हिन्दी साहित्य का इतिहास दर्शन

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हिन्दी साहित्य का इतिहास दर्शन हिन्दी साहित्य का इतिहास दर्शन हमें सिखाता है कि साहित्य 'मानव-मूल्यों' की विकास यात्रा है।

हिन्दी साहित्य का इतिहास दर्शन


हिन्दी साहित्य के इतिहास दर्शन की मूल अवधारणा को स्पष्ट करते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने 'हिन्दी साहित्य के इतिहास' में लिखा है- "जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्तियों का संचित प्रतिबिम्ब होता है तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति परिवर्तन के साथ- साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चलता है. आदि से अन्त तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परम्परा को परखते हुए साहित्य परम्परा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना ही साहित्य का इतिहास है."
 
हिन्दी साहित्य का इतिहास दर्शन
साहित्येतिहास में 'जनता की चित्तवृत्तियाँ' ही साहित्य की विभिन्न प्रवृत्तियों के रूप में व्यक्त होती हैं. फ्रांसीसी विद्वान् तेन ने साहित्य की विभिन्न प्रवृत्तियों के मूल में जाति, वातावरण और क्षण विशेष तत्वों को सक्रिय मानते हुए स्पष्ट किया कि “किसी भी साहित्य के इतिहास को समझने के लिए उससे सम्बन्धित जातीय परम्पराओं, राष्ट्रीय और सामाजिक वातावरण एवं सामयिक परिस्थितियों का अध्ययन-विश्लेषण आवश्यक है."
 
वास्तव में हिन्दी साहित्य लेखन की अब तक परम्परा का यदि अध्ययन किया जाए तो हिन्दी साहित्येतिहास लेखन में अनेक दार्शनिक अवधारणाओं का पता चलता है. कहीं जातीय परम्परा का दृष्टिकोण प्रधान है तो कहीं द्वन्द्वात्मक भौतिक विकासवाद का प्रभाव है. मनोविज्ञान, मनोविश्लेषण और अर्थ-विज्ञान के आधार पर भी हिन्दी साहित्य के इतिहास की रचना हुई है. वर्ग संघर्ष और आर्थिक विकास की परिस्थितियों को केन्द्र में रखकर भी साहित्येतिहास लिखे गए हैं. युग चेतना का सिद्धान्त भी साहित्येतिहासकारों ने अपनाया है.

समग्रतः समय के साथ-साथ साहित्येतिहास के दर्शन में भी परिवर्तन होता रहा है, किन्तु कुछ मूल तत्व ऐसे हैं जो परिवर्तित नहीं होते. डॉ. नगेन्द्र ने साहित्य की विकास प्रक्रिया के अध्ययन के लिए इन्हीं पाँच तत्वों को विचारणीय माना है-
  • सर्जन शक्ति (साहित्यकार की प्रतिभा व उसका व्यक्तित्व), 
  • परम्परा (साहित्यिक व सांस्कृतिक परम्पराएं), 
  • वातावरण, 
  • द्वन्द्व, 
  • सन्तुलन.
यदि “ जनता की चित्तवृत्ति के साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है" तो साहित्येतिहास दर्शन की अवधारणाएं भी युगीन चेतना के प्रभावों से बदलती रहनी स्वाभाविक हैं. डॉ. बच्चन सिंह के शब्दों में, “जब रचनात्मक साहित्य पुराने पैटर्न को तोड़कर नया बनता है तो साहित्य के इतिहास (लेखन) पर वह क्यों न लागू हो. नया पैटर्न बनाना खतरे से खाली नहीं है. नया इतिहास लिखने के लिए यह खतरा उठाना ही होगा. नए सन्दर्भ में यदि पिष्टपेषण नहीं करना है, तो नया इतिहास ही लिखा जाएगा.” (हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास' की भूमिका से).

क्या साहित्येतिहास और साहित्यालोचन समान हैं ?

