विपरीत राजयोग और कुंडली में इसका महत्व पत्रिका में बनने वाला विपरीत राजयोग विपरीत परिस्थितियों में अचानक मिलने वाले लाभ की ओर इशारा करता है।
विपरीत राजयोग और कुंडली में इसका महत्व
पत्रिका में विपरीत राजयोग की मौजूदगी ग्रहों तथा भावों के उस योग को इंगित करती है, जिसमें विपरीत परिस्थितियों के बावज़ूद भी जातक को जीवन में सफलता की प्राप्ति होती है। महान ज्योतिषशास्त्री पाराशर जी ने विपरीत राजयोग के कुछ प्रकार बताए हैं। पत्रिका में छठवें, आठवें तथा बारहवें भाव को दु:ख स्थान कहा जाता है, अर्थात् पत्रिका के ये भाव विपरीत भाव होते हैं। चूँकि तीसरा भाव परिश्रम का भाव होने के साथ-साथ कामनाओं के उजागर होने का भी भाव है, कदाचित इसलिए पाराशर जी ने कई स्थानों पर तीसरे भाव को भी विपरीत भाव कहा है। कई ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार बारहवाँ भाव अन्य विपरीत भावों की तुलना में सर्वाधिक कम विपरीत है। ज्योतिषशास्त्र की कालजयी किताबों जैसे फलदीपिका तथा बृहद् पाराशर होरा शास्त्र में मुख्यतः तीन प्रकार के विपरीत राजयोगों का उल्लेख है, जिनके नाम हैं: 1) हर्ष योग 2) सरल योग 3) विमल योग।
सामान्यतः जब पत्रिका में किसी भाव का स्वामी तृतीय, षष्ठम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में, शत्रु राशि में, अशुभ ग्रहों के साथ युति में अथवा पाप कर्तरी योग में अथवा अशुभ ग्रहों से दृष्ट अथवा अस्त हो तो उसे भाव की फलों में कमी हो जाती है परंतु तृतीय, षष्टम, अष्टम या द्वादश भाव के स्वामियों के लिए यह नियम लागू नहीं होता, अपितु इनके लिए विपरीत नियम लागू होते हैं। यदि षष्ठेश छठवें, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो तो उसे हर्ष योग कहा जाता है। साथ ही यदि षष्ठेश पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो तथा वह नीच राशि में या शत्रु राशि में स्थित हो तब ही हर्ष योग के उचित फलों की प्राप्ति होती है। यदि अष्टमेश छठवें, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो तो उसे सरल योग कहा जाता है, साथ ही यदि अष्टमेश पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो तथा वह नीच राशि में या शत्रु राशि में स्थित हो तब ही सरल योग के उचित फलों की प्राप्ति होती है। यदि द्वादशेश छठवें, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो तो उसे विमल योग कहा जाता है, साथ ही यदि द्वादशेश पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो तथा वह नीच राशि में या शत्रु राशि में स्थित हो तब ही विमल योग के उचित फलों की प्राप्ति होती है। इन योगों में यदि हर्ष योग में षष्ठेश पर, सरल योग में अष्टमेश पर या विमल योग में द्वादशेश पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तथा वे स्वराशि, मित्रराशि या उच्च राशि में स्थित हो तो इन योगों के फलों में कमी आ जाती है अर्थात् ऐसी स्थिति में इन योगों के पूर्ण परिणाम प्राप्त नहीं होंगे। अर्थात् हर्ष, सरल व विमल योग तभी पूर्णतः प्रभावी होंगे जब हर्ष योग में षष्ठेश, सरल योग में अष्टमेश तथा विमल योग में द्वादशेश विपरीत भावों में स्थित होने के साथ-साथ बलहीन या पीड़ित भी हों। इसके साथ ही लग्न का बली होना अति आवश्यक है, क्योंकि कोई भी राजयोग तभी पूर्णतः फलदायक होता है जब लग्न बली हो। लग्न के पीड़ित होने पर अच्छे से अच्छा राजयोग भी पूर्ण प्रभाव नहीं दे पाता है। इन विपरीत राजयोगों की विवेचना करते समय इस बात को भी देखना चाहिए कि राजयोग का निर्माण करने वाले ग्रह के पास किन भावों का स्वामित्व है, क्योंकि सूर्य व चंद्रमा के अतिरिक्त प्रत्येक ग्रह के पास दो-दो राशियों का