वर्साय संधि 28 जून 1919 को फ्रांस के वर्साय महल में प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी और मित्र राष्ट्रों (Allied Powers) के बीच हस्ताक्षरित हुई थी।
वर्साय की संधि | वर्साय की संधि की शर्तों और प्रभावों का वर्णन
पेरिस शान्ति सम्मेलन में चार माह के अनवरत प्रयास के बाद वर्साय की संधि का प्रारूप तैयार हुआ था । 230 पृष्ठों में छपी हुई यह संधि 15 भागों में विभक्त थी और उसमें 440 धाराएँ थीं । संधि की व्यवस्थाओं का जर्मनी में घोर विरोध किया गया। जर्मन प्रतिनिधियों ने 70 हजार शब्दों की एक लिखित आपत्ति भी दाखिल की लेकिन सम्मेलन के प्रमुखों ने नाममात्र के संशोधन के बाद पुनः युद्ध की धमकी देते हुए संधि पर हस्ताक्षर के लिये दबाब डाला । दबाव में आकर 28 जून 1919 को जर्मन प्रतिनिधियों ने इस पर हस्ताक्षर कर दिये । संधि के प्रथम भाग की 24 धाराओं में राष्ट्र संघ के स्वरूप की व्याख्या की गयी थी । अन्य भागों में जर्मनी की भू-भागीय सीमाओं, उसकी सैन्य एवं आर्थिक व्यवस्थाओं तथा अन्य अनेक यूरोपीय महत्व की समस्याओं को व्यवस्था के संदर्भ में प्रकाश डाला गया था ।इस संधि को अक्सर "डिक्टेट पीस" अर्थात् थोपे गए शांति संधि के नाम से जाना जाता है क्योंकि जर्मनी को इसमें अपनी शर्तों को रखने का कोई अवसर नहीं दिया गया था।
वर्साय संधि (Treaty of Versailles) की प्रमुख व्यवस्थाएँ
संधि की व्यवस्थाएँ जर्मनी के लिए अत्यंत कठोर और अपमानजनक थीं, जिन्होंने न केवल जर्मनी की राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज को गहराई से प्रभावित किया बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध के बीज भी बो दिए। संक्षेप में वर्साय संधि की प्रमुख व्यवस्थायें निम्नलिखित तरह से थीं -
प्रादेशिक व्यवस्थायें
- जर्मनी द्वारा 1871 में फ्रान्स से जीते गये आल्सस लारेन के प्रदेश को पुनः उसे वापस करने पड़े ।
- जर्मनी को मोर्सनेट, यूपेन और मालमेडी का प्रदेश वेल्जियम को देना पड़ा।
- पीसेन तथा पश्चिम प्रशा का बड़ा भाग पोलैण्ड को दिया गया ।
- 13वीं सदी में जर्मनी द्वारा बनाया गया जर्मन बहुल क्षेत्र डेनजिंग स्वतंत्र नगर में परिवर्तित कर राष्ट्रसंघ के संरक्षण में रखा गया। लेकिन प्रत्येक दृष्टि से वह पौलैण्ड के प्रभाव क्षेत्र में रहा क्योंकि समुद्र में पहुँचने के लिये एक रास्ते के साथ डेनजिंग का बन्दरगाह पोलैण्ड के लिये आवश्यक था ।
- मैमेल नामक बाल्टिक तट का बन्दरगाह लिथुआनियाँ को दे दिया गया ।
- ऊपरी साइलेसिया और पूर्वी प्रशा के विषय में जनता की इच्छा जानने के बाद विशेष विभाजन द्वारा आर्थिक संसाधन पोलैण्ड को तथा अधिकांश भू-भाग व जनसंख्या जर्मनी को दिये गये ।
