विस्मृतियों का भूगोल साँस तो चलती है, पर जीना भूल जाते हैं। साथ चलते हैं कदम, पर साथ देना भूल जाते हैं। जो निकले थे कभी इस भीड़ का नेतृत्व करने, अक्स
विस्मृतियों का भूगोल
साँस तो चलती है,
पर जीना भूल जाते हैं।
साथ चलते हैं कदम,
पर साथ देना भूल जाते हैं।
जो निकले थे कभी
इस भीड़ का नेतृत्व करने,
अक्सर उसी अनजानी भीड़ में
खो जाते हैं—
हाँ, लोग अक्सर भूल जाते हैं।
भुला दिए हैं मनुष्यों ने—
होली के वे चंचल रंग,
फागुन की वह अल्हड़ उमंग,
और रक्तिम-हरित संबंधों का
वह जीवंत प्रसंग।
तभी तो अब
दीपावली के माटी के दीए
तिमिर से लड़ने के बजाय
बुझने को फड़फड़ाते हैं,
क्योंकि लोग अक्सर भूल जाते हैं।
भोर के सूर्य की
वह पहली निश्छल किरण,
और निरुद्देश्य हँसी-मज़ाक के
वे बीते क्षण।
मुट्ठी भर शोहरत ने
ऐसे निगला है घर का आँगन
कि गुड्डे-गुड़ियों के ब्याह भी
अब वहाँ शोर नहीं मचाते,
क्योंकि लोग अक्सर भूल जाते हैं।
लोग भूल चुके हैं
इतिहास का वह फैला हुआ हाथ,
जब द्वारकाधीश ने
थामा था सुदामा का साथ।
आज हर पवित्र संबंध की नींव पर,
वे दंभ के खोखले महल बनाते हैं,
क्योंकि लोग अक्सर भूल जाते हैं।
और फिर—
एक दिन वे लौटते हैं,
मसान में किसी देह को
अग्नि के सुपुर्द कर,
अस्थियों को मौन जल में
विसर्जित कर आते हैं।
गंगा के जल से
वे केवल देह के पाप धोते हैं,
पर समय का वह अदृश्य चक्र
फिर भी भूल जाते हैं—
क्योंकि, ‘नेहा’,
लोग अक्सर भूल जाते हैं।
शेष ही शाश्वत है
न आना तुम्हारा चयन था
न जाना।
कोई चला जाता है ऐसे
जैसे
सूरज के छूते ही
ओस अपने होने से
मुक्त हो जाए।
घाट पर
देह
पंचतत्वों को
लौटा दी जाती है।
अग्नि को अग्नि,
जल को जल।
कुछ भी
अपना नहीं रहता।
पर जड़ें
अदृश्य जल से रस खींचती हैं,
फिर अंकुरित होती हैं
नए पत्तों, नए फूलों,
नए जीवन की छाया में।
बीज
मृत्तिका में गिरते हैं
बिना पूछे
जड़ें गहरी हों या उन्नत,
उगना और लौटना
एक ही अटल लय है।
तुम आए
रिक्त
गए भी
उसी रिक्तता में
बीच में
अर्थ, स्मृति, संबंध
कुछ देर
रुक गए।
मनोरथ, स्मृति, छाया
सिर्फ़ यह बताती है
कि जीवन
किसी का नहीं।
समय
किसी के लिए
गति नहीं बदलता,
बस जाते को देखकर
क्षण भर
अपने ही मौन में
ठहर जाता है。
जन्म और मृत्यु
विरोध नहीं,
एक ही सत्य की
दो अवस्थाएँ हैं।
जो आया
उसे जाना ही था
यह अनिवार्यता नहीं,
यह अस्तित्व की
मूल भाषा है।
जीवन
इस भाषा को
समझ लेने का
क्षण मात्र।
जन्म
कोई इच्छा नहीं,
मृत्यु
कोई विफलता नहीं
