जलियांवाला बाग हत्याकांड का कारण और प्रभाव | Jallianwala Bagh Massacre

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जलियांवाला बाग हत्याकांड का कारण और प्रभाव Jallianwala Bagh Massacre 12 अप्रैल सन् 1919 ई0 को जनरल डायर की एक घोषणा के द्वारा अमृतसर में सभा करने और ज

जलियांवाला बाग हत्याकांड का कारण और प्रभाव | Jallianwala Bagh Massacre


प्रथम विश्व युद्ध में भारत ने ब्रिटिश सरकार की हर तरह से मदद की।भारतीयों को उस समय मंहगाई, कम मजदूरी, अन्नाभाव, प्लेग और इनफ्लुएंजा का प्रकोप आदि तरह- तरह की कठिनाइयाँ सहन करनी पड़ रही थीं। 'डिफेन्स आफ इण्डिया रूल्स' के कारण उनकी वैयक्तिक स्वतंत्रता समीति हो गयी थी। युद्ध के समय ब्रिटिश अफसरों द्वार रंगरूटों की भर्ती और युद्ध के लिए धन एकत्र करने में भारतीयों के साथ बड़ी सख्ती का व्यवहार किया गया। युद्ध के उपरान्त भारत मंत्री मि0 माण्टेग्यू द्वारा भारत के लिए सुधार की घोषणा की गयी । इससे देश का कोई भी वर्ग संतुष्ट न हुआ ।
 
जलियांवाला बाग हत्याकांड का कारण और प्रभाव | Jallianwala Bagh Massacre
जब भारत इस प्रकार की मानसिक दशा से गुजर रहा था उसी समय ब्रिटिश सरकार ने कुख्यात 'रौलट ऐक्ट' पास किया । इस ऐक्ट के द्वारा सरकार को समाचार पत्रों का नियंत्रण करने, राजनीतिक बन्दियों को केवल सन्देह पर गिरफ्तार करने और उन्हें अनिश्चित काल तक बिना मुकदमा चलाये जेल में रखने का कानूनी अधिकार प्राप्त हो गया । सारा देश इस ऐक्ट के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ। गांधीजी ने 6 अप्रैल सन् 1919 को इस ऐक्ट के विरोध में देश भर में हड़ताल करने की आज्ञा दी 16 अप्रैल को अमृसर में भी हड़ताल हुई 19 अप्रैल को पंजाब की अंग्रेजी सरकार ने पंजाब के प्रमुख नेता डा0 सत्यपाल और डा0 किचलू को गिरफतार कर लिया । गिरफ्तारी की खबर पाकर अमृतसर में लोगों ने हड़ताल कर दी और नेताओं की रिहाई की माँग के लिए एक जुलूस निकाला। पुलिस द्वारा जुलूस रोक लिया गया और उस पर गोली चली । दो व्यक्ति गोली से मारे गये और अनेक घायल हुए। जनता ने दोनों शहीदों की लाशें कंधे पर उठा लीं और सारे शहर में चक्कर लगाया । क्रुद्ध होकर जनंता ने मार्ग में पड़ने वाली इमारतों को जला दिया और गोदामों का लूट लिया। यूरोपीय लोगों पर भी जनता ने आक्रमण किया । 5 यूरोपियनों के प्राण गये और अनेक इमारतें भस्म कर दीं गयीं । 10 अप्रैल सन् 1919 ई0 को अमृतसर फौजी कानून (Martial law) लागू कर दिया गया ।

जालियाँवाला बाग का हत्याकांड
12 अप्रैल सन् 1919 ई0 को जनरल डायर की एक घोषणा के द्वारा अमृतसर में सभा करने और जुलूस निकालने पर रोक लगा दी किन्तु यह घोषणा सब जगह प्रसारित नहीं हुई। इस घोषणा से अनजान लोगों ने 12 अप्रैल की शाम को ही लोगों को सूचना दी की 13 अप्रैल को साढ़े चार बजे पुलिस द्वारा गोली चलाये जाने का विरोध करने के लिए जालियाँवाला बाग में एक सार्वजनिक सभा होगी । जनरल डायर अथवा अन्य अधिकारियों द्वारा सभा की मनाही करने अथवा सभा को रोकने का कोई कदम नहीं उठाया गया । इससे साफ जाहिर है कि अधिकारियों की नियत साफ नहीं थी । ठीक समय पर सभा आरम्भ हुई ।
 
सभा में 20 हजार स्त्री-पुरुषों के सामने लाला हंसराज भाषण कर रहे थे। उसी समय जनरल डायर 100 भारतीय और 50 गोरे सिपाहियों को लेकर सभा स्थल पर पहुंचा और बिना चेतावनी दिय हुए गोली चलाने का हुक्म दिया । 100 गज की दूरी से 50 मशीनगनों द्वारा 1650 राउण्ड गोलियाँ अन्धाधुंध चलायी गयी। गोली वर्षण तब बन्द हुआ जब सारे कारतूस खत्म हो गये। घायल मनुष्य रात भर वहीं कराहते हुए पड़े रहे । वहाँ दवा दारू की कौन कहे, उन्हें एक घूँट पानी तक नसीब नहीं हुआ । सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 389 मनुष्य मारे गये और 1200 मनुष्य घायल हुए किन्तु हंटर कमिटी के सम्मुख लाला गिरधारी लाल द्वारा दिये गये बयान के मुताबिक मृतकों की संख्या एक हजार से अधिक थी और घायलों की संख्या इससे बहुत अधिक थी ।
 
जलियाँवाला बाग के हत्याकांड का समाचार सुनकर देश अवाक् हो गया । कांग्रेस ने अपनी एक जाँच-समिति बैठायी जिसके सदस्य पं. मोतीलाल नेहरु, चित्तरंजन दास, जयकर, तैयव जी और गाँधी जी थे । इस जाँच समिति की राय में जनरल डायर ने जानबूझकर हिंसा को प्रोत्साहित किया ताकि उसे जनता को सबक सिखाने का बहाना मिले. इस हत्याकांड के विरोध में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी नाइटहुड की उपाधि वापस कर दी। जब देश के प्रमुख नेताओं ने इस कांड की भर्त्सना आरम्भ की तब विवश होकर सरकार ने इस मामले की जाँच के लिए हण्टर कमिटी की नियुक्ति की जिसने मार्च सन् 1920 ई. में अपनी रिपोर्ट दी किन्तु रिपोर्ट प्रकाशित होने के पूर्व ही सरकार ने 'क्षमा कानून' पास कर इस कांड से सम्बन्धित सभी व्यक्तियों को क्षमा कर दिया था। डायर के इंगलैण्ड लौटने पर ब्रिटिश सरकार ने उसे तलवार तथा 200 पौण्ड का इनाम देकर सम्मानित किया।

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