हिटलर की विदेश नीति | Hitler's Foreign Policy

SHARE:

हिटलर की विदेश नीति (Foreign Policy) मुख्य रूप से आक्रामक राष्ट्रवाद, साम्राज्यवादी विस्तार और वर्साय की संधि (Treaty of Versailles) के अपमान का बदला

हिटलर की विदेश नीति | Hitler's Foreign Policy


हिटलर की विदेश नीति (Foreign Policy) मुख्य रूप से आक्रामक राष्ट्रवाद, साम्राज्यवादी विस्तार और वर्साय की संधि (Treaty of Versailles) के अपमान का बदला लेने पर टिकी थी। उसका अंतिम लक्ष्य जर्मनी को यूरोप की सबसे बड़ी महाशक्ति बनाना और जर्मन लोगों के लिए अतिरिक्त जमीन हासिल करना था।

नाजी विदेश नीति हिटलर की प्रसिद्ध पुस्तक मीन कैम्फ (Mein Kampf) पर आधारित थी।इसके मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित थे - 
  • आत्म निर्णय के सिद्धान्त के अनुसार जर्मन जाति के सभी व्यक्तियों का एक वृहत्तर जर्मनी में एकीकरण करना । 
  • वर्साय एवं सेन्ट जर्मन की अपमानजनक संधियों को समाप्त करना । 
  • जर्मन जनता की बढ़ती हुई आबादी के लिए अधिक प्रदेशों एवं स्थान को प्राप्त करना .
अपने इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए नाजी जर्मनी के लिए युद्ध की तैयारी करना और उचित अनुचित सभी उपायों का आश्रय लेना स्वाभाविक था। अपनी विदेश नीति के उद्देश्यों को किस प्रकार प्राप्त करना है हिटलर द्वारा इसे अपनी पुस्तक मीन कैम्फ में स्पष्ट करते हुए लिखा गया था कि - "जर्मन के पीड़ित प्रदेश उग्र विरोध प्रदर्शनों द्वारा पितृदेश में वापस नहीं लाये जा सकते, बल्कि कठोर चोट करने में समर्थ तलवार द्वारा ही लाये जा सकते हैं। इस तलवार का निर्माण करना आन्तरिक नेतृत्व का कार्य है तथा इसके निर्माण कार्य की रक्षा करना और युद्ध में साथी खोजना विदेश नीति का कार्य है।"
 
स्पष्ट है कि हिटलर की विदेश नीति की धारा मुख्यतः तीन दिशा में प्रवाहित होनी थी (1) वर्साय सन्धि की अवहेलना करते हुए एक समर्थ तलवार का निर्माण । (2) युद्ध कार्य के लिए मित्रों की खोज (3) क्षेत्रीय विस्तार। इन तीनों दिशाओं में अग्रसर होने के लिए हिटलर ने भ्रमकी, धौस, शान्ति का दम्भ और आडम्बर, संधि भंग और युद्ध आदि सभी न्याय- अन्यायपूर्ण उपायों का सहारा लिया। हिटलर ने अपने उद्देश्यों को पाने के लिए विदेश नीति के लिए अन्य निम्नलिखित कार्य किये - 

निःशस्त्रीकरण सम्मेलन का वहिष्कार एवं राष्ट्र संघ का परित्याग

हिटलर ने 14 अक्टूबर 1933 को शान्ति, समानता और सम्मान के उच्च प्रजातांत्रिक सिद्धानों की दुहाई देते हुए निःशस्त्रीकरण सम्मेलन का वहिष्कार करने की घोषणा की तथा राष्ट्रसंघ की सदस्यता से परित्याग की नोटिस दे दी। उसने 18 अक्टूबर को यह घोषणा की कि निशस्त्रीकरण में जर्मनी की पूरी आस्था है और यह अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के समाधान के लिए शक्ति का आश्रय नहीं लेगा वरन् वह अन्य देशों के साथ अनाक्रमण समझौते करने को तैयार है । हिटलर की यह दूसरी घोषणा उत्तेजित एवं सशंकित पश्चिमी राष्ट्रों को शान्त करने के लिए पर्याप्त थी । 120 नवम्बर 1933 को राष्ट्र संघ के परित्याग के प्रश्न पर जनमत संग्रह में 95% मतदाताओं ने हिटलर का समर्थन किया। हिटलर का यह कार्य सार्वजनिक रूप से शस्त्रीकरण की ओर पहला कदम था।"
 

