स्वयं में डूबा हुआ तैराक

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जितने भी वृक्ष खड़े हैं— जड़ें जमाए, आकाश की ओर झुके— उन सबका एक ही नाई, एक ही श्रृंगारकार है: हवा। वह बिना बुलावे चली आती है, अदृश्य कैंची उँगलियों

स्वयं में डूबा हुआ तैराक


मेरे भीतर कल्पनाएँ
ऐसे मथ रही हैं—
जैसे पतझड़ की थकी पत्तियाँ
बिना किसी कारण
धरती की गोद में गिरती चली जाएँ।

मैं उन्हें थाम लेना चाहता हूँ,
दोनों हथेलियों में—
कि कहीं
जीवन की यह काग़ज़ी नाव
अपनी ही लहरों से
डूब न जाए।

पर यह कोई क्षमा-याचना नहीं है—
न ही कोई सफ़ाई।
यह तो बस
मेरे अपने अहं का
मीठा, आत्ममुग्ध उत्सव है—

जहाँ मैं ही सागर हूँ,
मैं ही नाव,
और मैं ही
डूबने का दर्शक भी।


रक्त का उत्सव — शिष्टता से सराहा गया

शहादत— कोई ऐसी कथा नहीं
जिसे बार-बार दोहराया जाए,
वह तो एक घाव है
जिसे बहुत पहले ही
सी दिया जाना चाहिए था।
स्वयं में डूबा हुआ तैराक

पर देखिए—
हम अब भी दुख पर माला चढ़ाते हैं,
पीड़ा को इतना चमकाते हैं
कि वह हमें सद्गुण लगने लगे।

एक शांत गर्व के साथ
हम गिरे हुओं को नारों में ढाल देते हैं,
उनकी खामोशी को
अपनी सबसे ऊँची जयकार बना देते हैं।

क्या अजीब संसार है यह—
जहाँ त्रासदी का अभ्यास होता है,
और हानि की गूँज को
सम्मान समझ लिया जाता है।

साहस, सत्यापन के बाद ही मान्य
मानव इतिहास, कहते हैं, उन्हीं लोगों ने आगे बढ़ाया
जो अपनी सीमाओं के भीतर रहते हुए
खतरों का सामना करते थे।

लेकिन आजकल—
साहस भी मानो “फैक्ट-चेक” के बाद ही स्वीकार्य है,
कुछ स्क्रीनशॉट, थोड़ी बहस,
और जनता की मुहर के बिना नहीं।

"आडुजीवितम" पढ़ने वाले,
जो कुर्सी पर बैठे-बैठे रेगिस्तान पार कर आए,
चार दिन के वास्तविक संघर्ष पर
अब संदेह करने लगते हैं।

अजीब समय है—
जहाँ अनुभव से ज़्यादा
उस पर उठे सवालों की गिनती मायने रखती है।

और शरण्या—
इतने भयावह अनुभव के बाद भी
खुलकर कहती है कि वह फिर ट्रेकिंग करेगी।

न माफी, न पीछे हटना,
बस… आगे बढ़ने की घोषणा।

शायद असली असुविधा यही है—
कि डर के इस दौर में
किसी ने डर को अंतिम सत्य मानने से इंकार कर दिया।

तालियाँ तो मिलेंगी—
बस, थोड़ी और जाँच-पड़ताल के बाद।          

टिप्पणी:आडुजीवितम- बेंजामिन द्वारा लिखित सुप्रसिद्ध मलयालम उपन्यास।

गुलाब की गवाही

बाग़ की अदालत में
एक गुलाब खड़ा हुआ—
सिर पर काँटे,
माथे पर फूलों का ताज।

उसने कहा,
“मैं हूँ सबूत—
सुंदरता और सुरक्षा साथ-साथ चल सकते हैं,
फिर भी…
शर्म किसे ओढ़नी है?”

पंखुड़ियाँ हिलीं—
संकोच से नहीं,
इस बेहूदा सवाल पर हँसते हुए।

“क्या खुशबू को माफ़ी माँगनी चाहिए
कि वह हवा में घुलती है?
क्या कोमलता को अपराध मान लिया जाए
सिर्फ़ इसलिए कि वह दिखती है?”

नीचे, पत्तों की छाया में
भृंगों की सभा लगी—
छोटे-छोटे नैतिकतावादी,
कीचड़ से उठे हुए निर्णायक।

“नहीं, नहीं, नहीं!”
वे एक स्वर में बोले,
“संकोच! मर्यादा! छिपाव!”
उनकी आँखों पर पट्टी नहीं थी—
पर सोच पर ज़रूर थी।

गुलाब मुस्कुराया—
हल्की, चुभती हुई मुस्कान के साथ।

“अजीब है,” उसने कहा,
“जो ज़मीन में रेंगते हैं,
वे आसमान छूने वालों को नियम सिखाते हैं।”

और हवा—
जो हर राज़ की खबर रखती है—
धीरे से फुसफुसाई:

“फूल शर्म नहीं होता,
काँटा इजाज़त नहीं होता,
और भृंगों की भीड़…
सिर्फ़ शोर होती है।”

गर्मी की बारिश जैसी

अच्छी कविताएँ गर्मी की बारिश जैसी होती हैं—
अचानक, बिना आहट के उतरती हुई,
और अपने ही ढंग से थोड़ी विद्रोही।

वे तर्क की अदालत में सिर नहीं झुकातीं,
न ही कारणों की सूखी ज़बान से अपना अर्थ समझाती हैं।

वे बस मन की धरती पर बरसती हैं,
उस ताप को शांत करती हैं जिसे समझाया नहीं जा सकता,
और उन सच्चाइयों को छू जाती हैं
जिन्हें केवल सोचा नहीं, महसूस किया जाता है।

हवा — एकमात्र नाई

जितने भी वृक्ष खड़े हैं—
जड़ें जमाए, आकाश की ओर झुके—
उन सबका एक ही नाई, एक ही श्रृंगारकार है:
हवा।

वह बिना बुलावे चली आती है,
अदृश्य कैंची उँगलियों में थामे,
पत्तों की उलझी सोच को संवारती,
हरियाली की भाषा को तराशती हुई।

न दर्पण, न दया—
फिर भी हर शाख झूमकर मान जाती है,
मानो समर्पण ही
एक नई सुंदरता का नाम हो।

उसके गुजरने भर से
मुकुट बदल जाते हैं,
बिखराव गीत बन जाता है,
और ठहराव नृत्य सीख लेता है।

कैसा अद्भुत है यह धरती का सैलून—
जहाँ हवा ही जानती है
छूना,
बिना कभी दिखे।



- Binoy.M.B,
Thrissur district, pincode:680581,
Kerala state, email:binoymb2008@gmail.com,
phone:9847245605(office)

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