1789 की फ्रांसीसी क्रांति French Revolution के प्रमुख कारण | Causes of the French Revolution

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1789 की फ्रांसीसी क्रांति विश्व इतिहास की एक युगांतरकारी घटना थी। यह किसी एक कारण का परिणाम नहीं, बल्कि दशकों से जमा हो रहे असंतोष का विस्फोट था।

1789 की फ्रांसीसी क्रांति French Revolution के प्रमुख कारण | Causes of the French Revolution


1789 की फ्रांसीसी क्रांति विश्व इतिहास की एक युगांतरकारी घटना थी। यह किसी एक कारण का परिणाम नहीं, बल्कि दशकों से जमा हो रहे असंतोष का विस्फोट था। इसके प्रमुख कारणों को हम निम्नलिखित बिंदुओं में समझ सकते हैं:

राजनीतिक कारण

राजनीतिक कारणों को हम निम्नलिखित बिन्दुओं के सहारे समझ सकते हैं - 
  1. राजा की निरंकुशता - फ्रांस के राजा दैवीय अधिकार के मानने वाले पूर्णतया निरंकुश शासक होते थे । निरंकुशता की अनंत एवं अपार शक्ति के कारण ही लुई चौदहवें ने 'मैं ही राज हूँ, ( I am the State) का दावा किया था । लुई चौदहवें के बाद उसके उत्तराधिकारी क्रमशः अयोग्य बनते गये । लुई चौदहवें ने अपनी विदेश नीति के अन्तर्गत फ्रांसीसी सीमावृद्धि हेतु चार युद्ध लड़े और इसमें सफलता भी पायी । इस प्रकार फ्रांस की ख्याति पूरे यूरोप में फैली परन्तु अपने शासन काल के अंतिम दिनों में वह आंतरिक नीति में असफल होता दिखायी दिया । मृत्यु पूर्व लुई चौदहवें को अपनी असफलता का अनुभव हो गया था इसलिए उसने अपने उत्तराधिकारी को सलाह दी थी- “जनहित के कार्य करना, युद्ध न करना और सही सलाहकार रखना । लेकिन उत्तराधिकारी लुई पन्द्रहवाँ अत्यन्त कमजोर, लापरवाह एवं विलासी निकला । युद्धों में पराजय के साथ उसे अपार धन की क्षति पाई । वर्सायी महल का जीवन विलासिता एवं पड़यंत्रों का केन्द्र होता गया । मृत्यु के पूर्व उसे भी अपने गलती का बोध हुआ और उसने कहा था - "मेरे मरने के बाद प्रलय होगा । और वस्तुतः उसकी मृत्यु के पन्द्रह वर्ष बाद फ्रांस में क्रान्ति हुई जिसने वोर्वो वंश की सत्ता समाप्त कर दी । लुई पन्द्रहवें के उत्तराधिकारी लुई सोलहवें में भी निरंकुशता की कमी नहीं थी । वहं कहा करता था कि - चूँकि मैं चाहता हूँ इसलिए यह चीज बैध (कानूनी) है।" लुई सोलहवें में आत्म निर्णय पर अटल रहने की व दृढ़ इच्छा शक्ति का अभाव था । विलासप्रिय जीवन बिताना उसकी बड़ी कमजोरी थी । फलस्वरूप अपने पूरे शासन काल में वह अपनी विलासप्रिय रानी एवं कृपापात्रों के प्रभाव में रहा । बदली हुई परिस्थिति में जनता के परिवर्तन की माँग को शासन सत्ता में बैठे राजा, सलाहकार एवं विलासी सामन्तों ने निरंकुशता के आधार पर ठुकराने का प्रयास किया । यह निरंकुश प्रक्रिया फ्रांस के राजा और राज्य के लिए अभिशाप बन गयी और जनता विद्रोही हो गयी । इस प्रकार फ्रांसीसी राजतंत्र का गला स्वयम् उसकी निरंकुशता ने घोट दिया । 