स्वामित्व है। उदाहरण के लिए वृश्चिक लग्न की पत्रिका में लग्नेश मंगल है, साथ ही षष्ठेश भी मंगल है। यदि मंगल अष्टम भाव में मिथुन राशि में स्थित हो जाए तो यह हर्ष योग तो बनेगा लेकिन जातक को इस योग के संपूर्ण प्रभाव प्राप्त नहीं हो पाएँगे क्योंकि मंगल लग्नेश होकर अष्टम स्थान में शत्रु राशि में स्थित होकर पीड़ित है। एक अन्य उदाहरण के अंतर्गत सिंह लग्न की पत्रिका में बृहस्पति पंचमेश तथा अष्टमेश है। यदि बृहस्पति षष्ठम भाव में मकर राशि में स्थित हो तो वह नीच राशि में स्थित होगा। अतः इस पत्रिका में सरल योग का निर्माण तो हो रहा है, परंतु बृहस्पति पंचमेश होकर षष्ठम स्थान में नीच राशि में स्थित होने से पीड़ित भी हो रहा है। बृहस्पति संतान का कारक भी है। अतः बृहस्पति की दशा-अंतर्दशा में जातक को सरल योग के फल प्राप्त होने के साथ-साथ संतान से संबंधित कष्टों का भी सामना करना पड़ सकता है, जिससे सरल योग के फल की महत्ता कम हो जाएगी।
उपरोक्त पत्रिका में षष्ठेश शनि द्वादश भाव में शत्रु राशि में राहु व मंगल के साथ है, अष्टमेश मंगल भी द्वादश भाव में राहु और शनि से पीड़ित है। द्वादशेश सूर्य अष्टम भाव में है, हालांकि अपनी उच्च राशि में है लेकिन राहु से दृष्ट है। इसप्रकार पत्रिका में हर्ष, सरल व विमल नामक तीन बली विपरीत राजयोगों का निर्माण हो रहा है। परंतु इस पत्रिका में लग्नेश बुध अष्टम भाव में स्थित है तथा सूर्य से अस्त भी है, अर्थात् लग्नेश पीड़ित है, इसलिए पत्रिका में तीन बली विपरीत राजयोग भी अपना प्रभाव देने में असमर्थ होंगे।
उपरोक्त पत्रिका में षष्ठेश शनि द्वादश भाव में वक्री है। चूँकि वक्री ग्रह बलवान होता है, अतः शनि बलवान है। द्वादशेश सूर्य अष्टम भाव में उच्च राशि में दो शुभ ग्रहों के साथ है, अतः सूर्य बली है। लग्न भाव में मंगल शत्रु राशि में राहु केतु अक्ष में है। लग्नेश अष्टम में है। अतः इस पत्रिका में लग्न कमजोर है तथा षष्ठेश व द्वादशेश बली हैं, इसलिए जातक को विपरीत राजयोग का कोई लाभ नहीं मिल पाएगा।
उपरोक्त पत्रिका में अष्टमेश शनि षष्ठम भाव में सूर्य के साथ मंगल की राशि में स्थित है तथा राहु से दृष्ट है। अर्थात् शनि को पीड़ित माना जा सकता है। अतः पत्रिका में विपरीत राजयोग बन रहा है। परंतु शनि नवमेश भी है तथा नवमेश का पीड़ित होना किसी भी दृष्टि से अच्छा नहीं माना जा सकता। अतः भले ही पत्रिका में विपरीत राजयोग बन रहा है लेकिन नवमेश के पीड़ित होने के कारण विपरीत राजयोग का महत्व कम हो गया। अतः विपरीत राजयोग के बनने पर हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि विपरीत राजयोग बनाने वाला पीड़ित ग्रह किसी अच्छे भाव का स्वामी तो नहीं है, क्योंकि ऐसा होने पर विपरीत राजयोग का महत्व नगण्य हो जाता है।
उपरोक्त पत्रिका डॉ. राजेंद्र प्रसाद की है। इसमें अष्टमेश चंद्रमा षष्ठम भाव में स्थित है तथा चंद्रमा के साथ शनि की युति है, साथ ही उसपर सूर्य की दृष्टि भी है। चंद्रमा पर कोई भी शुभ प्रभाव नहीं है। अतः इस पत्रिका में सरल योग का पूर्णतः निर्माण हो रहा है। इसके अतिरिक्त इस पत्रिका में लग्न भाव पर लग्नेश की दृष्टि भी है। इन ग्रह स्थितियों के कारण डॉ. राजेंद्र प्रसाद दो बार भारत के राष्ट्रपति रहे।
बृहद् पाराशर होरा शास्त्र में लिखा है कि यदि तीसरे छठवें या आठवें भाव में नीच का ग्रह स्थित हो तथा लग्नेश लग्न को दृष्ट करता हो तो यह एक बड़े राजयोग का निर्माण करता है। होरा शास्त्र में यह भी लिखा है कि छठवें, आठवें या बारहवें भाव का भावेश यदि नीच का हो या अस्त हो या शत्रु राशि में हो तथा वह लग्न को दृष्ट भी करता हो अथवा लग्नेश लग्न को देखता हो तो यह पत्रिका में एक राजयोग का निर्माण करता है।