- युद्ध में चूंकि जर्मनी ने उत्तरी फ्रान्स के कोयले के भण्डारों को नष्ट कर दिया था इसलिये जर्मनी की सार घाटी को 15 वर्ष के लिये अन्तर्राष्ट्रीय नियंत्रण में रखना स्वीकार करके फ्रान्स को कोयले के खानों का लाभ उठाने का अधिकार दिया गया। यह भी निश्चित किया गया कि 15 वर्षों पश्चात् जनमत संग्रह की व्यवस्था की जायेगी।
- जर्मनी से विजेताओं ने समस्त उपनिवेश और समुद्र पार के समस्त प्रदेश अपने नियंत्रण में करके बाँट लिये । इस संदर्भ में यह तय किया गया कि उपनिवेशों को तब तक संरक्षण में रखा जायेगा जब तक ये स्वशासन के योग्य न हो जाय । चीन में अनेक महत्वपूर्ण प्रदेश जो जर्मनी के नियंत्रण में थे अब जपान को दे दिये गये । यद्यपि कि चीन ने प्रथम विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों का साथ दिया था । इस प्रकार जापान को क्याओच्याओ और शान्तुंग प्रदेश में भी अधिकार प्राप्त हो गये ।
- जर्मनी को बेल्जियम, पोलैण्ड, चेकोस्लोवाकिया और आस्ट्रिया की स्वतंत्रता एवं सम्प्रभुता को स्वीकार करना पड़ा। 1920 के जनमत संग्रह के आधार पर उत्तरी श्लेसंविग उसे डेनमार्क को देना पड़ा ।
- चीन, थाइलैण्ड, मिश्र, मोरक्को और लिबेरिया में भी जर्मनी को अपने समस्त अधिकारों व हितों को छोड़ना पड़ा ।
- इटली को टाइरोल का प्रदेश दे दिया गया ।
इस प्रादेशिक व्यवस्था से जर्मनी को लगभग 25 हजार वर्ग मील क्षेत्र अर्थात् 118 भू-क्षेत्रों की क्षति उठानी पड़ी ।
सैनिक व्यवस्था
- जर्मनी की सेना 1 लाख निश्चित कर दी गयी । यह भी नियम लागू किया गया कि सैनिक 12 वर्ष के लिये तथा अधिकारी 25 वर्ष के लिये भर्ती किये जायेंगे । सेवा काल समाप्त होने के पूर्व किसी भी कारण से उनमें 5 प्रतिशत से अधिक सेवा मुक्त नहीं किये जायेंगे । अनिवार्य सैनिक सेवा समाप्त कर शिक्षा संस्थाओं एवं अन्य क्लबों तथा संस्थाओं को सैनिक प्रशिक्षण से अलग रहने की व्यवस्था दी गयी।
- जर्मनी पर युद्ध सामग्री के उत्पादन एवं आयात पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया ।
- जर्मनी अपनी नाविक सेना में मात्र 6 लड़ाकू विमान, 12 तोपची जहाज, 12 टारपीडो नावें अपनी सीमा के रक्षार्थ रख सकेगा ।
- जर्मनी की समस्त वायुसेना छीन ली गयी ।
- यह भी निर्णय लिया गया कि जर्मनी राइन लैण्ड के 30 कि. मी. के क्षेत्र में सैनिक नहीं रख सकेगा । जर्मनी के होलिगोलैण्ड और ड्यून के बन्दरगाहों की सैनिक चौकियाँ समाप्त कर दी गयीं ।
- जर्मनी ने सैनिक शर्तों का पालन ठीक से किया है अथवा नहीं इसके मूल्यांकन के लिये मित्र राष्ट्रों के एक कमीशन की व्यवस्था की गयी ।
आर्थिक व्यवस्थायें
- युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों को कितनी क्षति हुई इसके मूल्यांकन के लिये क्षतिपूर्ति आयोग गठित किया गया। किस देश को कितनी क्षति हुई इसको लेकर कई सम्मेलन हुए और डावेस योजना के द्वारा इसका हल निकला ।
- जर्मनी ने क्षतिपूर्ति के लिये फ्रान्स, वेल्जियम, इटली और लक्जेमवर्ग को कोयला देना स्वीकार किया । फ्रान्स को जर्मनी से तारकोल व नौसादर भी क्षतिपूर्ति के रूप में मिली ।