  2. दोषपूर्ण प्रशासनिक ब्यवस्था - निरंकुश केन्द्रीय शासन तंत्र की तरह ही प्रान्तीय शासन के पास भी कोई हितकारी योजना नहीं थी । कहने को तो फ्रांस में कुल 40 प्रान्तीय सरकारें थीं । इसके वास्तविक शासक गवर्नर थे जो सामन्तों में से होते थें । परन्तु ये प्रशासक वर्सायी के महल में विलासिता का जीवन ब्यतीत करते हुए राज्य परिवार की चापलूसी एवं षड्यंत्र करते रहते थे । लुई तेरहवें के प्रधान मंत्री रिशल ने प्रशासनिक दृष्टि से राज्य को 36 भागों में बाँटा जिन्हें जनरेलटीज (Generalities) या इन्टेन्डन्सीज (Intendancies) कहा गया । इसके प्रशासक राजा द्वारा नियुक्त बहुधा मध्यम वर्ग के ब्यक्ति होते थे जिन्हें इन्टेन्डेन्ट कहा जाता था । ये राजधानी से आदेश पाकर ही कोई कार्य करते थे । वस्तुतः ये लोग इस केन्द्रीय कुशासन को चलाने के लिए साधन मात्र सिद्ध हुए जिसकी असली बागडोर जारा की पाँच केन्द्रीय समितियों के हाथ में थी । केन्द्रीय नीति को लागू करने के कारण एवं आलसी तथा विलासी होने के कारण ये लोकप्रिय शासक न हो सके । फ्रांस में स्थानीय शासन का अभाव था । प्रत्येक प्रान्त के माप-तौल एवं कानूनों में भी विभिन्नता थी । एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में ब्यापारिक कानूनों में भी विभिन्नता थी । केन्द्रीय फ्रांस के 13 प्रान्तों में एक जैसा व्यापारिक नियम था । इसमें माल एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता था परन्तु 19 प्रान्त इस मामले में एक दूसरे से अलग थे । इसमें माल एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में ले जाने पर चुंगी देनी पड़ती थी । नापों एवं बॉटो के मूल्य भी, कई जगह अलग-अलग थे । लोगों में स्थानीयता की प्रमुखता थी । इस प्रकार देश में दृढ़ एकता का नितान्त अभाव था ।
  3. जनता की स्वतंत्रता पर प्रतिबन्ध - क्रान्ति के अवसर पर फ्रांस के लोगों को किसी प्रकार की स्वतंत्रता नहीं थी । राजा की निरंकुशता के विरुद्ध जनता किसी प्रकार की आवाज नहीं उठा सकती थी क्योंकि लेखन, भाषण एवं प्रकाशन पर जबरदस्त प्रतिबन्ध लागृ था । आलोचना के अभाव में राजा समझ रहा था कि वह जो कर रहा है ठीक कर रहा है परन्तु जनता के अन्दर सुलगती असंतोष की आग ने क्रान्ति के रूप में प्रकट होकर साम्राज्यशाही को भस्म कर दिया । जनता को व्यक्तिगत या दैहिक स्वतंत्रता भी नहीं दी गयी थी । राजा द्वारा जारी बिना अभियोग के वारंट पत्र जिसे लेटर द काशे (Letter de Gachet) कहा जाता था । उसे दिखाकर किसी को भी गिरफ्तार किया जा सकता था। राजा के प्रिय सामंत इस अभियोग पत्र को प्राप्त कर लेते थे तथा इस पर किसी का भी नाम लिखकर उसको गिरफ्तार करवा देते थे । इस प्रकार नागरिक स्वतंत्रता नहीं के बराबर थी । फ्रांस की जनता न तो सभा कर सकती थी न संघ बना सकती थी । इस प्रकार वहाँ राजनीतिक स्वतंत्रता का भी अभाव था । फ्रांस का राज धर्म कैथोलिक था । प्रोटेस्टेन्ट धर्म में विश्वास रखना अपराध माना जाता था और इस अपराध के लिए फाँसी तक की सजा दी जाती थी ।
