नेपोलियन बोनापार्ट के पतन के कारण The Downfall of Napoleon वॉटरलू की हार के बाद नेपोलियन को सेंट हेलेना द्वीप भेज दिया गया, जहाँ 1821 में उसकी मृत्यु
नेपोलियन बोनापार्ट के पतन के कारण | The Downfall of Napoleon
नेपोलियन बोनापार्ट इतिहास के सबसे महान सेनापतियों और रणनीतिकारों में से एक था, जिसने एक समय पर लगभग पूरे यूरोप पर अपनी धाक जमा ली थी। लेकिन जिस तेजी से उसका उत्थान हुआ, उतनी ही तेजी से उसका पतन भी हुआ।नेपोलियन के पतन के पीछे कोई एक कारण नहीं था, बल्कि उसकी अपनी कुछ रणनीतिक गलतियाँ और बदलती वैश्विक परिस्थितियाँ इसका मुख्य कारण बनीं।
टिलसिट की संधि के बाद 1808 ई0 तक नेपोलियन सम्पूर्ण यूरोपीय शक्तियों पर छा गया । इस समय तक नेपोलियन के नाम से समस्त यूरोप भयभीत था । लेकिन 1815 ई0 के वाटरलू के युद्ध में पराजित होने के बाद नेपोलियन को कैद करके सेण्ट हेलेना द्वीप भेंज दिया गया जहाँ 5 मई 1821 को कैन्सर रोग से नेपोलियन की मृत्यु हो गयी। इस प्रकार अपने व्यक्तिगत प्रयास के बल पर यूरोप में फ्रांस की धाक जमाने वाले नेपोलियन का विकास जितनी तेजी से हुआ उसका पतन भी उतनी ही तेजी से हुआ । संक्षेप में नेपोलियन के पतन के निम्नलिखित कारण थे -
नेपोलियन की असीमित इच्छा
नेपोलियन की इच्छाओं की कोई सीमा नहीं थी । नेपोलियन को एक के बाद एक सफलता मिलती गयी और वह सैनिक से सम्राट बन गया । 1808 ई0 तक इग्लैण्ड को छोड़ कर यूरोप के अधिकांश क्षेत्र उसके प्रभाव में आ गये, लेकिन उसने इग्लैण्ड को पराजित करने की इच्छा नहीं छोड़ी। इस प्रकार वह अपनी इच्छाओं पर अंकुश नहीं रख सका । ज्यों-ज्यों युद्ध में विजयी होता गया उसकी इच्छाएं बढ़ती गयीं, फलतः वह स्पेन और रूस के युद्धों में फँस गया जो उसके पतन का प्रमुख कारण बनीं ।
एक मात्र नेपोलियन पर आश्रित सम्राज्य
नेपोलियन ने अपना सम्राज्य स्वयम् बनाया था तथा सम्पूर्ण सम्राज्य एक मात्र उसी पर आश्रित था । वह स्वयम् ही अपना मंत्री तथा परामर्शदाता था और उसकी धारणा थी कि वह जो कुछ कर रहा है ठीक कर रहा है । अहंकार के मद में चूर होकर उसने अक्सर योग्यतम सहयोगियों की उपेक्षा की फलतः सम्पूर्ण साम्राज्य नेपोलियन के योग्यता तथा बुद्धि पर निर्भर था । जैसे ही उसे असफलताओं का तेज झटका लगा उसका साम्राज्य ढह गया तथा नेपोलियन की पराजय के साथ ही उसके सम्राज्य के टुकड़े-टुकड़े हो गये।
नेपोलियन की चारित्रिक दुर्बलतायें
नेपोलियन में साहस, योग्यता संयम एवं वीरता कूट-कूट कर भरी थी परन्तु उसकी कुछ चारित्रिक दुर्बलतायें भी थी। वह संधि को सम्मानित समझौता नहीं मानता था । वह पराजित देशों की मित्रता पर भी भरोसा नहीं रखता था। कार्य करने की धुन में उसने यह नहीं सोचा कि मनुष्य थक जाता है । नेपोलियन के पतन के सारे कारण एक ही शब्द थकान (Exhaustion) में निहित है। उसे अपने सहयोगियों पर विश्वास नहीं था । उसे अपने सम्बन्धियों से मोह था। उसके अहंकारी स्वभाव एवं अविश्वास के कारण उसके सहयोगी तथा सम्बन्धी उससे दूर होते गये । इस प्रकार की चारित्रिक दुर्बलताओं ने उसे पतन के रास्ते पर ला खड़ा किया।
सैन्य शक्ति पर आवश्यकता से अधिक विश्वास
नेपोलियन की शक्ति का आधार उसका सैनिक बल था जिस पर उसे अत्यधिक विश्वास था । वह कहता था कि 'ईश्वर उसका साथ देता है जो विशाल सेनायें रखते हैं।" लेकिन धीरे-धीरे सैन्यवाद का प्रसार यूरोप के अन्य देशों में भी हुआ । यूरोप के अन्य देशों ने भी अपनी सेना का विकास कर लिया और संगठित होकर वे नेपोलियन की सेना से अधिक मजबूत हो गये । इसका परिणाम यह हुआ कि सैनिक संतुलन मित्र देशों के पक्ष में हो गया । नेपोलियन को पराजय का मुँह देखना पड़ा।