उपरोक्त पत्रिका पी. वी. नरसिम्हा राव जी की है, जो भारत के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। इस पत्रिका में अष्टमेश मंगल शत्रु राशि में स्थित है तथा अस्त भी है, साथ ही वह लग्न को दृष्ट भी कर रहा है। लग्नेश बुध स्वराशि का है, अतः लग्न बली है। इसप्रकार पत्रिका में एक बली विपरीत राजयोग का निर्माण हो रहा है।
उपरोक्त पत्रिका महारानी एलिजाबेथ की है। इस पत्रिका में अष्टमेश गुरु नीच राशि में स्थित होकर लग्न को दृष्ट कर रहा है। इसप्रकार पत्रिका में एक बली विपरीत राजयोग का निर्माण हो रहा है।
उपरोक्त पत्रिका श्रीमती इंदिरा गांधी जी की है, जो भारत की प्रधानमंत्री रह चुकी हैं। इस पत्रिका में षष्ठेश गुरु शत्रु राशि में है तथा अष्टमेश शनि भी शत्रु राशि में है तथा लग्नेश चंद्रमा लग्न को दृष्ट कर रहा है। इसप्रकार पत्रिका में एक बली विपरीत राजयोग का निर्माण हो रहा है।
तृतीय, षष्ठम और अष्टम भाव पत्रिका के विपरीत भावों के अंतर्गत आते हैं। इन भावों संबंधित भी बहुत बलशाली विपरीत राजयोगों का निर्माण संभव हो सकता है। यदि तृतीयेश, अष्टम भाव में स्थित हो तो वह लग्न से अष्टम में तथा तृतीय भाव से षष्ठम में होगा। इस स्थिति में अत्यंत बली विपरीत राजयोग का निर्माण होगा। इसीप्रकार यदि षष्ठेश, अष्टम भाव में स्थित हो तो वह लग्न से अष्टम में साथ ही षष्ठम से तृतीय में होगा। इसप्रकार यह भी एक बली विपरीत राजयोग का निर्माण करता है। यदि अष्टमेश तृतीय भाव में स्थित हो तो यह लग्न से तृतीय भाव में तथा स्वयं से अष्टम में स्थित होगा। इस प्रकार यह भी एक बली विपरीत राज्यों का निर्माण करेगा। उपरोक्त स्थितियों में यदि ग्रह पीड़ित भी हो तो बली विपरीत राजयोग अत्यंत बली बन जाता है।
उपरोक्त पत्रिका जाने-माने वैज्ञानिक आइंस्टीन की है। पत्रिका में षष्ठेश मंगल अष्टम भाव में स्थित है। अतः मंगल लग्न से अष्टम में तथा स्वयं से तृतीय में स्थित है। साथ ही वह राहु केतु अक्ष में भी है, अतः पीड़ित भी है। इसप्रकार पत्रिका में एक बली विपरीत राजयोग का निर्माण हो रहा है। हालांकि मंगल, मकर राशि में उच्च का स्थित है, इसलिए प्रारंभ में आइंस्टीन कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा परंतु अंततः विपरीत राजयोग के कारण वे एक प्रसिद्ध महान वैज्ञानिक के रूप में जाने गए।
उपरोक्त पत्रिका प्रसिद्ध अभिनेत्री मर्लिन मुनरो की है। इस पत्रिका में षष्ठेश गुरु, अष्टम भाव में स्थित है। अतः गुरु लग्न से अष्टम में तथा स्वयं से तृतीय में स्थित है। गुरु मंगल के साथ युति में है, अतः पीड़ित भी है। चंद्रमा जो कि लग्नेश है, लग्न को दृष्ट कर रहा है। इस प्रकार पत्रिका में एक बली विपरीत राजयोग का निर्माण हो रहा है।
पत्रिका में बनने वाला विपरीत राजयोग विपरीत परिस्थितियों में अचानक मिलने वाले लाभ की ओर इशारा करता है। यह लेख मैंने गुरुदेव श्री नितिन कश्यप जी तथा गुरुदेव श्री वी पी गोयल जी को नमन करते हुए उनके व्याख्यानों से प्रेरित होकर लिखा है। पत्रिका में कोई भी भाव बहुत बुरा नहीं होता, उदाहरण के लिए पत्रिका का छठवाँ भाग रोग, ऋण, रिपु को बताता है, साथ ही वह जातक के जीवन में आने वाली प्रतियोगिताओं तथा संघर्षों को भी बताता है। आतः यदि किसी पत्रिका में छठवें भाव का स्वामी पीड़ित होकर अष्टम स्थान पर स्थित हो तो वह विपरीत राजयोग तो बनाएगा, लेकिन वह जातक के द्वारा प्रतियोगिताओं में संघर्ष करके विजय होने की क्षमता में कमी भी कर देगा। इस प्रकार विपरीत राजयोगों का विश्लेषण करते समय हमें पत्रिका के सभी पहलुओं को ध्यान में रखना चाहिए।

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