खालसा सिरजना दिवस में तब्दील हुआ बैसाखी पर्व हमारे देश में दिल्ली के तख़्त पर मुगलिया सल्तनत का शासन लगभग 300 सालों का रहा है ,बाबर से लेकर औरंगजेब और
खालसा सिरजना दिवस में तब्दील हुआ बैसाखी पर्व
हमारे देश में दिल्ली के तख़्त पर मुगलिया सल्तनत का शासन लगभग 300 सालों का रहा है ,बाबर से लेकर औरंगजेब और फिर बहादुर शाह द्वितीय तक और सिख गुरु की परंपरा भी गुरु नानक देव से लेकर गुरु गोबिंद सिंह और फिर बंदा बहादुर तथा और जरनैलों का शासन भी मिलाकर लगभग उसी के आसपास ठहरता है यानी दोनों लगभग एक ही कालखंड की घटनाएं हैं।
सिखों के पहले गुरु नानक से लेकर पांचवें गुरु अर्जुन देव तक की पूरी गुरु परंपरा भक्ति भाव और अध्यात्म की ही रही है। वहीं पांचवें गुरु अर्जुन देव जी की शहादत के बाद छठे गुरु हरगोविंद से इसमें कुछ तब्दीली आनी शुरू हो गई थी। इसलिए उन्होंने एक साथ दो तलवारें धारण कीं- एक मीरी की और दूसरी पीरी की !
उन्होंने बताया कि मीरी की यानि राज-काज चलाने की तथा पीरी की यानि आध्यात्म की। मीरी की तलवार से पीरी की तलवार दो इंच लम्बी रखी गई थी, यानि राजकाज का शासन धर्म के अधीन हो। इसका मकसद था कि शासक को ताकतवर होने के बावजूद ईश्वर को नहीं भूलना है और न्याय संगत शासन ही करना है ।
मुगल बादशाह बाबर ने हिंदुस्तान पर आक्रमण किया और इस दौरान उसने बुरी तरह लूट-खसोट मचाई और कई जगहों पर भयंकर नर संहार भी किया।इन सब घटनाओं का जिक्र करते हुए गुरु नानक ने कई पदों की रचना की और बाबर को संबोधित करते हुए कहा कि- बाबर तूं जाबर हैं!
गुरु नानक देव जी ने तो संपूर्ण आध्यात्मिक निर्मल पंथ की नींव रखी थी और कालांतर में ऐतिहासिक घटनाओं के कारण गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की। वैसे सत्य और धर्म के मार्ग पर चलना कितना कठिन है गुरु नानक देव ने जी ने तभी इस ओर इशारा भी कर दिया था और कहा था कि इस मार्ग पर चलने वालों को अपना शीश अपनी हथेली पर रखना होता है-
इत मारग पैर धरीजै,सिर दीजै काणि न कीजे
यानि सत्य और न्याय के मार्ग पर सिर देने में कहीं भी किंतु परंतु नहीं होनी चाहिए।
इसी सिद्धांत की सीधे-सीधे परखने के लिए सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह ने परीक्षा ली।इस दौरान गुरु गोविंद सिंह के पिता और नौवें गुरु तेग बहादुर सत्य और न्याय की खातिर अपना शीश दिल्ली में कुर्बान कर चुके होते हैं जहां आज उनकी स्मृति में गुरुद्वारा शीश गंज सुशोभित है।
देश में एक धर्मावलंबियों पर भयंकर अत्याचार और जुल्म अब असहनीय स्थिति तक आ चुका था और जनता निरूपाय, असहाय और बुरी तरह भयाक्रांत थी। ऐसे समय में केसगढ़ जिसे आज आनंदपुर साहिब के नाम से जाना जाता है वहीं सन् 1699 को पूरे देश से जुटे श्रद्धालुओं को जो उस बैसाखी वाले दिन वहां एकत्र हुए थे उनको गुरु गोविंद सिंह ने संबोधित किया और कहा कि आज हो रहे जुल्मो सितम से टक्कर लेने के लिए अपना शीश कुर्बान करना पड़ेगा। उन्होंने अपने हाथ में नंगी तलवार लहराते हुए कहा कि दरबार में है कोई माई का लाल,जो इन सब अत्याचारों का मुकाबला करने के लिए अपना शीश कुर्बान कर सके।ऐसा सुनते ही पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया, लेकिन फिर उन्ही में से एक लाहौर से आया भाई दयाराम, जो जाति का खत्री था, वो सामने आया। गुरुजी उसे लेकर पीछे बने तंबू में ले गए और फिर एक झटके में गर्दन कटने की आवाज आई।
गुरुजी रक्तरंजित तलवार लेकर बाहर दरबार में आए और फिर वही बात दुहराई। दरबार में सभी घबराने लगे थे लेकिन एक- एक कर और चार लोग सामने आए । गुरुदेव उनको भी तंबू में लेकर गए। तम्बू से बाहर खून की धारा निकलती लोगों ने अपनी आंखों से देखी। पूरा दरबार स्तब्ध था।तभी सबने आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता से देखा कि गुरु जी उन सबको एक ही तरह के वस्त्रों से सुसज्जित जीवित अवस्था में लेकर दरबार में हाजिर हुए।उसके बाद उन्होंने एक लोहे के बर्तन में जल भरकर उसमें कुछ पतासे डाले और फिर उसे खंडे (एक प्रकार का अस्त्र)से पांच वाणियों का पाठ करते हुए घुमाया। इस तरह बनाए गये अमृत को गुरु जी ने अपने हाथों से सभी को अमृत पान कराया और फिर उन्हें पांच प्यारों का खि़ताब दिया।इस तरह वैसाखी पर्व खालसा सिरजना दिवस के रुप में तब्दील हुआ। उसके बाद वे स्वयं उन पांचों के समक्ष घुटनों के बल हाथ जोड़कर बैठे और अनुरोध किया कि उन्हें भी अमृतपान कराया जाये। दुनिया के इतिहास में ये पहला मौका था,जब कोई गुरू अपने ही बनाए शिष्यों से दीक्षा लेता है। इस अद्वितीय घटना पर तभी तो किसी इतिहासकार कवि ने कहा कि-
ओ जम्मेया मरद अगम्मड़ा वरियाम अकेला
वाह-वाह गोविंद सिंह, आपे गुर चेला !
