नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था | The Continental System of Napoleon

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नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था The Continental System of Napoleon नेपोलियन द्वारा लागू किये गये महाद्वीपीय व्यवस्था का उद्देश्य दूसरे देशो से व्यापार

नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था | The Continental System of Napoleon


नेपोलियन द्वारा लागू किये गये महाद्वीपीय व्यवस्था का उद्देश्य दूसरे देशो से व्यापारिक सम्बन्धों को समाप्त करके इग्लैण्ड की अर्थ व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करना था । नेपोलियन ने अपनी महाद्वीपीय व्यवस्था के अन्तर्गत इग्लैण्ड के विरुद्ध एक प्रकार से आर्थिक युद्ध शुरू किया। इस व्यवस्था का उद्देश्य था कि कोई भी देश ब्रिटेन के माल का आयात न करे। यूरोपीय देश ब्रिटेन के लिए अपने बन्दरगाहों को बन्द कर दें । नेपोलियन का इग्लैण्ड से यह व्यापारिक युद्ध निम्नलिखित दृष्टिकोण का फल था - 
  1. नेपोलियन का यह दृढ़ विश्वास था कि इग्लैण्ड की समृद्धि उसके व्यापार पर टिकी हुई और महाद्वीपीय राज्यों में उसके माल को न पहुँचने देने का अर्थ होगा इग्लैण्ड को गरीब बनाकर जीर्ण-शीर्ण कर देना । 
  2. नेपोलियन महाद्वीपीय राज्यों को व्यापारिक शोषण से छुटकारा दिलाकर स्वयम् उनकी प्रंशसा का पात्र बनना चाहता था । वह उनका नेतृत्व करने का इच्छुक था। सीले ने भी इस विचार की पुष्टि की है । 
  3. नेपोलियन का विचार था कि इग्लैण्ड दुकानदारों का देश है। ब्रिटिश व्यापार के बहिष्कार के कारण यहाँ बेकारी एवं भूखमरी फैल जायेगी । जनता के दबाव में इग्लैण्ड फ्रांस के समाने झुकने को मजबूर हो जायेगा । इस प्रकार उसकी इग्लैण्ड पर जीत हो जायेगी ।

महाद्वीपीय व्यवस्था योजना का आरम्भ

नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था | The Continental System of Napoleon
नेपोलियन ने ब्रिटेन की नाकेबन्दी 21 नवम्बर 1806 ई0 के बर्लिन आदेश (Berlin dicree) से आरम्भ की। इसके द्वारा ब्रिटिश द्वीप समूह से फ्रांस ने अपने तथा अपने प्रभाव के देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्धों को समाप्त करने की घोषणा की । जनवरी 1807 के वर्सा आदेश द्वारा उसने घोषणा को दुहराया।
 
इग्लैण्ड ने बर्लिन आदेश का जबाव 7 फरवरी 1807 के आर्डर्स इन काउन्सिल (Order's in Council) के द्वारा दिया। इस घोषणा के द्वारा इग्लैण्ड ने फ्रांस एवं उसके उपनिवेशों से व्यापारिक सम्बन्ध समाप्त कर दिये । तटस्थ देशों के साथ सख्ती की गयी । उनके जहाजों को ब्रिटिश बन्दरगाहों से व्यापारिक लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य कर दिया गया । आर्डर्स इन काउन्सिल की घोषणा से फ्रांस बहुत नाराज हुआ। इसके प्रतिउत्तर में नेपोलियन ने दिसम्बर 1807 ई0 में मिलान का आदेश तथा अक्टूबर 1810 में फोन्टेब्लो का आदेश जारी किया। इन आदेशों द्वारा इग्लैण्ड की नाकेबन्दी को और अधिक कठोर बनाने का प्रयास किया । अंग्रेजी माल के पूर्ण वहिष्कार का प्रयास किया । तटस्थ देशों को चेतावनी दी कि यदि उनके जहाज ब्रिटिश माल लायेंगे तो उन्हें जब्त कर लिया जायेगा ।
 