दोनों
प्रकृति की
सनातन लय के
अपरिहार्य चरण हैं।
अधूरे वाक्य
मृत्यु
अब खबर है।
शोक—
क्षण भर।
कल
किसी ने कहा था—
“लौटूँगा।”
किसी ने
रोटी की आँच धीमी कर दी थी,
किसी ने
दीप की लौ बचाकर रखी थी।
वह लौटा—
पर
उसके साथ
कोई आवाज़ नहीं आई।
पुलवामा—
सड़क उस दिन भी
वैसी ही थी,
पर
धूल के भीतर
एक तीखी गंध बस गई—
जैसे समय ने
अपनी ही साँस रोक ली हो।
एक ही क्षण में
कई घरों की धड़कनें
एक साथ
अधूरी रह गईं।
तिरंगा लौटता है,
पर
जिसे बाँहों में भरना था,
वह
हवा में ही कहीं छूट गया।
अहमदाबाद—
आकाश
अपनी नीली निश्चिंतता में था,
और उसी नीले में
अचानक
एक काला विराम उभरा—
जैसे
चलती हुई पंक्ति पर
स्याही गिर पड़ी हो।
क्षण भर के भीतर
लाल और पीली रेखाएँ
हवा में काँपीं—
जैसे जीवन
आख़िरी बार
अपनी उपस्थिति लिख रहा हो।
वह सफ़र—
जो अभी शुरू ही हुआ था,
समय की घड़ी पर
पूरा ठहर भी न पाया,
और
एक अधूरी दिशा बनकर
रुक गया।
अब
कुछ वाक्य
हवा में अटके हैं—
और कुछ दरवाज़े
आज भी खुलते हैं,
पर
अंदर
सिर्फ़ सन्नाटा प्रवेश करता है।
बरगी—
पानी
शांत था,
इतना शांत
कि उसमें
डूबती हुई आवाज़ भी
सुनाई नहीं देती।
एक माँ का हाथ,
एक बच्चे की उँगली—
बस
एक क्षण का अंतर—
और फिर
दोनों
एक-दूसरे की पहुँच से बाहर।
पानी
सब कुछ अपने भीतर रख लेता है,
पर
माएँ
खाली हाथ रह जाती हैं।
यूक्रेन—
बचपन
अब खेल नहीं जानता,
वह
आवाज़ों के बीच
जीना सीखता है।
रूस—
आग गिरती है,
और घर
स्मृतियों समेत
ढहते हैं।
गाज़ा—
सुबह
यहाँ उगती नहीं,
उसे
पत्थरों के नीचे से
निकालना पड़ता है।
एक बच्चा
खड़ा है
अपनी ही जगह पर,
और पूछता है—
“मेरा घर…?”
माँ
उसे देखती है—
पर
उसके पास
अब कोई उत्तर नहीं है।
इज़रायल—
मृत्यु
हर दिन
एक संख्या बनती है—
और संख्या
धीरे-धीरे
चेहरों को मिटा देती है।
हम—
सब देखते हुए भी
अपने दिनों को
सामान्य कहते हैं।
दूसरों के शोक को
समाचार मानते हैं,
और
धीरे-धीरे
अपने भीतर
एक जगह खाली कर देते हैं—
जहाँ कभी
संवेदना हुआ करती थी।
मनुष्य
पहले
भीतर से मरता है।
बाक़ी
बस
घोषणा होती है।
इससे पहले कि—
बात
कहीं रुक जाए,
और
शब्द
कहने से पहले ही
थक जाएँ—
याद रखना,
अंततः
जीवन
पूरा नहीं होता—
वह
छूट जाता है
अधूरे वाक्यों में।
दिल्ली सरकार में हिंदी शिक्षिका डॉ. नेहा गौड़ की साहित्य और सृजन में गहरी पैठ है। आप सामाजिक संवेदनाओं और समसामयिक विषयों पर मुखरता से लेखन करती हैं।
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