- जर्मनी की बड़ी नदियों एल्व, डैन्यूब, औडर और नीमन का अन्तर्राष्ट्रीयकरण किया गया । कील नहर को भी सभी देशों के लिये खोल दिया गया। राइन नदी को भी एक अन्तर्राष्ट्रीय आयोग के नियंत्रण में रखा गया ।
- जर्मनी को यह निर्देश दिया गया कि वह अपने रेल परिवहन में मित्र राष्ट्रों से बहुत कम किराया लेगा ।
इस प्रकार लगभग 6 अरब 10 करोड़ पौण्ड की राशि क्षतिपूर्ति के रूप में जर्मनी द्वारा मित्र राष्ट्रों को देना तय किया गया।
राजनैतिक व्यवस्थायें
- संधि के प्रथम भाग में 1 से 26 तक की धाराओं में राष्ट्र संघ के व्यवस्था के संदर्भ में बातें लिखी गयीं ताकि भविष्य में यूरोपीय युद्धों द्वारा होने वाले विनाश से बचा जा सके।
- जर्मन सम्राट कैसर विलियम द्वितीय को युद्ध के लिये दोषी ठहराया गया तथा यह निर्णय लिया गया कि कैसर विलियम द्वितीय सहित अन्य युद्ध के लिये जिम्मेदार व्यक्तियों को न्यायिक कार्यवाही के लिये जर्मनी मित्र राष्ट्रों को सौंप देगा ।
वर्सायी संधि का आलोचनात्मक विश्लेषण
दुनियाँ में शान्ति एवं सुरक्षा का वातावरण पैदा करने में असफल रही । इसकी आलोचना में निम्नलिखित मुख्य बातें दिखलायी देती हैं -
- विश्वासघात पर आधारित संधि :- इस संधि की आलोचना में यह कहा गया कि युद्ध विराम के पूर्व घोषित विल्सन के चौदह सिद्धान्तों का पालन न करके जर्मनी के साथ विश्वासघात किया गया है। संधि के आधार विल्सन के चौदह सिद्धान्तों के अनुसार सभी देशों के साथ समान व्यवहार करते हुए आत्म निर्णय के सिद्धान्त का ध्यान रखना था । संधि में एक ओर सैनिक, आर्थिक एवं प्रादेशिक व्यवस्था देते समय जहाँ जर्मनी के साथ पक्षपात पूर्ण व्यवहार किया गया वहीं प्रादेशिक व्यवस्था में प्रदेशों को एक जगह से हटाकर दूसरे में जोड़ने में आत्म निर्णय की घोषणा का ध्यान नहीं रखा गया। जर्मन प्रतिनिधियों का कहना था कि- "यह वह न्यायोचित संधि नहीं है, जिसका हमको वचन दिया गया । न्यायोचित एवं स्थायी संधि के लिये जो आधार मंजूर किये गये थे उसके यह एक दम विरुद्ध है।"
- थोपी गयी या आरोपित संधि (Dictated Peace) :- संधि में दोनों पक्षों के लोग आपस में विचार-विनिमय द्वारा कुछ बिन्दु तय करते हैं परन्तु वर्साय की संधि में पराजित राष्ट्रों को निमंत्रित ही नहीं किया गया । संधि का प्रारूप तय हो जाने के बाद पराजित पक्ष को उस पर हस्ताक्षर करने को कहा गया । इसलिये प्रो. ई. एच. कार (E. H. carr.) ने भी लिखा है कि "यह विजेताओं द्वारा विजितों पर लादी गयी थी तथा आदान-प्रदान की प्रक्रिया के आधार पर परस्पर बातचीत द्वारा तय नहीं हुई थी ।" संधि के प्रारूप पर लिखित विचार देने का एक ही अवसर जर्मनी को दिया गया । पुनः थोड़े से संशोधन के बाद संधि प्रारूप इस धमकी के साथ सौंपा गया था कि यदि 5 दिन के अन्दर हस्ताक्षर नहीं किये गये तो पुनः युद्ध प्रारम्भ कर दिया जायेगा । इस प्रकार जर्मन प्रतिनिधियों को संधि पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिये धमकी से भरे आदेश दिये गये । लायड जार्ज ने कहा था - "भद्र पुरुषो, आपको संधि पत्र पर हस्ताक्षर करने ही पड़ेंगे। यदि वर्साय में संधि पर हस्ताक्षर नहीं करेगें तो बर्लिन में निश्चित रूप से हस्ताक्षर करने होंगे ।" निश्चित तौर पर मित्र राष्ट्रों की सेना अभी बर्लिन में जमी हुई थी । भयवश इस आरोपित संधि पर अनिच्छा एवं अपमान पूर्वक जर्मन प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर कर दिये । वर्साय की इस संधि के सम्बन्ध में प्रो. इ. एच. कार ने लिखा है कि- “वैसे तो युद्ध समाप्त करने वाली लगभग प्रत्येक संधि एक सीमा तक आरोपित शान्ति स्थापित करने वाली संधि होती है क्योंकि एक पराजित राज्य अपनी पराजय के परिणामों को कभी स्वेच्छा से स्वीकार नहीं करता । किन्तु वर्साय की संधि में आरोपण की मात्रा आधुनिक युग की किसी भी पिछली शान्ति संधि की अपेक्षा अधिक स्पष्ट थी।"
- कठोर संधि :- वर्साय की संधि एक कठोर संधि के रूप में जर्मनी को भविष्य में सबक देने के उद्देश्य से की गयी लगती है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री लायड जार्ज के कथनों से यह साफ-साफ झलकता है । उन्होंने कहा था कि - "इस संधि की धाराएँ युद्ध में मृत शहीदों के खून से लिखी गयी हैं। जिन लोगों ने इस युद्ध को शुरू किया था उन्हें दुबारा ऐसा न करने की शिक्षा अवश्य देनी है।" इस संधि से जर्मनी को 25 हजार वर्गमील भूमि और लगभग 70 हजार निवासियों से हाथ धोना पड़ा। 6 अरब 10 करोड़ पौण्ड की धनराशि युद्ध क्षतिपूर्ति के रूप में जर्मनी से लेने की शर्त रखी गयी। संधि में जर्मनी के कम कर उसे कमजोर किया गया । इसको आर्थिक रूप से कुचल डाला गया। इसके साथ भू-भाग को ही मित्र राष्ट्रों के मुकाबले उसके सैन्य शक्ति को कम करके उसे अपमानित भी किया गया । जर्मनी को राष्ट्र संघ का सदस्य भी नहीं बनाया गया। संधि की कठोरता को देखने से लगता था कि जर्मनी के साथ गुलाम देश की तरह व्यवहार किया जा रहा था। जर्मन चान्सलर बेथमेन हालवेग का कथन भी था कि "दुनियाँ ने पराजित देशों को गुलाम बनाने का इससे भयंकर यंत्र कभी नहीं देखा है ।"
- दोषपूर्ण प्रादेशिक एवं एक पक्षीय निरस्त्रीकरण व्यवस्था सिद्धान्त को जर्मनी के लिये नहीं माना गया बल्कि इसका प्रयोग मित्र राष्ट्रों के हित में किया आत्म निर्णय के गया । जर्मन बहुल क्षेत्रों को गैर जर्मन जाति वाले देशों के साथ जोड़ा गया। जर्मन उपनिवेशों को स्वतंत्रता की दिशा में अग्रसर करने के लिये उन्हें राष्ट्र संघ के संरक्षण में रखने के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया । परन्तु वास्तविकता यह रही कि उन्हें जर्मनी से मुक्त कर मित्र राष्ट्रों के अधीन कर दिया गया। सिद्धान्तत इस पर राष्ट्रसंघ का संरक्षण दिया गया पर वस्तुतः ये विभिन्न साम्राज्यवादी मित्र राष्ट्रों के अधीन रखे गये । निशस्त्रीकरण का सिद्धान्त भी केवल जर्मनी पर लादा गया । मित्र राष्ट्रों को उससे मुक्त रखा गया ।
