ञान एवं गति प्रदान करने वाला - मानव समाज परम्पराओं तथा रूढ़ियों की लीक सदियों तक पीटता रहता है। उसके प्रवाह की गति को मोड़ना सरल नहीं है। रेल के आविष्कार के पूर्व बाद समाज में एक बड़ा परिवर्तन दिखाई पड़ा। इसी प्रकार अनुसन्धान मानव-जीवन को गति देने एवं दिशा-परिवर्तन में अत्यन्त सहायक होता है। 
  4. राष्ट्रीयता एवं अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना के विकास में सहायक (Helpful in the Development of the Feeling of Nationality and Internationality)- राष्ट्रीयता की भावना के विकास में शिक्षा का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। किन्तु शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल यहीं तक सीमित नहीं है कि हमारा देश अन्य सभी देशों में श्रेष्ठ है। अपितु उनमें वसुधैव कुटुम्बकम् के भाव भी विकसित करना है। इसकी पूर्ति जागरूक प्रयास पर ही निर्भर है। अनुसन्धान के अन्र्गत लोक-हितकारी भावनाओं का समन्वय होता है, इसी कारण अनुसन्धान से राष्ट्रीयता की भावना को भी आघात नहीं पहुँचता तथा अन्तर्राष्ट्रीयता की कोमल पुष्पलतिका भी पुष्पित होती रहती है। इसी प्रकार, विभिन्न अनुसन्ध नों के माध्यम से अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना का विकास भी किया जा सकता है। 
  5. जीवन के उद्देश्यों की प्राप्ति के सरल उपाय देता है- उद्देश्यों की पूर्ति हेतु सरल साधनों को प्राप्त करना मानव स्वभाव है। इस मार्ग में अनुसन्धान मनोविज्ञान तथा शिक्षा एवं समाज विज्ञान सभी क्षेत्रों में सहायक होता है। 
  6. सुधार में सहायक (Helpful in Reformation)- अनुसन्धान रूढ़िगत विचारों एवं व्यवहारों में सुधार का मार्ग प्रस्तुत करना है, क्योंकि इसका पथ वैज्ञानिक होता है जिसमें इस प्रकार की भ्रान्तियों एवं अपुष्ट धारणाओं के लिए स्थान नहीं होता। 
  7. सत्य-ज्ञान के खोज की जिज्ञासा शान्त करना है- अनुसन्धानकर्ता सदैव सत्य- ज्ञान की खोज में व्यस्त रहता है। अतः अनुसनधान उसकी उत्सुकता को शान्त तथा सत्य की खो की जिज्ञासा को सन्तुष्ट करता है। 
  8. प्रशासनिक क्षेत्र में सफलता प्रदान करना (Giving Success in Administrations)—– अनुसन्धान अनेक प्रशासनिक गुत्थियों को सुलझाकर स्वस्थ प्रशासनिक व्यवस्था के सफल संचालन में सहायक होता है। 
  9. अध्यापक के लिए प्राण (Life for Teacher)- अध्यापक के लिए तो यह प्राण ही हैं। अनुसन्धान उनकी सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक समस्याओं का समाधान का प्रगति का पथ प्रशस्त करता है। 
इस प्रकार शैक्षिक अनुसंधान वह धुरी है जिस पर किसी भी देश की आधुनिक और प्रगतिशील शिक्षा व्यवस्था टिकी होती है। इसके बिना शिक्षा में गुणात्मक सुधार (Qualitative Improvement) लाना असंभव है।

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