ट्रूमैन सिद्धांत और मार्शल योजना | The Truman Doctrine and the Marshall Plan

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द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की भू-राजनीति को समझने के लिए ट्रूमैन सिद्धांत और मार्शल योजना दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।

ट्रूमैन सिद्धांत और मार्शल योजना | The Truman Doctrine and the Marshall Plan


द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात विजयी तथा पराजित राष्ट्र दोनों ही संकटग्रस्त थे । पराजित राष्ट्र सैनिक, आर्थिक एवं राजनैतिक रूप से ध्वस्त होकर शक्तिहीन हो गये थी । विजयी राष्ट्रों में फ्रांस जब तक जर्मनी के नियंत्रण में रहा शोषित होता रहा। जब सेनाध्यक्ष डी-गाल ने फ्रांस का शासन भार सम्भाला तब तक फ्रांस आर्थिक रूप से खण्डहर एवं सैनिक रूप से शक्तिहीन हो चुका था । युद्धोत्तर काल में युद्ध में धन-जन हानि के कारण ब्रिटेन की स्थिति भी दयनीय बन चुकी थी। युद्ध के बाद ब्रिटेन में आर्थिक संकट, बेरोजगारी एवं खाद्य संकट की समस्या प्रबल थी ।
 
विजयी शक्तियों में संयुक्त राज्य अमेरिका सचेत था । अटलांटिका एवं प्रशान्त महासागर के बीच यह देश पूर्णतया सुरक्षित रहा । अतः युद्धोत्तर विश्व के संगठन में संयुक्त राज्य अमेरिका अपनी धारणा के अनुसार कार्य करेगा, यह निश्चित था ।

संयुक्त राज्य अमेरिका ने सर्वप्रथम अपने घनिष्ट मित्र देश फ्रांस, ब्रिटेन, बेल्जियम, नीदरलैण्ड की आर्थिक नीति एवं स्थिति में सुधार हेतु प्रचुर मात्रा में धन और रसद की सहायता देनी शुरू की। इस क्रम में केवल ब्रिटेन को ही अमेरिकी सरकार ने एक किश्त में 3.5 मिलियन करोड़ डालर का ऋण दिला दिया । इस ऋण प्रबन्ध को यूरोप का आर्थिक पुनर्वास कहा गया ।
 
इस ऋण देने तथा आर्थिक सहायता प्रदान करने के पीछे अमेरिका को दो उद्देश्य परिलक्षित होते हैं - 
  1. ट्रूमैन सिद्धांत और मार्शल योजना | The Truman Doctrine and the Marshall Plan
    सहायता या ऋण के नाम पर धन, औद्योगिक वस्तुएँ, खाद्य सामग्री आदि का पश्चिमी यूरोप के आर्थिक पुनर्वास के लिए निर्यात बिना सीमा शुल्क तथा व्यापार कर लिये सम्भव था । इसके परिणामस्वरूप पश्चिमी यूरोपीय देशों के सहायता के नाम पर अमेरिका द्वारा मुक्त व्यापार शुरू किया गया। सहायता प्राप्त देश समूह अमेरिका के निकट आने लगे और वे राजनैतिक दृष्टि से उसके आभारी बने 
  2. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद लोग निर्धनता, बेकारी और भूख से त्रस्त होकर त्राहि-त्राहि कर रहे थे । इन परिस्थितियों में साम्यवाद का प्रचार-प्रसार स्वाभाविक हो गया । रूस चाहता था कि विश्व में साम्यवादी व्यवस्था का प्रचार-प्रसार हो तथा पूँजीवादी व्यवस्था का वहिष्कार हो जाय । अमेरिका एक पूँजीवादी देश था अतः साम्यवादी व्यवस्था उसके लिए खुली चुनौती थी । अतः अमेरिका की धारणा बनी कि आर्थिक ऋण प्राप्त कर यूरोपीय देशों की सरकारें आर्थिक उन्नति तथा विकास के द्वारा अपने क्षेत्रों में साम्यवाद का प्रसार रोक सकती हैं। इसी पृष्ठभूमि में आर्थिक पुनर्वास योजना के अन्तर्गत टूमैंन सिद्धान्त तथा मार्शल योजनाओं को लागू किया गया ।

टूमैंन सिद्धान्त (Truman Doctrine)

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रमैन ने मार्च 1947 में अमेरिकी कांग्रेस से यूनान को 25 करोड़ डालर तथा टर्की को 15 करोड़ डालर की सहायता देने की सिफारिश करते हुए घोषणा की कि - "स्वतंत्र देशों की वाह्य प्रभाव से रक्षा करना संयुक्त राज्य अमेरिका की नीति होनी चाहिए ।" 12 मार्च 1947 को कांग्रेस के दोनों सदनों की बैठक में दिये गये अपने भाषण में ट्रूमैन ने अपने सिद्धान्त की व्याख्या प्रस्तुत की । इस सिद्धान्त की प्रमुख बातें निम्नलिखित थीं - 
  1. बाहरी दबाव अथवा सशक्त अल्पसंख्यक द्वारा स्थापित किये जाने वाले शासनों का प्रतिरोध करने वाली स्वतंत्र जनता का समर्थन किया जाना चाहिए ताकि वह अपनी इच्छानुसार अपने भाग्य का निर्माण कर सके ।
  2. अमेरिका की सहायता आर्थिक और वित्तीय होनी चाहिए जो आर्थिक स्थायित्व और राजनीतिक सुव्यवस्था के लिए अनिवार्य है । 
  3. सर्वाधिकारवादी शासनों के बीज दुःख एवं दरिद्रता में पनपते हैं। उनका विकास निर्धनता एवं संघर्ष में होता है । जब जनता में उत्कृष्ठ जीवन की आशा नष्ट हो जाती है तभी इसका विकास होता है, अतः आशा नष्ट नहीं होनी चाहिए । 
  4. यदि संयुक्त राज्य ने स्वतंत्र जनता को अपना नेतृत्व नहीं दिया तो विश्व शान्ति खतरे में पड़ जायेगी और संयुक्त राज्य का भी अकल्याण ही होगा । 