- द्वितीय विश्व युद्ध के लिये उत्तरदायी - वर्साय संधि स्वयं में ही विनाश के बीज संजोये हुई थी । फ्रान्सीसी मार्शल फाँच ने 1919 में ही कह दिया था कि - "यह संधि नहीं बल्कि 20 वर्षों के लिये युद्ध स्थगन मात्र है।” ठीक बीस वर्ष बाद द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया । फॉच की यह कोई भविष्यवाणी नहीं थी बल्कि स्थितियों की समझ रखने वाले एक दूरदर्शी राजनीतिज्ञ एवं सैन्यविद् का विश्लेषण था ।
संधि वार्ता में जर्मन प्रतिनिधियों को भाग नहीं लेने दिया गया । उनके लिखित संशोधन को भी नाम मात्र का महत्व दिया गया। संधि पत्र पर उन्हें जबरदस्ती हस्ताक्षर करने को मजबूर किया गया। ऐसी अपमानजनक संधि का उलंघन और उसे नकारना जर्मनी जैसे स्वाभिमानी देश के लिये राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया । जर्मनी को जैसे-जैसे मौका मिलता गया वैसे-वैसे संधि की शर्तों का वह उलंघन करता गया। बदलती परिस्थिति में हिटलर वर्साय संधि को फाड़कर महत्वहीन बना देने के आस्वासन के कारण ही जर्मनी की सत्ता में आया । हिटलर के नेतृत्व में जर्मनी ने वर्साय की संधि के कलंक को धोने का प्रयत्न किया लेकिन यह प्रयास इतना भयंकर निकला कि 20 वर्ष पश्चात् ही संसार द्वितीय विश्व युद्ध के चपेट में आ गया। इस प्रकार वर्साय की संधि से जिस शान्ति की अपेक्षा की गयी थी यह प्राप्त न हो सकी । इसीलिये वर्साय संधि को शांति का अन्त करने वाली शांति (Peace ends Peace) भी कहा जाता है ।
वर्साय संधि का औचित्य
वर्साय संधि के समय मित्र राष्ट्रों का जनमत जर्मनी के विरुद्ध था। अतः मित्र राष्ट्रों के प्रतिनिधियों को अपने जनमत का भी ख्याल रखना था । इस संधि के कठोरता के पीछे जनमत के अलावा विभिन्न राष्ट्रों की आपसी संधि एवं स्वार्थ भी थे । फिर भी इस संधि के द्वारा कम से कम योरोप के लोगों को जो युद्ध से परेशान थे मुक्ति मिली । चेकोस्लोवाकिया, यूगोस्लाविया, पोलैण्ड, लातविया, लिथुआनिया और एस्टोनियाँ की स्थापना पेरिस की एक बड़ी सफलता थी।
संधि द्वारा सभी को खुश करना था और साथ ही न्यायपूर्ण व्यवस्था का निर्माण भी करना था । निश्चय ही यह एक कठिन कार्य था और शान्ति सम्मेलन के आयोजकों को इसमें पूरी तरह सफलता नहीं मिली । संधि के औचित्य के प्रश्न पर लायड जार्ज ने ब्रिटिश संसद में उद्गार व्यक्त करते हुए कहा था कि - 'प्रस्तावित संधि को जर्मनी के साथ किसी प्रकार का अन्याय नहीं कहा जा सकता । कुछ शर्ते अवश्य भयानक जँचती हैं। परन्तु यदि जर्मनी कहीं जीत जाता तो इससे भी भयावह परिणामों का आज हमें सामना करना पड़ता ।"


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