शक्तिशाली ब्रिटिश नौ सेना
इग्लैण्ड की मजबूत नौ सेना नेपोलियन के पतन का विशिष्ट कारण बनी । सामुद्रिक युद्धों में नेपोलियन को न केवल हार का अपमान सहना पड़ा बल्कि महाद्वीपीय व्यवस्था को असफल सिद्ध करने में इग्लैण्ड की सामूहिक शक्ति ही प्रभावशाली सिद्ध हुई ।
अव्यवहारिक यूरोपीय महाद्वीपीय व्यवस्था
नेपोलियन ने अपनी महाद्वीपीय व्यवस्था के अन्तर्गत इग्लैण्ड से आर्थिक युद्ध लड़ने के उद्देश्य से अपने प्रभाव में आये समस्त यूरोपीय देशों को आदेश दिया कि वे इग्लैण्ड से व्यापार बन्द कर दें । तटस्थ देशों को भी चेतावनी दी गयी कि यदि उनके जहाज ब्रिटिश माल लायेंगे तो उन्हें जब्त कर लिया जायेगा । इस व्यवस्था के कारण फ्रांस तथा अन्य देशों में चाय, काफी, तम्बाकू तथा चीनी, कपड़ा इत्यादि की कमी हो गयी । ये वस्तुएं भी इग्लैण्ड से चोरी से लायी जानें लगीं जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला। इस व्यवस्था को लागू करने के लिए नेपोलियन को रोम के पोप से युद्ध कर उसे बंदी बनाना पड़ा जिससे कैथोलिक जनता में उसकी प्रतिष्ठा घट गयी । महाद्वीपीय व्यवस्था लागू करने के लिए नेपोलियन को अनेक युद्ध करने पड़े जिनके कारण धन-जन की अपार क्षति हुई जिससे नेपोलियन की शक्ति का हास हुआ ।
स्पेन में राष्ट्रीयता का उदय
स्पेन पर नेपोलियन ने जिस ढंग से अधिकार करके अपने भाई जोसिफ को वहाँ का शासक बनाया यह कार्य भी न केवल अनैतिक व अन्यायपूर्ण था बल्कि उसके पतन का महत्वपूर्ण कारण बना। स्पेन में राष्ट्रीयता की भावना ने नेपोलियन की समूचे साम्राज्य व्यवस्था को प्रभावित कर उसे अस्त व्यस्त कर दिया । नेपोलियन ने स्वयम् स्वीकार किया है कि - स्पेन को फोड़े ने मुझे नष्ट कर दिया ।” राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार रूस तथा जर्मनी तक फैल गया । जर्मनी तथा रूस में राष्ट्रीयता की भावना के बढ़ने के कारण मित्र देशों की संघर्ष की शक्ति को बल मिला और नेपोलियन की शक्ति को समाप्त कर नेपोलियन सम्राज्य को पतन के गर्त तक ले जाने में सफल हुए ।
यूरोपीय राष्ट्रों में संगठन की भावना
नेपोलियन के युद्धों से परेशान होकर यूरोप के देशों ने अपने को संगठित किया । 1793 ई0 से 1815 ई0 तक उन्होंने चार गुट बनाये । प्रारम्भ में नेपोलियन इन युद्धों में पारस्परिक ईर्ष्या व द्वेष का लाभ उठाता था । लेकिन अन्त में सामूहिक शक्ति का मुकाबला नहीं कर पाया। इस तरह यूरोपीय राष्ट्रों की संगठित शक्ति ने नेपोलियन का पतन कर दिया।
सम्बन्धियों का विश्वासघात
नेपोलियन को अपने सम्बन्धियों के विश्वासघात एवं उच्च अधिकारियों के धोखे का भी सामना करना पड़ा। स्पेन में अपने भाई जोसेफ की अयोग्यता के कारण अपमान सहना पड़ा। इटली में कैरोलिन तथा जेरोन के कारण उसकी प्रतिष्ठा को धक्का लगा । नेपोलियन का विदेशमंत्री तैलीयॅ भी 1807 ई. के पश्चात् उसका विरोधी हो गया। पुलिस अधिकारी फोशे ने उसे धोखा दिया । इस विश्वासघात एवं धोखे का भी नेपोलियन के पतन में बहुत बड़ा सहयोग रहा ।
निष्कर्ष उपरोक्त विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि नेपोलियन के पतन के अनेक कारण थे परन्तु यह भी सही है कि अपने पतन के लिए नेपोलियन स्वयम् उत्तरदायी था । उसकी महत्वकांक्षा उसे उठाये हुए थी उसी ने उसे धूल में मिला दिया। उसके सभी सामूहिक कार्यो, दुर्बलताओं एवं भूलों ने उसे पतन गर्त में डूबो दिया ।


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