अनेक कारणों से साहित्येतिहास और साहित्यालोचन की सीमाएं घुल-मिल गई हैं, जिससे दोनों विधाएं एक-सी लगती हैं, किन्तु दोनों में मूलतः अन्तर है. डॉ. नगेन्द्र के शब्दों में, " इतिहास का लक्ष्य सदा अतीत की व्याख्या करते हुए विवेच्य वस्तु के विकास क्रम को स्पष्ट करना होता है, जबकि आलोचना का लक्ष्य वस्तु के गुण-दोषों को विश्लेषण करते हुए उसका मूल्य निर्धारित करना होता है. इतिहासकार भी कृति के गुण-दोषों पर विचार कर सकता है, किन्तु वहाँ भी उसका लक्ष्य उन्हें युगीन प्रवृत्तियों के सन्दर्भ में देखने का रहता है; स्वतन्त्र रूप से मूल्यांकन का नहीं.”

हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की पद्धतियां

हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की पद्धतियां निम्नलिखित तीन रूपों में हैं- 
  1. कविवृत्त संग्रहों के रूप में - आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' की भूमिका वक्तव्य में जॉर्ज ग्रियर्सन, शिवसिंह सरोज तथा मिश्र बन्धुओं के इतिहास ग्रन्थ को 'कविवृत्त संग्रह' कहा है, क्योंकि उसमें कवियों के जीवनवृत्त और उनकी रचनाओं का वर्णन मात्र है. काल- विभाजन, नामकरण, काव्य प्रवृत्ति के विवेचन का अभाव है. काल-विभाजन - नामकरण यदि हैं भी तो वे निराधार और औचित्यहीन हैं.वस्तुतः कविवृत्त संग्रह की परम्परा नाभादास के ''भक्तमाल' से प्रारम्भ होती है. 'दो सौ वैष्णव की वार्ता' और 'चौरासी वैष्णव की वार्ता' इस परम्परा के उल्लेखनीय ग्रन्थ हैं. 19वीं शताब्दी में गार्सा द तासी का 'इस्त्वार द ला लितरेत्युर ऐन्दुई ऐन्दुस्तानी', शिवसिंह सेंगर का शिवसिंह सरोज', जॉर्ज ग्रियर्सन का 'द मार्डन वर्नाकुलर लिटरेचर ऑफ हिन्दुस्तान' तथा मिश्रबन्धुओं का 'मिश्रबन्धु विनोद' कविवृत्त वर्णन पद्धति के इतिहास ग्रन्थ हैं.
  2. साहित्येतिहास के रूप में - साहित्येतिहास लेखन में विशुद्ध रूप से इतिहास बोध और इतिहास दृष्टि का संकेत सर्वप्रथम रामचन्द्र शुक्ल के इतिहास ग्रन्थ में मिलता है. इस पद्धति को अपनाते हुए अनेक विद्वानों ने स्वतन्त्र रूप से हिन्दी साहित्येतिहास ग्रन्थों की रचना की जिनमें आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. रामकुमार वर्मा, डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त, डॉ. बच्चन सिंह के इतिहास ग्रन्थ उल्लेखनीय हैं.
  3. सम्पादन के रूप में - साहित्येतिहास लेखन की इस पद्धति में इतिहास लेखन का कार्य किसी एक लेखक के द्वारा न होकर कई लेखकों के द्वारा समूह रूप में होता है. प्रत्येक लेखक किसी काल विशेष के साहित्य का इतिहास लेखन करता है. इस पद्धति का उपयोग लेखक विशेष द्वारा व्यक्तिगत रूप से और संस्थाओं के द्वारा भी किया गया है. डॉ. नगेन्द्र द्वारा सम्पादित 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' इस पद्धति का आदर्श इतिहास ग्रन्थ कहा जा सकता है. इसी प्रकार 'नागरी प्रचारिणी सभा' काशी और 'भारतीय हिन्दी परिषद्' इलाहाबाद द्वारा कई खण्डों में इतिहास ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं.
