द्वितीय विश्वयुद्ध 3 सितम्बर 1939 को प्रारम्भ हुआ और करीब 6 वर्षों तक भयंकर विनाश के बाद 2 सितम्बर 1945 में समाप्त हुआ ।
द्वितीय विश्व युद्ध के परिणाम का विश्लेषण | Impact of World War II
द्वितीय विश्वयुद्ध 3 सितम्बर 1939 को प्रारम्भ हुआ और करीब 6 वर्षों तक भयंकर विनाश के बाद 2 सितम्बर 1945 में समाप्त हुआ । इस युद्ध ने अणुबम का भयानक विनाश देखा । युद्ध की समाप्ति के बाद ऐसा प्रयास किया गया ताकि पुनः युद्ध न हो । युद्ध जब चल रहा था तभी फरवरी 1945 में याल्टा सम्मेलन हुआ जिसका उद्देश्य था ऐसी संस्था का गठन करना जो विश्व में शान्ति स्थापित करे । इसी सम्मेलन के आधार पर संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन हुआ। जुलाई 1945 में बर्लिन के निकट पाट्सडम सम्मेलन हुआ जिसमें जर्मनी एवं जापान के बारे में निर्णय लिया गया तथा युद्ध के उन्माद में लगी शक्तियों को कमजोर करने का प्रयास किया गया । इस सम्मेलन तक अमेरिका ने जापान पर अणु बम गिरा दिये जाने को गोपनीय रखा था, पर जब अमेरिका ने जापान पर एटम बम गिरा दिया तो विश्व के राष्ट्र आश्चर्यचकित रह गये । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पूरे विश्व को आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ा और गरीब राष्ट्र साम्यवाद की ओर उन्मुख हुए । अमेरिका के राष्ट्रपति ने साम्यवाद के बढ़ते प्रभाव पर अंकुश लगाने के लिए ट्रमैन सिद्धान्त के आधार पर कमजोर देशों को आर्थिक सहायता का आश्वासन दिया । अमेरिकी विदेशमंत्री मार्शल की योजना के अनुसार अमेरिका ने यूरोप के राष्ट्रों की भरपूर मदद की और वह यूरोप के राष्ट्रों का अगुवा बन गया। पूंजीवाद और साम्यवाद के बढ़ते प्रभाव के कारण विश्व दो दलों में विभाजित हो गया । परिणामस्वरूप विश्व में शीतयुद्ध शुरू हो गया। द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण साम्राज्यवादी देशों की शक्ति कम हो गयी ।अतः परतंत्र राष्ट्रों को स्वाधीनता संघर्ष करने का अवसर मिला और यूरोप के अधिकतर उपनिवेश कुछ वर्षों के अन्दर ही स्वतंत्र हो गये ।
1 सितम्बर 1939 को प्रारम्भ हुआ विश्वयुद्ध जापान के आत्म समर्पण के बाद अन्तिम रूप से 2 सितम्बर 1945 को समाप्त हुआ । 6 वर्ष तक चले इस महायुद्ध में अढ़ाई करोड़ व्यक्तियों के प्राणों की आहूति दी गई। एक लाख करोड़ की सम्पत्ति का विनाश हो गया । समस्त देश के उद्योग-धन्धों, वाणिज्य-व्यापार पर बुरा प्रभाव पड़ा एवं सारा संसार आर्थिक संकट में जकड़ गया । इस युद्ध ने विश्व राजनीति का मानचित्र ही बदल दिया। साम्राज्यवादी शक्तियाँ अपने उपनिवेशों को नियंत्रित न रख सकीं । अनेक राष्ट्र स्वतंत्र हो गये । विश्व में समाजवाद का प्रभाव बढ़ा। पूरा विश्व दो प्रमुख गुटों में विभाजित हो गया समाजवादी लोकतंत्र एवं पूँजीवादी लोकतंत्र । इस महायुद्ध के निम्नलिखित मुख्य परिणाम निकले -
मित्रराष्ट्रों तथा धुरी राष्ट्रों की भारी धन जन क्षति
यह युद्ध अत्यंत विनाशकारी सिद्ध हुआ। अनुमानतः दोनों पक्षों के ढाई करोड़ से अधिक सैनिक मारे गये । यह युद्ध अत्यन्त एक करोड़ से अधिक घायल हुए। करोड़ों असैनिक नागरिकों का जीवन बम वर्षा आदि में नष्ट हो गये । एक लाख करोड़ से अधिक का व्यय मित्र राष्ट्रों का हुआ और लगभग इतना ही व्यय धुरी राष्ट्रों का हुआ होगा।
औपनिवेशिक साम्राज्यों का अन्त