  4. दोषपूर्ण न्याय व्यवस्था - फ्रांस में सर्वत्र न्याय व्यवस्था के लिए समान कानून लागू नहीं थे । एक कस्बे में जो बात कानूनी और सही मानी जाती थी वह बात उस स्थान से 5 मील से भी कम दूरी पर स्थित दूसरे कस्बे में नियम विरुद्ध और गैर कानूनी समझी जाती थी । फ्रांस के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के लगभग 400 कानून लागू थे । फ्रांस की कानूनी व्यवस्था को केटेल्वी ने कानून के क्षेत्र में “महान अराजकता' के नाम से पुकारा है । किसी व्यक्ति को स्पष्ट पता नहीं था कि उसके मुकदमे का फैसला किस कानून के अन्तर्गत होगा । पार्लेमा नाम के विशिष्ट न्यायालयों के न्यायाधीश के पद भी धन प्राप्ति के लिए राजा द्वारा बेचे जाते थे । राजकीय न्यायालयों के अतिरिक्त सामन्त चर्च के सैनिक तथा वित्तीय न्यायालय भी थे जिनमें न्याय पाना दुर्लभ कार्य था। बिना वारण्ट के गिरफ्तारी का पत्र (लेटर द काशे) के प्रचलन से ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि फ्रांस की न्यायिक ब्यवस्था का रूप किस सीमा तक गिर चुका था । 
  5. दोष पूर्ण कर ब्यवस्था - फ्रांस में कर दो प्रकार के थे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष । प्रत्यक्ष कर जागीर, निजी सम्पत्ति और आय पर लगाये जाते थे । कुछ करों से सामन्तों एवं चर्च पदाधिकारियों को मुक्त रखा गया था । अन्य करों से सामन्त कानूनी दृष्टि से मुफ्त नहीं थे परन्तु राजस्व अधिकारियों की मिली भगत से ये कर बहुत हल्के लगाये जाते थे । कर निर्धारित करने वाले अधिकारियों पर बड़े लोगों का आतंक भी रहता था । अतः राजकुमारों एवं सामन्तों के पक्ष में कर व्यवस्था पक्षपातपूर्ण रूप से लागू की जाती थी । नमक कर, शराब कर इत्यादि अन्य अप्रत्यक्ष कर भी थे जिन्हें सरकार ब्यक्तियों अथवा कम्पनियों को उनकी वसूली का ठीका दे देती थी । ठेकेदार अत्यधिक लाभ कमाने के लिए जनता का शोषण करते थे । कर की दरों में सभी जगह असमानता भी थी जिससें चोरी से वस्तुओं के व्यापार को बढ़ावा मिलता था । 
  6. राजकीय धन का दुरुपयोग - सरकारी तंत्र इतना भ्रष्ट था कि एक ओर जनता जहाँ भूखों मर रही थी वहीं राजा राजधानी से 12 मील दूर वर्सायी के महल में रहकर शानो शौकत पर पानी की तरह पैसा बहा रहा था । शाही महल में करीब 18 हजार लोग रहते थे इनमें राज परिवार के लोग, उनके सम्बन्धी, कुलीन, सामन्त तथा राजा के कृपा पात्र लोग और नौकर चाकर सम्मिलित थे । इन सभी की शान-शौकत पर खर्च अकेले 1789 ई. में 2 करोड़ डालर तक पहुँच गया था । राजा का खर्च शाही महल तक ही सीमित नहीं था । उनके चाटुकारों, कृपापात्रों की ऊँची-ऊँची नौकरियों एवं पेन्सनों पर भी खूब धन लुटाया जाता था। इन सब खर्चों का भार साधारण एवं मध्यम वर्गीय जनता के ऊपर था, अतः उनके मन में इस राजकीय ब्यवस्था के प्रति तीव्र असंतोष था ।

