पेरिस शांति सम्मेलन और उसके परिणाम The 1919 Paris Peace Conference प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) की समाप्ति के बाद, विजयी मित्र राष्ट्रों Allied Power
पेरिस शांति सम्मेलन और उसके परिणाम | The 1919 Paris Peace Conference
प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) की समाप्ति के बाद, विजयी मित्र राष्ट्रों (Allied Powers) ने युद्ध के बाद की दुनिया की नई व्यवस्था और शांति शर्तों को तय करने के लिए 18 जनवरी 1919 को पेरिस में एक वैश्विक सम्मेलन का आयोजन किया। इसे पेरिस शांति सम्मेलन (Paris Peace Conference) कहा जाता है।
यह सम्मेलन इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण और विवादित कूटनीतिक आयोजनों में से एक है, जिसने न केवल तत्कालीन विश्व का नक्शा बदल दिया, बल्कि अनजाने में द्वितीय विश्व युद्ध के बीज भी बो दिए।चार वर्ष 3 माह से भी अधिक लम्बे चले इस भयंकर महायुद्ध का अंत 11 नवम्बर 1918 को युद्ध विराम संधि द्वारा हुआ । युद्ध की भीषण मारकाट व क्षति से सारी दुनियाँ बुरी तरह आतंकित थी । युद्ध विराम के बाद एक स्थायी शान्ति की तलाश थी और इस शान्ति व्यवस्था को तय करने के लिये उपयुक्त स्थान पेरिस को चुना गया । शान्ति सम्मेलन का उद्घाटन 18 जनवरी 1919 को हुआ । इस शान्ति सम्मेलन में 32 राष्ट्रों के 70 प्रतिनिधियों ने भाग लिया । रूस की आन्तरिक परिस्थितियों को देखते हुए उसे निमंत्रित नहीं किया गया था । पराजित राष्ट्रों को भी सम्मेलन में भाग लेने के लिये नहीं बुलाया गया था, क्योंकि उनका काम केवल इतना रखा गया था कि संधि का प्रारूप पूर्ण हो जाने पर अपना हस्ताक्षर कर दें।
सर्वोच्च शान्ति परिषद - शान्ति सम्मेलन की कार्यवाही को चलाने के लिये दस सदस्यों वाली एक सर्वोच्च शान्ति परिषद का निर्माण किया गया। इस परिषद में तत्कालीन महान राष्ट्रों इंग्लैण्ड, फ्रान्स, अमेरिका, इटली और जापान के दो-दो प्रतिनिधि लिये गये । इनमें से इंग्लैण्ड के लायड जार्ज, फ्रान्स के क्लीमेन्शो, अमेरिका के विल्सन और इटली के ओरलेन्डो मुख्य थे । उन्हें सम्मेलन के चार मुख्य (Big Four) व्यक्तियों के नाम से जाना गया। सर्वोच्च परिषद के अतिरिक्त 58 लगभग छोटे बड़े आयोग और उपसमितियाँ भी बनायी गयीं। इनका काम था कि विविध समस्याओं - राष्ट्रों का गठन, क्षतिपूर्ति की रकम, अल्पसंख्यकों की समस्या, नवीन प्रदेशों का निर्माण, सेना तथा शस्त्र कटौती इत्यादि प्रश्नों पर विशद रूप से विचार करके अपनी रिपोर्ट दें । इनकी रिपोर्ट पर अन्तिम निर्णय देने का अधिकार सर्वोच्च शान्ति परिषद को ही था । शान्ति सम्मेलन का काम केवल उसी निर्णय का अनुमोदन करना था । सर्वोच्च शान्ति परिषद के कार्यवाहियों को शीघ्रता से पूरा करने तथा कार्यवाही की गोपनीयता को बनाये रखने के दृष्टिकोण से मार्च 1919 में इसका कार्य विल्सन, लायड जार्ज, क्लिमेन्शों तथा औरलेन्डो जैसे चार महान व्यक्तियों के जिम्मे सुपुर्द कर दिया गया।
शान्ति सम्मेलन के मुख्य आधार : विल्सन के चौदह सिद्धान्त 8 जनवरी 1918 को अर्थात् युद्ध विराम के पूर्व ही अमेरिका के राष्ट्रपति विल्सन ने चौदह सिद्धान्तों की घोषणा की। विल्सन के चौदह सिद्धान्तों के आधार पर ही युद्ध विराम के बाद शान्ति समझौते की बात शुरू की गयी । विल्सन ने कहा था - "हमारा जर्मन लोगों से कोई संघर्ष नहीं है । जर्मन लोगों के विरुद्ध हमें कोई घृणा नहीं है बल्कि उनसे हम सहानुभूति एवं मित्रता रखते हैं।" विल्सन पराजित राष्ट्रों के साथ अन्य मित्र राष्ट्रों की भाँति प्रतिशोध या दण्डात्मक कार्यवाही से प्रेरित नहीं था। विल्सन का कहना था - "हम प्रत्येक देश और राष्ट्र के साथ ऐसा न्याय करना चाहते हैं जिसमें किसी को यह कहने का अवसर ही न मिले कि किसी देश के साथ हम न्याय करना चाहते थे और किसी देश के साथ न्याय नहीं करना चाहते थे।" विल्सन के चौदह सिद्धान्त इस प्रकार थे -
- शान्ति समझौते गुप्त कूटनीति को समाप्त करने के लिये खुले रूप में किये जाँय ।
- समुद्रों में युद्ध एवं शान्ति दोनों ही अवस्था में सभी राष्ट्रों का समान अधिकार माना .
- अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की कठिनाइयों को दूर किया जाय ।
- राष्ट्र शस्त्रार्थों के निर्माण में कमी करें ।
- उपनिवेशों के दावे के सम्बन्ध में निष्पक्ष एवं न्याय के आधार पर निर्णय हों।
- रूस की भूमि छोड़ दी जाय और उसे विकास का समुचित अवसर दिया जाय ।
- बेल्जियम से जर्मनी अपने अधिकार छोड़ दे और वेल्जियम को स्वतंत्र राष्ट्र जैसा स्थान दिया जाय ।
- अल्सेस और लारेन प्रान्त फ्रान्स को वापस दे दिये जाये और फ्रान्स की यथापूर्व स्थिति रखी जाय ।
- इटली की सीमाओं का निर्धारण राष्ट्रीयता के आधार पर होना चाहिए ।
- आस्ट्रिया हंगरी को स्वशासन सम्बन्धी अधिकार मिले ।
- सर्बिया, मान्टिनेग्रो और रूमानियाँ को धूरी राष्ट्र खाली कर दें ।
- सर्विया को समुद्र तक पहुँचने का सुरक्षित मार्ग मिलना चाहिए ।
- तुर्की साम्राज्य के उन प्रदेशों को जो मूल रूप से तुर्की के हैं, सम्प्रभुता की रक्षा की जाय। शेष को उसके अधीन स्वायत्त शासन का अधिकार दिया जाय ।
- पोलैण्ड के स्वतंत्र राज्य का निर्माण करके उसे समुद्र तक पहुँचने की सुविधा दी जाय .
- समस्त राष्ट्रों की राजनीतिक स्वतंत्रता और प्रादेशिक अखण्डता की रक्षा के लिये 'राष्ट्र संघ' नामक संस्था की स्थापना की जाय ।
ये सिद्धान्त पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं थे । ये सिद्धान्त सभी देशों को स्वीकार भी नहीं हो सकते थे। इन सिद्धान्तों में 9 बातें भू-भागीय व्यवस्था से सम्बन्धित थीं और 5 ऐसी थीं जिनके आधार पर भविष्य में युद्ध की पुनरावृत्ति न हो । समझौते को तैयार करते समय व्यवहारिक स्तर पर बहुत से परिवर्तन करने पड़े । इसमें से कुछ को ही स्वीकार किया जा सका । कुछ को मित्र राष्ट्रों के पक्ष में बदला गया तथा कुछ को उपेक्षित कर दिया गया ।
विल्सन का कहना था कि इस समझौते में केवल विजयी राष्ट्रों के स्वार्थ तथा हित का ध्यान न रखा जाय, बल्कि उन राष्ट्रों की इच्छाएँ भी ध्यान में रखी जाँय जिन पर इन समझौते का असर पड़ेगा। अन्तर्राष्ट्रीय नैतिकता और न्याय की प्रतिमूर्ति राष्ट्रपति विल्सन एक नयी दुनियाँ बसाने की योजना बना रहे थे। लेकिन फ्रान्स के क्लिमेन्शो तथा इंग्लैण्ड के कूटनीतिज्ञ लायड जार्ज के सामने विल्सन असमर्थ एवं शक्तिहीन हो गये । फ्रांस के एक प्रस्ताव ने विकट समस्या उपस्थित कर दी । उसने मांग की कि फ्रांस की भावी सुरक्षा को देखते हुए फ्रांस और जर्मनी सीमा पर एक स्वायत राज्य बनाया जाय। इससे जर्मनी द्वारा फ्रांस पर आक्रमण का भय नहीं रहेगा। सम्मेलन ने फ्रांस के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। अमेरिका एवं इंग्लैण्ड द्वारा सुरक्ष का वचन दिए जाने पर फ्रांस ने अपनी जिद छोड़ दी ।
पेरिस स्मेलन में पराजित राष्ट्रों (जर्मनी, आस्ट्रिया, टर्की) के प्रतिनिधियों को न बुलाये जाने के कारण उनके पक्षों को रखने वाला कोई नहीं रहा । मित्र राष्ट्रों ने निश्चय किया कि पराजित राष्ट्रों से संधि कर उन्हें दण्ड देने, उनसे युद्ध का हरजाना लेने तथा भविष्य में शान्ति स्थापित करने के लिए उनकी शक्ति कम कर देंगे। इन उद्देश्यों के लिए पराजित राष्ट्रों से वर्साय, सेंटजर्मेन, न्योली, त्रयानो तथा सेब की पांच संधियां की गयीं । इन संधियों द्वारा पराजित राष्ट्रों के भू-भाग छीनकर उन्हें अपमानित किया गया । विल्सन के पोलैण्ड निर्माण तथा राष्ट्र संघ की स्थापना तथा अन्य दो प्रस्तावों को छोड़कर अन्य प्रस्ताव अमान्य कर दिए गये।
मनमुटाव के बावजूद भी सम्मेलन ने किसी तरह अपना कार्य पूरा किया । सम्मेलन ने 1600 बैठकें करके अपने 58 आयोगों द्वारा जर्मनी के साथ संधि का एक प्रारूप तैयार किया जिसे वर्साय की संधि के नाम से जाना गया।पेरिस शान्ति सम्मेलन द्वारा तैयार यह मुख्य संधि थी । पेरिस सम्मेलन विएना सम्मेलन की तरह बदले की भावना से युक्त थी अतः स्थायी समाधान न निकाल कर द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार करने वाला सम्मेलन बना।


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