पोलैण्ड जर्मनी अनाक्रमण समझौता

26 जनवरी 1934 को जर्मनी एवं पोलैण्ड के मध्य 10 वर्षों के लिए एक आक्रमण संधि पर हस्ताक्षर करके पिछले 15 वर्षों से दोनों देशों के मध्य चल रहे तनाव को समाप्त किया गया। इस संधि से दोनों देशों को लाभ हुआ, पोलैण्ड को सुरक्षा का आश्वासन मिला। हिटलर को शान्ति का ढ़ोंग रचने का अवसर मिला।
 

आस्ट्रिया को अधिकृत करने का असफल प्रयास (Unsuccessful Attempt to annex Austria)

हिटलर की विदेश नीति | Hitler's Foreign Policy
सेण्ट जर्मेन की संधि द्वारा आस्ट्रिया को जर्मनी में मिलाने हेतु प्रतिबंध लगाया गया था। जर्मन भाषा-भाषी आस्ट्रिया को जर्मनी में मिलाने के उद्देश्य हेतु 25 जुलाई 1934 को आस्ट्रियन नाजीदल ने विद्रोह कर दिया। इटली के मुसोलिनी के आस्ट्रिया की रक्षा के लिए खड़े हो जाने से विद्रोह विफल हो गया।
 

सार घाटी की प्राप्ति

औद्योगिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कोयला खान के भण्डार वाले 2 हजार वर्गमील का सार घाटी क्षेत्र वर्साय संधि द्वारा जर्मनी से छीनकर 15 वर्षों के लिए राष्ट्रसंघों के अधीन रखा गया था। 1933 में हिटलर ने फ्रांस से सार प्रदेश जर्मनी को लौटा देने की अपील की। फ्रांस ने जर्मनी के अपील को ठुकरा दिया । अंत में जनमत संग्रह द्वारा 1 मई 1935 को सार प्रदेश जर्मनी में सम्मिलित कर लिया गया ।

एंग्लो- जर्मन नाविक समझौता

अप्रैल 1935 में स्ट्रेसा सम्मेलन में फ्रांस इटली के साथ ब्रिटेन ने भी वर्साय संधि को भंग करने के लिए जर्मनी की आलोचना की थी । किन्तु हिटलर की कूटनीति से जून 1935 में ब्रिटेन एवं जर्मनी के मध्य एक नाविक समझौते पर हस्ताक्षर करके यह तय किया गया कि जर्मनी की नौ सेना ब्रिटेन की नौ सैनिक शक्ति के 35% होगी । ब्रिटेन के इस विश्वासघात से स्ट्रेसा मोर्चे के फ्रांस एवं इटली में असंतोष पैदा हुआ । समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले जर्मन प्रतिनिधि रिब्बन ट्राप (Ribbon Trop) ने समझौते के महत्व के संदर्भ में लिखा है कि -"इस समझौते का सबसे बड़ा महत्व यह था कि इससे ब्रिटेन वर्साय की संधि की शस्त्रास्त्र सम्बन्धी व्यवस्थायें तोड़ने के लिए तैयार हो गया ।"
 

राइन प्रदेश का सैन्यीकरण

7 मार्च 1936 को हिटलर ने राइन प्रदेश का सैन्यीकरण करके वर्साय और लोकान संधि धाराओं का उलंघन कर दिया। हिटलर ने इस उलंघन के लिए फ्रांस को दोषी ठहराय । उसने कहा, "चूँकि फ्रांस ने फ्रेंच सोवियत समझौते के अन्तर्गत ऐसे कर्त्तव्य स्वीकर कर लिये हैं जो कि लोकान संधि के अनुसार असंगत हैं । इसलिए यह संधि मूल रूप में आशय हीन हो चुका है। इस कारण जर्मनी इस संधि से अब स्वयं को बाध्य नहीं नहीं मानता ।"जर्मनी द्वारा राइन क्षेत्र के सैन्यीकरण से फ्रांस में तहलका मच गया। फ्रांस के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री 11 मार्च को जर्मनी के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही के लिए ब्रिटेन को सहमत करने के लिए ब्रिटेन गये । ब्रिटिश जनमत सैनिक कार्यवाही के लिए तैयार न था । इस प्रकार ब्रिटेन के तैयार न होने से फ्रांस अकेले जर्मनी के विरुद्ध सेना भेजने का साहस न कर सका। ब्रिटेन की प्रेरणा से 14 मार्च 1936 को लन्दन में राष्ट्रसंघ परिषद की एक बैठक हुई जिसमें जर्मनी के विरुद्ध निन्दा प्रस्ताव पारित करने के सिवाय कुछ नहीं किया गया। इस बीच राइन क्षेत्र के सैन्यीकरण के प्रश्न पर हिटलर ने जर्मनी में जनमत संग्रह कराया। 98.87% जनता ने हिटलर के इस कार्य का समर्थन किया ।
 