यह महायुद्ध दो विरोधी विचार धाराओं का टकराव था । एक ओर फासीस्टवादी विचार वाले थे तो दूसरी तरफ प्रजातांत्रिक विचारक । मित्र राष्ट्र प्रजातांत्रिक विचार के पोषक थे । उन्होंने अपने उपनिवेशों का सहयोग इस युद्ध में इस आश्वासन के साथ लिया कि वे उनके स्वतंत्रता के अधिकार को मान्यता देते हैं । इसका परिणाम यह हुआ कि युद्ध की समाप्ति पर एशिया एवं अफ्रीका के देशों में जो इंलैण्ड एंव फ्रांस के उपनिवेश थे उन्होंने अपनी स्वतंत्रता की माँग आरम्भ कर दी । युद्ध का आर्थिक कुप्रभाव ब्रिटेन एवं फ्रांस पर इतना हुआ कि अब उपनिवेशों को बलपूर्वक नियन्त्रण में रख पाना सम्भव नहीं रह गया।अतः ब्रिटेन एवं फ्रांस को एशिया एवं अफ्रीका के कई उपनिवेशों को स्वतंत्र करना पड़ा। इस प्रकार साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद का बिखराव इस युद्ध का महत्वपूर्ण परिणाम था ।
विश्व नेतृत्व की स्पर्धा
इस युद्ध में विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली ब्रिटेन का साम्राज्य बिखर गया। ब्रिटेन की शक्ति पूर्व की अपेक्षा कम हो गयी तब विश्व के अन्य देशों में नेतृत्व प्रदान करने की प्रतिस्पर्द्धा बढ़ी । इस क्रम में संयुक्त राज्य अमेरिका तथा साम्यवादी रूस में विश्व नेतृत्व की महात्वाकांक्षा ने घर कर लिया । धीरे-धीरे विश्व का राजनीतिक नेतृत्व इन्हीं दोनों के हाथों में चला गया ।
परमाणु युग का सूत्रपात
अमेरिका के वायुयान ने 1 अगस्त 1945 में हिरोशिमा पर अणुबम बी 29 गिराया। इसके विस्फोट से हिरोशिमा की 90 प्रतिशत इमारतें क्षतिग्रस्त हो गईं एवं अनुमानतः 7 लाख 50 हजार लोगों की मृत्यु हो गई । इस प्रकार परमाणु युग का सूत्रपात इस भीषण नरसंहार से हुआ।
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना
विश्व शान्ति एवं सहयोग की कामना से संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रयास के फलस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ नामक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था की स्थापना की गयी । इस प्रकार एक तरफ भीषण नरसंहारक, आणविक शस्त्रों का निर्माण शुरू हुआ तो दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र संघ विवादों और समस्याओं को सुलझा कर विश्व में शान्ति स्थापित करने की तरफ अग्रसर हुआ ।
विश्व का दो गुटों में बंटना
इस विश्व युद्ध में पराजय के बाद जर्मनी, जापान और इटली की शक्ति समाप्त हो गयी । इग्लैण्ड एवं फ्रांस के उपनिवेश स्वतंत्र हो गये । फलतः उनकी शक्ति भी कमजोर हो गयी और वे खोखले हो गये । इस प्रकार अब अमेरिका एवं रूस ही विश्व के दो शक्तिशाली राष्ट्र बन गये जिनमें एक अर्थात रूस साम्यवाद का संरक्षक बना तथा दूसरा अमेरिका पूँजीवादी लोकतंत्र का । आधुनिक विश्व में इन्हीं दो विरोधी विचारों और आदर्शों के बीच प्रतिस्पर्द्धा चल रही है ।
इस प्रकार द्वितीय विश्व युद्ध ने न केवल सीमाओं को बदला, बल्कि मानवीय सोच को भी झकझोर कर रख दिया। इसने जहाँ एक ओर विनाश की पराकाष्ठा दिखाई, वहीं दूसरी ओर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, मानवाधिकार और तकनीक के नए युग का सूत्रपात भी किया। आज की वैश्विक व्यवस्था काफी हद तक इसी युद्ध के परिणामों की नींव पर टिकी है।


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