देह धुर्रा के ढेर रे संगी

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देह धुर्रा के ढेर रे संगी देह धुर्रा के ढेर रे संगी, एकर का भरोसा, देह धुर्रा के ढेर रे संगी, एकर का भरोसा, हवा चलिस त उड़ जाही, का राजा का रोसा।

देह धुर्रा के ढेर रे संगी


देह धुर्रा के ढेर रे संगी, एकर का भरोसा,
देह धुर्रा के ढेर रे संगी, एकर का भरोसा,
हवा चलिस त उड़ जाही, का राजा का रोसा।

साँस के डोरी बंधे हवय बस, पल-दू पल के आस,
काल झपट्टा मार लेही, रहि जाही खाली साँस।

देह धुर्रा के ढेर रे संगी...
मन के भीतर मनखे खोजत,
उमर गिस बरबोसा।
एके बात ल सच मानेनव,
दुनिया लागिस धोखा।

देह धुर्रा के ढेर रे संगी
ओही सच के राख समेटत,
भीतर सूत जरिस।
जेन ल हीरा समझत रहेंव,
ओ त काँच निकरिस।

देह धुर्रा के ढेर रे संगी...
जेन ल पाना समझत रहेंव,
ओ त छैयाँ निकरिस।

दउड़त-दउड़त दिन ढलगे,
हाथ म धूर बचरिस।
समय कहिस – "चल संग मोर",
मंय कहेंव – "थोरिक ठहर"।

ठहरत-ठहरत साँझ होगे,
भोर गिस कब उतर।
देह धुर्रा के ढेर रे संगी...
मोर कहिके जेन समेटेंव,
ओ सब परछाईं रिहिस।

जेन ल छोड़ेंव अपन समझके,
ओही असली मंहीस।
नदी किनारे पियासे बइठेंव,
पानी खोजत-खोजत।

अपन अँजोरी बंद रखे रहेंव,
किस्मत कोसत-कोसत।
देह धुर्रा के ढेर रे संगी...
अब जब पाँव म ताकत नइये,
आँखी म उजियारा कम।

तब समझ म आये रे संगी,
रद्दा नई, चलना धरम।
मंदिर-मंदिर भटकत रहेंव,
देव खोजत रोज।

जीना खुदे परसाद रहिस,
साँस-साँस म भोज
देह धुर्रा के ढेर रे संगी...
जिनगी भर परदा उठावत,
भेद खोजत रहेंव।

तमाशा देखे बर निकरेंव,
खुदे तमाशा बन गेंव।
खाली हाथ आइस दुनिया म,
खाली हाथ जाबो।

नेकी के दू फूल छोड़के,
का संग ले जाबो?
देह धुर्रा के ढेर रे संगी, एकर का भरोसा,
हवा चलिस त उड़ जाही, का राजा का रोसा।


- नितेश बनाफर 
अकलतरा, छत्तीसगढ़
मोबा. नं: 6267660114

COMMENTS

Leave a Reply: 4
  1. शीर्षक सुनते ही कबीर के जीवन दर्शन की याद आती है—"माटी कहे कुम्हार से" या "यह तन काँचा कुंभ है"। 'देह धुर्रा के ढेर रे संगी' सीधा संदेश देता है कि नश्वर संसार में यह शरीर अंततः मिट्टी या राख का एक ढेर मात्र है। इस भौतिकवादी युग में, जहाँ लोग अहंकार और दिखावे में खोए हैं, ऐसी ज़मीन से जुड़ी रचनाएं इंसान को उसकी असलियत और जड़ों से रूबरू कराती हैं।

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  2. देह धुर्रा के ढेर रे संगी" छत्तीसगढ़ी लोकसंवेदना और जीवन-दर्शन का अद्भुत संगम है। कविता में देह की क्षणभंगुरता, समय की निर्ममता और आत्मबोध की यात्रा को बेहद सहज और मार्मिक भाषा में व्यक्त किया गया है। हर अंतरा पाठक को अपने जीवन के भ्रमों, मोह और सच्चाइयों से रूबरू कराता है। यह रचना केवल कविता नहीं, बल्कि जीवन को देखने का एक दृष्टिकोण है।

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  3. छत्तीसगढ़ी भाषा में लिखी गई यह रचना अपनी सहजता, गेयता और गहन चिंतन के कारण विशेष बन जाती है। कविता में जीवन की दौड़, समय का प्रवाह, रिश्तों की सच्चाई और आत्मचिंतन को लोकबिंबों के माध्यम से अत्यंत प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया गया है। यह रचना पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि ठहरकर अपने जीवन पर विचार करने के लिए विवश करती है। समकालीन छत्तीसगढ़ी साहित्य में ऐसी रचनाएँ दुर्लभ हैं जो इतनी सरल भाषा में इतना गहरा दर्शन प्रस्तुत कर सकें।

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  4. बेनामीजून 17, 2026 2:02 pm

    लोकधुन जैसी सहज प्रवाहमयी भाषा और जीवन के गहरे अनुभवों से सजी यह रचना छत्तीसगढ़ी साहित्य की सुंदर अभिव्यक्ति है। कविता का संदेश सरल होते हुए भी बेहद प्रभावशाली है।

    जवाब देंहटाएं
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