इसके साथ ही उन्हें पांच ककार रखने का भी निर्देश दिया - केश,कड़ा,कंघा,कछहरा और कृपाण तथा उन्हें ये हिदायत भी दी कि उन्हें सच्चा और सुच्चा रहना है तथा जहां भी किसी पर अत्याचार हो रहा है उसका विरोध तो करना ही है जरूरत पड़े तो अपने आपको कुर्बान करने में भी पीछे नहीं हटना है। इसके बाद उन्होंने इसे अपनी न्यारी फौज कहते हुए ये कहा कि अब मैं भी इसी खालसा का एक अंग हूं -
खालसा मेरो रुप है खास
खालसा में हौं करौं निवास
कई इतिहासकारों का ये मानना है कि उसी दिन वहां उपस्थित हजारों लोग अमृतपान कर खालसा के रूप में परिवर्तित हुए।
अब हम बात करते हैं उन पहले पांच प्यारों की , जिनमें पहला लाहौर(पंजाब) से दयाराम था ,जो जाति का खत्री था और अमृतपान कर हुआ - भाई दया सिंह! उसके बाद दूसरा दिल्ली का जाट धर्मचंद था,जो अमृतपान कर हुआ भाई धरम सिंह। उसके बाद तीसरा जगन्नाथ पुरी उड़ीसा का हिम्मत राय,जो जाति का कहार था,जो भाई हिम्मत सिंह हुआ। उसी तरह चौथा द्वारिकापुरी का मोहकम चंद जो जाति का धोबी था वो भाई मोहकम सिंह और पांचवां बिदर (कर्नाटक) का साहिब चंद नाई था वो भाई साहिब सिंह के रूप में परिवर्तित हुआ।गुरु गोबिंद स्वयं भी गोबिंद राय से अमृतपान के बाद गुरु गोबिंद सिंह हुए।
इस तरह हम देखते हैं कि खालसा पंथ की स्थापना में न सिर्फ पंजाब का बल्कि देश के मुख्तलिफ हिस्सों का योगदान रहा। इस तरह ये बात तो स्पष्ट है कि पूरे देश ने मिलकर ही खालसा पंथ की सिरजना की।
इसके बाद हमें ये बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि खालसा पंथ के मूल सर्जक गुरु गोविंद सिंह का जन्म पटना बिहार में हुआ और उनका तिरोधान नांदेड महाराष्ट्र में हुआ।नौवें गुरु तेग बहादुर की शहादत दिल्ली के चांदनी चौक में हुई। इसके अलावे भी और ऐतिहासिक गुरुद्वारों की बात छोड़ भी दें,तो भी पूरे देश में हजारों गुरुद्वारे हैं,जो धार्मिक तथा सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं।मेरे कहने का तात्पर्य है कि इन सब के बावजूद अगर कोई अलगाववादी सोच रखता हो,तो अकाल पुरख, ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे।
पूरे देश की आजादी में सिक्खों का अप्रतिम योगदान रहा है और आज भी देश की रक्षा में अग्रणी भूमिका निभाने में उनका कोई सानी नहीं। हमने कोराना काल में भी देखा था जब पूरे देश में सिखों द्वारा की गई हर किस्म की मानवता सेवा जिसमें खासतौर से लंगर शामिल है किसी से छिपी नहीं है।
इसलिए आज खालसा सिरजना दिवस में तब्दील हुए इस वैसाखी पर्व में हम प्रण लें कि न सिर्फ देश का कोई टुकड़ा बल्कि पूरा देश,पूरा हिन्दुस्तान हम सबका है और इसके प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखते हुए सभी की भलाई के लिए इस उद्घोष को हृदयंगम कर लेना चाहिए-
नानक नाम चढ़दी कला,तेरे भाणे सरबत दा भला!
रावेल पुष्प
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