  4. कालखण्ड विशेष के रूप में- आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल - हिन्दी साहित्य के ये चार मुख्य काल हैं. इसमें किसी एक कालखण्ड के साहित्य को आधार बनाकर भी अच्छे इतिहास ग्रन्थ सामने आए हैं; जैसे- हिन्दी साहित्य का आदिकाल - हजारीप्रसाद द्विवेदी हिन्दी रीति साहित्य - भगीरथ मिश्र भारतीय प्रेमाख्यान परम्परा -परशुराम चतुर्वेदी हिन्दी के सूफी प्रेमाख्यान - परशुराम चतुर्वेदी हिन्दी काव्य में छायावाद - दीनानाथ शरण हिन्दी काव्य में निर्गुण सम्प्रदाय - पीताम्बर दत्त बड़त्थवाल 
  5. विधागत इतिहास लेखन - हिन्दी साहित्य की किसी एक विधा को केन्द्र में रखकर भी इतिहास लेखन की परम्परा रही है, जिसके परिणामस्वरूप बहुत ही स्तरीय और खोजपूर्ण जानकारी वाले ग्रन्थ लिखे गए. कुछ प्रमुख उदाहरण देखे जा सकते हैं- हिन्दी गद्य साहित्य - रामचन्द्र तिवारी हिन्दी नाटक उद्भव और विकास - दशरथ ओझा हिन्दी एकांकी उद्भव और विकास - रामचरण महेन्द्र हिन्दी उपन्यास का इतिहास - गोपालराय हिन्दी निबन्ध का विकास - ओंकारनाथ शर्मा गीति काव्य का विकास - लालधर त्रिपाठी
  6. प्रवृत्तिगत इतिहास लेखन - इस प्रकार के इतिहास ग्रन्थों में इतिहास दृष्टि के साथ ही प्रवृत्तिगत समालोचना दृष्टि का भी समन्वय मिलता है. प्रवृत्तिगत इतिहास लेखन शोध प्रबन्धों के रूप में और स्वतन्त्र लेखन के रूप में भी हुआ है. मुख्य रचनाओं के उदाहरण इस प्रकार हैं- भक्ति साहित्य में मधुरोपासना - परशुराम चतुर्वेदी रामभक्ति में रसिक सम्प्रदाय - भगवती प्रसाद सिंह आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ - जयकिशन प्रसाद हिन्दी काव्य में हास्य रस- बरसाने लाल चतुर्वेदी आधुनिक हिन्दी काव्य की मुख्य प्रवृत्तियाँ - डॉ. नगेन्द्र हिन्दी काव्य संवेदना का विकास - रामस्वरूप चतुर्वेदी
  7. तुलनात्मक पद्धति से इतिहास लेखन - दो कालों अथवा दो भाषाओं के साहित्य को केन्द्र में रखकर तुलनात्मक पद्धति से इतिहास लेखन भी हुआ है. कुछ प्रमुख ग्रन्थ देखें- हिन्दी और कन्नड़ में भक्ति आन्दोलन - डॉ. हिरण्मय हिन्दी और मराठी के संत कवि - डॉ. प्रभाकर माचवे हिन्दी और मराठी के वैष्णव कवि - ना. चि. जोगेलकर इस पद्धति पर इतिहास लेखन प्रायः शोध प्रबन्धों के रूप में हुआ है.
इस प्रकार हिन्दी साहित्य का इतिहास दर्शन हमें सिखाता है कि साहित्य 'मानव-मूल्यों' की विकास यात्रा है। आज का इतिहास लेखन केवल राजाओं या कवियों का विवरण नहीं है, बल्कि यह दलित, स्त्री और आदिवासी विमर्श जैसे उपेक्षित वर्गों की आवाज़ को भी स्थान दे रहा है। डॉ. नामवर सिंह के शब्दों में कहें तो, इतिहास की व्याख्या का अर्थ है—परंपरा का पुनर्मूल्यांकन।

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