रोम-बर्लिन - टोकियो-धुरी का निर्माण

इटली, ब्रिटेन एवं फ्रांस के विरोध के कारण ही 1934 में जर्मनी आस्ट्रिया को हड़प न सका । इटली ने अविसिनियाँ पर आक्रमण किया तब ब्रिटेन एवं फ्रांस के पहल पर राष्ट्रसंघ ने इटली के विरुद्ध आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिये । जर्मनी ने अवसर का लाभ उठाते हुए, इटली को आर्थिक मदद देनी शुरु की । जर्मनी ने इटली की अविसीनियाँ विजय को मान्यता देकर उसकी पूरी सद्भावना प्राप्त कर ली। 17 जुलाई 1936 को स्पेन के गृहयुद्ध में विद्रोही जनरल फ्रान्कों को इटली ने समर्थन दिया तब जर्मनी ने भी फ्रांको को अस्त्र-शस्त्र से पूरी मदद की । इस प्रकार 24 अक्टूबर 1936 को इटली-जर्मनी ने एक गुप्त समझौता किया, जिसमें जर्मनी ने इटली का अविसीनियाँ पर प्रभुत्व मान लिया । फ्रान्कों का स्पेन में समर्थन करने एवं साम्यवादी रूस का विरोध करने में परस्पर सहयोग करने का वचन दिया गया । 11 जुलाई 1936 को इटली ने आस्ट्रो-जर्मन समझौते को मान्यता दे दी तथा आस्ट्रिया को जर्मन राज्य का अंग मान लिया। इस प्रकार मुसोलिनी एवं हिटलर मित्र बने ।
 
25 नवम्बर 1936 को हिटलर ने जापान से एण्टी कामिन्टर्न समझौता (Anti Comintern Pact) कर लिया । समझौते का उद्देश्य रूसी साम्यवाद के प्रभाव को रोकना कहा गया । 6 नवम्बर 1937 को इटली भी जर्मनी और जापान के साथ उक्त समझौते में सम्मिलित हो गया । इस प्रकार इटली, जर्मनी, जापान के सशक्त गुट का निमार्ण हुआ। जिसे रोम, बर्लिन, टोकियो धुरी का नाम दिया गया। ये तीनों धुरी राष्ट्र (Axis Power) कहलाने लगे। बाद में हंगरी, मंचुकाओं और स्पेन भी इसमें सम्मिलित हो गये । अब यूरोप स्पष्टतया दो गुटों में बँट गया। एक तरफ धुरी गुट के राष्ट्र और दूसरी तरफ मित्र राष्ट्र जिसमें फ्रांस, ब्रिटेन, रूस इत्यादि का गुट था ।
 

आस्ट्रिया का जर्मनी में विलय

रोम, बर्लिन, टोकियो धुरी बनने के बाद हिटलर मित्र राष्ट्रों की कमजोरियों का लाभ उठाते हुए आस्ट्रिया पर पुनः अधिकार करने का जाल फैलाने लगा । 12 फरवरी 1938 को उसने आस्ट्रिया के प्रधानमंत्री शुशगिन के सामने कुछ कठोर मांगें रखीं । यदि आस्ट्रिया उन्हें स्वीकार कर लेता तो नाजियों का पराधीन बन जाता । आस्ट्रिया में नाजी आन्दोलन बढ़ता ही जा रहा था । अतः प्रधानमंत्री शुशनिंग ने यह घोषणा की कि 13 मार्च 1938 को जनमत संग्रह कराके निर्णय लिया जायेगा कि आस्ट्रिया स्वाधीन रहे या नहीं । हिटलर इस घोषणा से क्रुद्ध हो गया तथा 11 मार्च को हिटलर की सेनायें आस्ट्रिया की तरफ बढ़ीं । 14 मार्च को हिटलर ने वियना में प्रवेश किया। उसने आस्ट्रियन संसद को भंग कर दिया तथा नये चुनाव की आज्ञा जारी की जिसमें 99.73% जनता ने हिटलर का समर्थन किया। एक सरकारी घोषणा द्वारा आस्ट्रिया को जर्मन राइक में मिला दिया गया ।
 