सामाजिक कारण (Social couses )

French Revolution
1789 ई. की क्रान्ति के पूर्व फ्रांस का समाज भी समस्त यूरोप की भाँति कुलीन वर्ग, पादरी वर्ग और जन साधारण एवं कृषक वर्ग में बँटा था । वाणिज्य ब्यापार में वृद्धि के फलस्वरूप जनसाधारण वर्ग में से कुछ लोग धन संग्रह करके अपनी सामाजिक स्थिति ऊपर उठानें में प्रयासरत थे । ये लोग मध्यम वर्ग कहलाते थे । परम्परा के आधार पर कुलीन वर्ग तथा पादरी वर्ग को विशेषाधिकार प्राप्त थे जिनके आधार पर जनसाधारण वर्ग का शोषण एवं मध्यमवर्ग का अपमान होने लगा था, अतः इस सामाजिक व्यवस्था के परिवर्तन हेतु शोषित वर्ग शोषक वर्ग के विरुद्ध क्रान्ति के लिए तैयार हो रहे थे । संक्षेप में फ्रांसीसी समाज की झलक निम्नलिखित रूप में देखी जा सकती है 
  1. कुलीन वर्ग (Nobles Class) - यह समाज में विशेषाधिकार प्राप्त प्रतिष्ठित वर्ग था तथा स्थानीय शासन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी । ये दो प्रकार के होते थे । 1. दरबारी कुलीन या सामन्त 2. प्रान्तीय कुलीन या सामन्त । दरबारी कुलीन वर्सायी महल में शान-शौकत से रहते थे । ये राज्य के उच्चपदों को प्राप्त करने की होड़ में रहते थे । ये कुलीन देश की भूमि के पाँचवें भाग के मालिक थे । प्रान्तीय कुलीन गाँवों में किसानों के बीच रहते थे । ये किसानों से सामन्ती कर वसूलते थे । अपने विशेषाधिकार के मद में कुलीन नैतिक पतन की ओर अग्रसर हो रहे थे । 
  2. पादरी वर्ग (Clargy Class) - फ्रांस में वैभव विशेषाधिकार एवं सम्मान प्राप्त दूसरा वर्ग पादरियों का था । ये फ्रांस के रोमन कैथोलिक चर्चों के संचालक थे । आध्यात्मिक मार्ग का प्रदर्शन, शिक्षण तथा दरिद्र एवं बीमार लोगों की सेवा चर्च के मूल कार्य थे । परन्तु अधिकांश पादरी शिकार, नाचगानों एवं विलासितापूर्ण जीवन में लीन थे । यद्यपि पादरियों की संख्या लगभग 30 हजार थी जो फ्रांस की जनसंख्या का 1% थी लेकिन इनके पास देश की 40% सम्पत्ति थी । देश की कुल भूमि का पाँचवाँ भाग चर्च के पास था जिनसे उनको आमदनी होती थी । इसके अलावा प्रत्येक व्यक्ति अपनी आय का दशवाँ भाग टाइथ, (Tithes) नामक कर के रूप में चर्च को देता था । चर्च के ये अधिकारी दो वर्गों में बँटे थे, उच्च पादरी वर्ग जिनमें आर्क विशप, कार्डिनल, निशाप तथा चर्च के अन्य अधिकारी आते थे । दूसरे निम्न पादरी वर्ग के थे जो पुरोहित की तरह गाँवों में रहकर धार्मिक कार्य करते थे । ये मेहनती तथा अपेक्षाकृत इमानदार थे, परन्तु इन्हें वेतन बहुत कम मिलता था ।
  3. जनसाधारण एवं कृषक वर्ग तथा मध्यमवर्ग साधारण वर्ग में अधिकांश कृषक लोग थे । कुछ लोग अपने व्यापारिक कार्य क्षमता के बलबूते पर धन एकत्र कर समाज एवं सरकार दोनों को प्रभावित करने की क्षमता बना रहे थे । ये मध्यम वर्ग के लोग कहलाये परन्तु इन्हें किसी भी तरह का विशोषाधिकार प्राप्त नहीं था । अतः ये सभी लोग शासन से असंतुष्ट थे, क्योंकि उन्हें राजस्व एवं चर्च कर अत्यधिक मात्रा में देना होता था । एक किसान अपनी पैदावार का 1/8 भाग कर के रूप में देता था जिसे सम्पार्ट कहा जाता था । जमीन बेचने पर आय का 1/5 भाग कुलीन को कर के रूप में देना पड़ता था । लुई सोलहवें के शासन काल में क्तिमंत्री तुर्गो ने अनुमान लगाया था कि उन्हें (किसानों को) अपनी कमाई का 55% करों के रूप में देना पड़ता था । इसके अलावा नमक, तम्बाकू, शराब पर कर देना पड़ता था । चर्च को आय का 1/10 भाग कर के रूप में देने के अलावा, सड़क बनाने में बेगार करना पड़ता था ।जनसाधारण वर्ग में ही दूसरा वर्ग मध्यम वर्ग का था । इनमें साहूकार, ब्यापारी, वकील, लेखक, अध्यापक, डाक्टर इत्यादि आते थे । इस वर्ग के लोग सम्पत्ति एवं योग्यता की सभी शर्त के साथ होते हुए भी राजनैतिक अधिकारों से बंचित थे । अतः इनका शासन के प्रति असंतुष्ट होना स्वाभाविक था ।

आर्थिक कारण (Economic causes)