महाद्वीपीय व्यवस्था को सफल बनाने हेतु शक्ति द्वारा प्रयास तथा नेपोलियन का पतन

महाद्वीपीय व्यवस्था नेपोलियन के मस्तिष्क की विलक्षण उपज थी । यदि वह अपने इस उद्देश्य को पूरा करने में सफल हो जाता तो यूरोपीय इतिहास का नक्शा ही कुछ और होता । लेकिन उस समय यूरोप के समस्त देश इंग्लैण्ड की आपूर्ति पर निर्भर थे । इग्लैण्ड से बिना आयात किये उनका कार्य चलना अत्यन्त कठिन था । अतः यूरोप के कुछ राष्ट्रों ने नेपोलियन की इस व्यवस्था का विरोध करना शुरू किया जिसे नेपोलियन ने शक्ति प्रयोग करके दबाया । महाद्वीपीय व्यवस्था को सफल बनाने हेतु नेपोलियन के शक्ति प्रयोग को निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं - 
  1. सर्वप्रथम स्वीडेन ने बर्लिन उद्घोषणा को मानने से इन्कार कर दिया । इस स्थिति में नेपोलियन ने रूस पर दबाव डाला कि वह फिनलैण्ड का प्रदेश स्वीडेन से छीन ले । जब यह नीति सफल न हुई तो नेपोलियन युद्ध द्वारा स्वीडेन के राजा को गद्दी से हटाकर वहाँ अपने एक सेनापति को राजा बनाया । 
  2. हालैण्ड का राजा नेपोलियन का भाई लुई बोनापार्ट था । उसने भी इस व्यापारिक प्रतिरोध के नीति का विरोध किया । इससे क्रोधित होकर नेपोलियन ने उसे गद्दी से हटा दिया तथा हालैण्ड को फ्रांस में मिला लिया ।
  3. रोम के पोप द्वारा इस व्यवस्था के विरोध करने पर नेपोलियन ने उसके राज्य को छीन कर इटली में मिला दिया। पोप ने नेपोलियन को धर्म से बहिष्कृत कर दिया । नेपोलियन को इसकी कोई चिंता नहीं थी । वह पोप को बंदी बनाकर जेल में डाल दिया । 
  4. महाद्वीपीय व्यवस्था को न मानने पर पुर्तगाल के विरुद्ध भी उसने सैनिक कार्यवाही करते हुए अपने सेनापति जुनो को युद्ध हेतु भेजा । जुनों ने पुर्तगाल के शासक पर विजय प्राप्त कर पुर्तगाल पर अपना अधिकार कर लिया । 
  5. अपनी महाद्वीपीय अवरोध नीति को सफल बनाने के लिए नेपोलियन ने यह आदेश दिया कि पश्चिम जर्मनी के नगरों में जितना भी अंग्रेजी माल है उसे जब्त कर लिया जाय । 
  6. पुर्तगाल को जीतने के बाद नेपोलियन स्पेन को जीतने की योजना बना रहा था । उसने स्पेन के राज परिवार के झगड़े में भाग लेकर वहां के राजा एवं युवराज को अपदस्त कर अपने भाई जोसेफ बोनार्पाट को वहां का शासक बनाया। स्पेन के लोगों ने इसे अपना अपमान समझा और वे नेपोलियन के विरोधी हो गये । स्पेन की सहायता के लिए इंग्लैण्ड ने अपनी सेना भेजी । अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों में स्पेन में अनेक युद्ध हुए जिनमें फ्रांस पराजित हुआ । स्पेन के युद्ध में पराजय के साथ नेपोलियन का पतन शुरू हो गया । 
  7. रूस भी महाद्वीपीय युद्ध में सुधार चाहता था । इससे नाराज होकर नेपोलियन ने आठ लाख सैनिकों के साथ रूस पर आक्रमण कर दिया। रूसी पराजित होने पर पीछे हटते गये साथ में अपनी संपत्ति तथा खाद्यान्न जलाते गये । नेपोलियन को मास्को पहुँचने पर कुछ न मिला । वह मात्र अपने 20 हजार सैनिकों के साथ वापस लौटा। इस प्रकार इन युद्धों उसे बहुत क्षति हुई । 
  8. स्वयम् फ्रांस पर इस नीति का गम्भीर परिणाम निकला । चाय, काफी, चीनी, तम्बाकू और कपड़े की कमी हो गयी । अतः इन वस्तुओं की चोरी से आयात करने की नीति या तस्करी व्यापार को बढ़ावा मिला। सख्ती एवं दण्ड से जनता घृणा करने लगी ।
 
सम्पूर्ण यूरोप में इस व्यवस्था को लागू करने में नेपोलियन को अनेक युद्ध लड़ने पड़े जिससे अपार धन- जन की क्षति पहुँची । यूरोप के लोगों को भी जो मुख्यतः इग्लैण्ड के आयात पर उपभोग के लिए निर्भर थे काफी संकट का सामना करना पड़ा। यूरोपीय बाजार में इग्लैण्ड की आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ गयीं जिससे जनता को कष्ट होने लगा नागरिकों के निजी जीवन में अत्याचारपूर्ण हस्तक्षेप से बहुसंख्यक लोग अत्याचारी शासन से घृणा करने लगे और उसे उखाड़ फेंकने की कामना करने लगे ।

निरन्तर चलने वाले युद्धों से भयंकर नर संहार ने नेपोलियन के विरुद्ध निश्चय ही घृणा का भाव उत्पन्न किया । महाद्वीपीय व्यवस्था के कारण ही 1812 ई0 में रूस एवं फ्रांस का सम्बन्ध खराब हुआ जो नेपोलियन को पतन की ओर ले जाने में सहायक सिद्ध हुआ । इस नीति के कारण ही 1812, 1813, 1814 के तीन वर्षों में नेपोलियन की राजनीति और राजनय का भारी भरकम ढाँचा रेत की दिवार की भाँति गिरकर बिखर गया । इतिहासकार केटल्वी ने इस सम्बन्ध में लिखा है - "नेपोलियन के प्रजाजनों को उसके सामाजिक विधान से जो कुछ भौतिक लाभ हुआ, उसका अधिकांश नेपोलियन की उस आर्थिक नीति के कारण निष्फल हो गया जिसे उसने इग्लैण्ड के विरुद्ध लागू करना चाहा । इस नीति का नेपोलियन के साम्राज्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा ।" संक्षेप में महाद्वीपीय व्यवस्था नेपोलियन के पतन का एक करण बनी ।

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