चेकोस्लोवाकिया पर अधिकार

हिटलर का कहना था कि चेकोस्लोवाकिया में लगभल 32 लाख 31 हजार 6 सौ जर्मन लोग रहते हैं जिन्हें स्यूडेटन जर्मन कहा जाता है । हिटलर ने आरोप लगाया कि स्यूडेटन जर्मनों को दबाया जा रहा है। उन्हें आत्मनिर्णय का अधिकार दिया जाना चाहिए । हिटलर ने स्यूडेटेन जर्मनों के नेता कोनार्ड हेन लाइन को उकसाकर चेक सरकार के विरुद्ध स्यूडेटनों का विद्रोह करा दिया। 18 जून 1938 को हिटलर ने चेकोस्लावाकिया पर आक्रमण के आदेश दिये। समस्या के समाधान के लिए ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और जर्मनी के प्रतिनिधि म्यूनिख में मिले। म्यूनिख (Munich) समझौते के अनुसार चेक स्यूडेटन प्रदेश पर हिटलर का अधिकार स्वीकार किया गया। म्यूनिख समझौता तुष्टीकरण नीति की चरम सीमा थी । यह समझौता एक प्रकार से चेकोस्लोवाकिया के लिए मृत्युदण्ड की व्यवस्था थी । बड़े राज्यों के सहयोग से छोटे राष्ट्र चेकोस्लोवाकिया का अंग-भंग कर दिया गया । 

हिटलर इतने से भी संतुष्ट नहीं हुआ।स्लोवाकिया प्रान्त के नेताओं को उसने विद्रोह के लिए उकसाया। चेक सरकार ने विद्रोह को दबाने के लिए स्लोवाक प्रधानमंत्री फादर तिसो को पद से हटा दिया तब हिटलर ने विद्रोही स्लोवाक नेता को बर्लिन में बुलाकर शरण दिया । हिटलर की प्रेरणा से 14 मार्च 1938 को स्लोवाकिया ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया । चेक राष्ट्रपति एमिल हाशा और विदेश मंत्री 15 मार्च को हिटलर से मिलने बर्लिन पहुंचे। उन पर म्यूनिख समझौते के भंग करने का आरोप लगाया। हाशा से 4.30 बजे भोर में ही इस समझौते पर जबरदस्ती हस्ताक्षर करवा लिये गये कि - "चेक जनता एवं चेक भूमि का भाग्यं विश्वास के साथ फ्यूहरर एवं जर्मन राइक के हाथों सौपा जाता है।" 15 मार्च को ही सेना ने चेकोस्लोवाकिया में प्रवेश किया तथा हिटलर ने विजयोल्लास से घोषणा की कि चेकोस्लोवाकिया का अस्तित्व समाप्त हो गया है ।
 

रूस जर्मन अनाक्रमण समझौता

जर्मनी पोलैण्ड को भी हड़पना चाहता था । उसकी तैयारी में उसने रूस से 24 अगस्त 1939 को एक अनाक्रमण समझौता कर लिया । हिटलर का विचार था कि यदि रूस पोलैण्ड के मामले में हस्तक्षेप न करे तो ब्रिटेन एवं फ्रांस को भी पोलैण्ड की रक्षा में कठिनाई पड़ेगी। ब्रिटेन एवं फ्रांस पहले से ही रूसी साम्यवाद का विरोध कर रहे थे । पोलैण्ड रूस का पुराना शत्रु था । अतः इन परिस्थितियों में रूस ने जर्मनी के साथ अनाक्रमण समझौते पर हस्ताक्षर कर देने का निश्चय किया । 

पोलैण्ड पर आक्रमण और द्वितीय महायुद्ध

पूरी राजनीतिक एवं सामरिक तैयारी के पश्चात् जर्मन सेना 1 सितम्बर 1939 को बिना युद्ध की घोषणा के पोलैण्ड में घुस गयी । ब्रिटेन ने पोलैण्ड से सेना हटा लेने की चेतावनी जर्मनी को दी। फ्रांस ने भी प्रयत्न किये किन्तु हिटलर ने किसी की परवाह नहीं की । अतः 3 सितम्बर 1939 को ब्रिटेन एवं फ्रांस ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी । शीघ्र ही अनेक देश युद्ध की विभिषिका में कूद पड़े । 

इस प्रकार शुरुआत में हिटलर की विदेश नीति अत्यधिक सफल रही। उसने बिना कोई बड़ा युद्ध लड़े जर्मनी की सीमाएं बढ़ा दीं और सेना को मजबूत कर लिया। लेकिन उसकी इस आक्रामक और साम्राज्यवादी नीति की अंतिम परिणति द्वितीय विश्व युद्ध के रूप में हुई, जिसने न केवल जर्मनी को पूरी तरह तबाह कर दिया, बल्कि खुद हिटलर के अंत का कारण भी बनी।

COMMENTS

Leave a Reply
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy बिषय - तालिका