क्रान्ति के पूर्व फ्रांस की अर्थ ब्यवस्था जर्जर हो चुकी थी । राज्य की अनुचित एवं पक्षपातपूर्ण कर प्रणाली से सामान्य जनता क्षुब्ध थी । कर वसूलने की ठेकेदारी प्रथा के कारण भी जनता शोषण से पीड़ित थी । विदेशी युद्ध एवं राजमहल के अपव्यय के कारण फ्रांस की स्थिति एकदम डवाँडोल हो गयी थी । प्रतिवर्ष आय से अधिक ब्यय होता था जिसे के लिए ऋण लिये जाते थे । राष्ट्रीय आय का अधिकांश भाग ऋण का ब्याज चुकाने में खर्च पूरा करने होता था । राजकीय वित्तनीति सामान्यतया इस सिद्धान्त पर चलती कि खर्च आमदनी के हिसाब से किया जाय लेकिन उस समय के अनुसार ब्यय को निश्चित न करके आय को ही ब्यय के अनुसार निश्चित किया जाता था । इस नीति से ऋणभार व करभार बढ़ता ही जा रहा था । लुई सोलहवें के बारह वर्ष के शासन काल में ऋण बढ़कर 60 करोड़ डालर तक पहुँच गया था । लोग राज्य को ऋण देने में हिचकने लगे थे । जनता बढ़ते कर भार से दबी थी । तुर्की (1774-76), नेकर ( 1776-81), क्लोन ( 1783-87) इत्यादि क्तिमंत्रियों ने सब पर समान कर लगाने एवं राजकीय खर्च में कमी कर आर्थिक स्थिति सुधारने का प्रयास किया लेकिन राजा के चापलूस समान्तों ने उनके सुधारों को चलने नहीं दिया और एक के बाद एक उन्हें पद से षड़यंत्र द्वारा हटाते गये । ऐसी स्थिति में कर वृद्धि के लिए स्टेट जनरल की बैठक की गयी जिससे फ्रांसीसी क्रान्ति का शुभारम्भ हुआ । इस प्रकार प्रमुख कारण थे 
  1. युद्ध एवं अपव्यय से खाली कोष - फ्रांसीसी क्रान्ति का प्रमुख कारण राजकोष का खाली होना था । लुई चौदहवां वैसे तो योग्य शासक था, पर युद्ध प्रेमी होने के कारण वह युद्धों में लगा रहता था अतः राजकोष खाली हो गया । इसके अतिरिक्त अपव्यय के कारण भी राजकोष खाली हो गया । लुई ने वर्साय के राजप्रसाद के निर्माण में 50 करोड़ का खर्च किया जिसके बनने में 25 वर्ष का समय लगा । लुई 15वें एवं 16 वें ने भी आर्थिक सुधार का कोई काम नहीं किया । 
  2. दोषपूर्ण कर प्रणाली - फ्रांस की कर प्रणाली दोषपूर्ण थी । कर प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के थे । प्रत्यक्ष कर तीन प्रकार के थे- (i) संपति कर (ii) आयकर (iii) भूमि, व्यापार एवं उद्योग कर । अप्रत्यक्ष करों में दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं जैसे नमक एवं धर्म पर कर लगे थे । सामन्त और पादरी वर्ग अन प्रकार के करों से मुक्त थे , कर वसूली भी पक्षपात पूर्ण थी । कर वसूलने के ढंग ने जन की कमर तोड़ दी । 
  3. पेरिस की पार्लमा द्वारा नये करों की अस्वीकृति - लुई सोलहवां ने 1789 में फ्रांस की आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए फ्रांस के राज्य परिषद का अधिवेशन बुलाया । नये कर का प्रस्ताव पेरिस की पार्लमा ने अस्वीकार कर दिया और कहा कि नया कर लेगाने का अधिकार केवल राज्य परिषद को है । तब सम्राट ने राज्य परिषद का अधिवेशन बुलाया । इस प्रकार पार्लमा द्वारा नये करों की स्वीकृति क्रान्ति का कारण बनी । 
  4. सन् 1788-89 में फ्रांस में भीषण अकाल पड़ गया । फ्रांस की जनता जब रोटियों के लिए चिल्ला रही थी उस समय वर्साय के महलों में दावते दी जा रही थीं। 
  5. फ्रांस की आर्थिक स्थिति में खराबी का कारण दोषपूर्ण व्यापार वाणिज्य प्रणाली भी थी । 

