हिंदी साहित्य के रीतिकाल (लगभग 1700-1900 वि.सं.) की सबसे प्रमुख विशेषता 'रीति' निरूपण है। इस काल में कवियों ने केवल कविता ही नहीं रची,
रीतिकालीन कवियों का आचार्यत्व
रीतिकाल में दरबारी संस्कृति की पृष्ठभूमि और संस्कृत काव्यशास्त्र की समृद्ध परम्परा की प्रेरणा से रीतिनिरूपण की प्रवृत्ति व्यापक रूप से दिखाई पड़ती है. रीतिनिरूपण के अन्तर्गत काव्य के विभिन्न अंगों का विवेचन लक्षण ग्रन्थों में मिलता है, जिनके रचनाकार आचार्य कवि कहलाए. इन आचार्य कवियों ने अपनी प्रेरणा और अपने आचार्यत्व के प्रदर्शन के लिए अथवा अपने आश्रयदाता की इच्छा से लक्षण ग्रन्थों (शास्त्रीय काव्य ) की रचना की.
रीतिकाल के लक्षण ग्रन्थों पर संस्कृत साहित्य के पाँच काव्य सम्प्रदायों (रस, अलंकार, ध्वनि, वक्रोक्ति और रीति) का प्रभाव किसी-न-किसी रूप में अवश्य पड़ा है. यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि रीतिकालीन आचार्य कवियों ने रस, अलंकार और ध्वनि सम्बन्धी लक्षण ग्रन्थ अधिक लिखे. रीति और वक्रोक्ति पर प्रायः नहीं लिखा गया.
रीतिकाल में आचार्य कवि की परम्परा का श्रीगणेश केशव द्वारा होता है. यद्यपि वे भक्ति काल की सीमा में आते हैं, किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि उनकी 'कविप्रिया' और 'रसिक प्रिया' ने रीतिकाल में रीतिनिरूपण की परम्परा का प्रवर्त्तन किया. केशव की रचनाओं में वस्तुतः हिन्दी काव्य शास्त्र की परम्परा का समग्र रूप दिखाई पड़ता है. रीतिशास्त्र पर प्राप्त सबसे पहला ग्रन्थ कृपाराम का 'हिततरंगिणी' (1541 ई.) माना गया है, जो भरत के नाट्यशास्त्र पर आधारित है. इसके बाद मोहनलाल मिश्र का 'शृंगार सागर' (1559 ई.) है, जिसमें नायिका भेद विवेचन किया गया है. नन्ददास की 'रसमंजरी' भी इसी के आसपास की शास्त्रीय रचना है. आचार्यत्व की दृष्टि से केशव को छोड़कर उपर्युक्त रचनाओं का विशेष महत्व नहीं है. अतः रीतिकालीन आचार्य कवि परम्परा के प्रवर्त्तक केशवदास ही सिद्ध होते हैं, जिनका अलंकार सम्प्रदाय से घनिष्ठ सम्बन्ध था.
अलंकारवादी आचार्य कवियों में जसवंत सिंह (भाषा भूषण), मतिराम ( अलंकार पंचाशिका, ललित ललाम), भूषण (शिवराज भूषण) और पद्माकर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं. इसी प्रकार रसवादी आचार्य कवियों में तोष (सुधानिधि) और मतिराम (रसराज) ने महत्वपूर्ण कार्य किया है. देव का रस विवेचन 'भावविलास', 'भवानी विलास' और 'काव्य रसायन' में दिखाई पड़ता है. देव ने रस के दो भेद-लौकिक और अलौकिक दिखाकर रस विवेचन में अपनी मौलिकता प्रदर्शित करने का प्रयास किया है. अन्य कवियों में रसलीन (अंगदर्पण, रस प्रबोध), रामसिंह (रस निवास), बेनी प्रवीन और ग्वाल का नाम भी लिया जा सकता है.
हिन्दी रीतिशास्त्र में ध्वनि के सर्वप्रथम आचार्य कुलपति मिश्र हैं. 'रस रहस्य' (1670 ई.) उनके प्रौढ़ और प्रामाणिक विचारों की रचना है. देव, सुरति मिश्र, कुमारमणि भट्ट, श्रीपति, सोमनाथ, भिखारीदास, प्रतापसाहि तथा रामदास के नाम उल्लेखनीय हैं. भिखारी दास का 'काव्य निर्णय' कवि की प्रौढ़ आचार्य प्रतिभा को प्रदर्शित करता है.
रीति निरूपण के अन्तर्गत लक्षण ग्रन्थों की परम्परा में रीतिकालीन आचार्य कवियों के आचार्यत्व पर विचार करें तो पाएंगे कि ये कवि काव्य-आचार्य कम काव्य शिक्षक अधिक हैं, क्योंकि-
- इनमें मौलिकता का अंश बहुत कम है. इनके लक्षण ग्रन्थ संस्कृत के काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों के अनुवाद हैं या उनकी छाया पर आधारित हैं.
- इन आचार्य कवियों का उद्देश्य सामान्य पाठकों को काव्यांगों का परिचय देना मात्र था, काव्यांगों का गहन विवेचन करना नहीं.
- अपने आचार्यत्व का प्रदर्शन और सामान्य जनता और दरबारी सामन्तों के मनोरंजन के उद्देश्य के कारण भी इन आचार्य कवियों की रचनाओं का स्तर बहुत ऊँचा नहीं है.
इसके बावजूद यह मानना ही होगा कि संस्कृत की काव्यशास्त्र परम्परा को हिन्दी में लाने का श्रेय रीतिकालीन आचार्य कवियों को है. उनका आचार्यत्व संस्कृत के काव्याचार्यों के स्तर का भले ही न हो, सामान्य पाठकों के लिए वह उपयोगी, सरस और सुबोध है. वस्तुतः रीतिकाल के आचार्य कवि शास्त्रकार नहीं थे बल्कि रीतिकार थे. अतः उनका मूल्यांकन भी उसी आधार पर होना चाहिए.
हिन्दी के रीति आचार्यों का प्रमुख योगदान यही है कि उन्होंने भारतीय काव्यशास्त्र की परम्परा को ब्रज भाषा के माध्यम से सरस और सुबोध रूप में विकसित किया. निश्चय ही इससे हिन्दी काव्य को शास्त्र-चिन्तन की प्रौढ़ता प्राप्त हुई. दूसरा योगदान यह है कि इन आचार्य कवियों ने रस को ध्वनि के प्रभुत्व से मुक्त कर रसवाद की पूर्ण प्रतिष्ठा की.फलतः पूरी दो शताब्दियों तक रसराज शृंगार की अविच्छिन्न धारा हिन्दी काव्य में प्रवाहित होती रही.


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