अमेरिका के तीन कदम
टूमैन सिध्दान्त के अन्तर्गत दिये गये प्रचुर आर्थिक मदद के कारण यूनान एवं टर्की साम्यवादी प्रभाव से मुक्त हो गये।अमेरिका की यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी।साम्यवाद को रोकने के लिए अमेरिका ने तीन प्रमुख कदम उठाये -
  • आर्थिक दृष्टि से पिछड़े राष्ट्रों को आर्थिक सहायता देने तथा आर्थिक पुनर्निर्माण के कार्यक्रम अपनाये गये ।
  • राजनीतिक दृष्टि से पश्चिमी यूरोपीय संघ की रचना का प्रयास किया गया। 
  • सैनिक दृष्टि से अनेक सैनिक संगठन स्थापित किये गये ।

मार्शल योजना (Marshall Plan)

यूरोपीय आर्थिक पुनर्निर्माण को सरलतापूर्वक सक्रिय बनाने में मार्शल योजना का सहारा लिया गया । 5 जून 1947 को अमेरिका के विदेशमंत्री ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में भाषण देते हुए कहा कि "हमारी नीति किसी देश या सिद्धान्त के विरुद्ध नहीं है । यह भूखमरी, गरीबी, निराशा और अव्यवस्था के विरुद्ध है। इस नीति का उद्देश्य विश्व में एक ऐसी व्यवस्था स्थापित करना है जिसमें स्वतंत्र संस्थाओं को विकसित करने वाली राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियाँ उत्पन्न हों... सरकार द्वारा यूरोप को सहायता दिये जाने से पहले यह आवश्यक है कि यूरोपियन देशों की यह स्पष्ट है कि संयुक्त राज्य अमेरिका की इस सहायता की आवश्यकता के सम्बन्ध में समझौता किया जाय।” विदेश मंत्री मार्शल ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि यूरोपीय राष्ट्र सहायता चाहेंगे तो उन्हें वह अवश्य प्राप्त होगी ।

यूरोपियन आर्थिक सहयोग समिति (European Economic Co-oprative Committee) या (E.E.C.C)
राष्ट्रपति टमैन ने भी मार्शल योजना को स्वीकृति दे दी । जुलाई 1947 में फ्रांस की पहल पर पेरिस में 16 राष्ट्रों का एक सम्मेलन बुलाया गया जिसमें इग्लैण्ड, फ्रांस, बेल्जियम, डेनमार्क, नीदरलैण्ड, ग्रीस, आइसलैण्ड, इटली, नार्वे, स्वीडेन, लक्सेम वर्ग, पुर्तगाल आदि देशों के प्रतिनिधि सम्मिलित हुए। इस सम्मेलन में एक यूरोपीय आर्थिक सहयोग समिति (E.E.C.C.) की स्थापना की गयी । इस समिति ने जो रिपोर्ट प्रस्तुत की उसमें कहा गया कि यदि अमेरिका 19.3 मिलियन डालर खर्च कर सके तो 1951 तक एक आत्म निर्भर यूरोपीय अर्थव्यवस्था बनायी जा सकती है। इसे ही मार्शल योजना कहा गया ।

यूरोपियन आर्थिक सहयोग संगठन ( European Economic Co-opertive Organisation) (E.E.C.O.)
अमेरिकी कांग्रेस ने मार्शल योजना को स्वीकार कर लिया। इस योजना को यूरोपीय रिलिफ प्रोग्राम (European Relief Programme) भी कहा गया । इस योजना के अन्तर्गत 4 वर्ष में 11 अरब डालर खर्च किये गये। इसी योजना ने अमेरिका को यूरोप का नेता बना दिया । मार्शल योजना टूमैन सिद्धान्त का ही एक विकसित रूप था। इसमें अन्दर केवल इतना ही था कि टूमैन सिद्धान्त में अलग-अलग देशों की सहायता की व्यवस्था थी; किन्तु (मार्शल योजना केवल यूरोपीय राज्यों तक सीमित था।

इस प्रकार जहाँ ट्रूमैन सिद्धांत ने दुनिया को यह बताया कि अमेरिका साम्यवाद के खिलाफ 'कहाँ' लड़ेगा, वहीं मार्शल योजना ने वह 'साधन' (पैसा और संसाधन) प्रदान किए जिससे साम्यवाद की जड़ें कमजोर की जा सकें। इन दोनों ने मिलकर आधुनिक 'पश्चिमी ब्लॉक' का निर्माण किया।

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