बौद्धिक कारण

फ्रांस में मान्टेस्क्यू वाल्टेयर, रूसो, दिदरो आदि प्रसिद्ध लेखकों एवं दार्शनिकों ने अपने साहित्य के माध्यम से ऐसी मानसकिता पैदा कर दी कि फ्रांस में जो है वह अपर्याप्त या त्रुटि पूर्ण है । उसमें सुधार होना चाहिए और वह हो सकता है । मान्टेस्क्यू ने शक्ति पृथककरण पर जोर देते हुए चर्च के दोषों की आलोचना की । वाल्टेयर ने विचार, भाषण, लेख और कार्य की स्वतंत्रता का समर्थन किया । रूसो ने कहा प्रभुसत्ता जनता में विश्वास करती है और कानून जनता की सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति होनी चाहिए । रूसो के समाजवादी व प्रजातंत्रवादी विचारों ने सामन्तवाद के विचारों का विरोध किया तथा चर्च में फैले दुर्गुणों की जड़ को हिला दिया । दिदरों ने विश्व कोष के माध्यम से अपने तथा अन्य समकालीन लेखकों के प्रगतिशील विचारों को जिनमें चर्च और स्वेच्छाचारी राजतंत्र की भर्त्सना की गयी जनता के सामने रखा । इस सब विचारों को पढ़कर जनता को आत्मबल मिला और क्रान्ति के लिए प्रेरित हुए । 

विचारकों के क्रांतिगत योगदान के सम्बन्ध में इतिहासकारों में दो प्रकार की धारणाएं प्रचलित हैं । कुछ लेखक जैसे- हेजन और टाम्सन ने क्रान्ति के विचारों की भूमिका को अनेक में से एक कारण के रूप में स्वीकार किया है। क्रोपाटकिन का कथन है - "विचारकों ने कम से कम मनुष्यों के दिमाग में पुराने शासन के पतन की भूमिका तैयार कर दी थी ।"

लेखकों एवं दार्शनिकों के नूतन विचारों और आलोचनाओं ने पुरातन अव्यवस्था के आधारभूत सिद्धान्तों को निर्बल बनाने में ऐसे ही कार्य किये जैसे अम्ल किसी धातु को गला देने में करती है । क्रांति के लिए कष्टों की तीव्रता ही पर्याप्त नहीं होती । उस तीब्रता का ज्ञान भी अतिआवश्यक है । वस्तुतः फ्रांस के दार्शनिकों ने वहाँ की जनता में चेतना लाकर क्रान्ति का मार्ग प्रशस्त कर दिया । 

विदेशी घटनाओं का प्रभाव

फ्रांस की क्रान्ति के 100 वर्ष पूर्व ही इग्लैण्ड की महान् क्रान्ति (1688) हो चुकी थी । वहाँ की वैधानिक शासन की स्थापना का प्रभाव धीरे-धीरे फ्रांसीसी लोगों पर पड़ने लगा था । 1772-82 ई. के बीच आयरलैण्ड के लोगों ने निरंकुश राजतंत्र के विरुद्ध आन्दोलन करके कुछ राजनीतिक सुविधाएं प्राप्त कर ली थीं । इस घटना का प्रभाव भी फ्रांस पर पड़ना स्वाभाविक था । क्रांति के 13 वर्ष पूर्व ही अमेरिका के स्वतंत्रता की लड़ाई छिड़ गयी थी जिसमें लाफायते के नेतृत्व में फ्रांसीसी सेना ने अमेरिकियों को ब्रिटेन के विरुद्ध मदद की थी । इस युद्ध से वापस लौटे सैनिकों में स्वतंत्रता की भावना भरी थी, अतः उनके माध्यम से फ्रांस में स्वतंत्रता के महत्व का प्रचार स्वाभाविक था । 

इस प्रकार जब राजा ने सेना को पेरिस की ओर कूच करने का आदेश दिया, तो जनता भड़क उठी। 14 जुलाई 1789 को आक्रोशित भीड़ ने बास्तील के किले पर हमला कर दिया, जो राजा की निरंकुश सत्ता का प्रतीक था। उन्होंने जेल तोड़ दी और कैदियों को रिहा कर दिया। यहीं से राजशाही के अंत की शुरुआत हुई।

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