निराला का मुक्त छंद प्रयोग मात्र सौंदर्य-प्रधान नहीं था। इसमें यथार्थ की गहरी छाप है। वे छायावादी होते हुए भी यथार्थवादी प्रवृत्तियों से प्रभावित थे।
निराला के मुक्त छंद की अवधारणा और प्रयोग
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हिंदी कविता के उस क्रांतिकारी युग के प्रमुख स्तंभ थे जिन्होंने छायावाद की संवेदनशीलता को यथार्थ की कठोर भूमि पर उतारकर कविता को नई दिशा दी। उनकी कविता न केवल भावुकता की उड़ान थी बल्कि समाज की पीड़ा, मानवीय संघर्ष और स्वतंत्र चेतना की अभिव्यक्ति भी थी। इसी स्वतंत्र चेतना ने उन्हें छंदों के पारंपरिक बंधनों से मुक्ति दिलाई और उन्होंने मुक्त छंद को हिंदी काव्य की मुख्यधारा में स्थापित किया। मुक्त छंद निराला के लिए मात्र एक शिल्पगत प्रयोग नहीं था, बल्कि जीवन-दर्शन का विस्तार था। वे मानते थे कि कविता भावों की मुक्ति चाहती है और भावों की मुक्ति छंदों की मुक्ति की मांग करती है। पारंपरिक छंदों में जहां भाव छंद के अनुरूप ढाले जाते थे, वहां निराला ने उलट दिया—भावानुसार छंद का प्रयोग। उनके अनुसार छंद भावों का दास नहीं, सहचर होना चाहिए।
हिन्दी काव्य जगत् में परम्परा से प्रयोग होती हुई तुकान्त और छन्दयुक्त कविता में जब अंग्रेजी कविता के 'ब्लैक वर्स' की देखा-देखी अतुकान्त या छन्दमुक्त कविता का आरम्भ हुआ तो इस प्रयास को हिन्दी जगत् में सराहना की दृष्टि से नहीं देखा गया. निराला से पूर्व अम्बिकादत्त व्यास, अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' और जयशंकर प्रसाद अतुकान्त कविताएं लिखीं थी किन्तु वे सभी कविताएं अतुकान्त होते हुए भी छन्दमय थीं.
निराला ने कविता को छन्दमुक्त करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई. सन् 1916 में रचित 'जूही की कली' निराला की पहली छन्दमुक्त अथवा मुक्त छन्द की रचना है, जिसे 'सरस्वती' पत्रिका के सम्पादक महावीर प्रसाद द्विवेदी ने प्रकाशन के लिए अस्वीकृत कर निराला को वापस लौटा दिया था. 'जूही की कली' और बाद में 'अनामिका' में प्रकाशित निराला की मुक्त छन्द की कविताओं का आलोचकों ने स्वागत ही नहीं किया बल्कि इन कविताओं में प्रयुक्त छन्द को ‘रबर छन्द' या ‘केंचुआ छन्द' कहकर उपहास भी किया. आलोचकों ने निराला की कविताओं के मुक्त छन्द को छन्द मानने से ही इनकार कर दिया.
"मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है. मनुष्यों की मुक्ति कर्मों के बन्धन से छुटकारा पाना है और कविता की मुक्ति छन्दों के शासन से अलग हो जाना है. मुक्त छन्द काव्य से एक प्रकार की स्वाधीन चेतना फैलती है, जो साहित्य के कल्याण की ही मूल होती है.
मेरे गीत और कला' निबन्ध में निराला ने लिखा है- “हिन्दी काव्य की मुक्ति के मुझे दो उपाय मालूम दिए, एक वर्णवृत्त में, दूसरे मात्रावृत्त में. 'जूही की कली' की वर्णवृत्त वाली जमीन है. इसमें अत्यानुप्रास नहीं. यह गाई नहीं जाती इससे पढ़ने की कला व्यक्त होती है. इस छन्द को मैं मुक्त छन्द कहता हूँ. मात्रावृत्त वाली कविताओं में लड़ियाँ असमान हैं पर अन्त्यानुप्रास है. आधार मात्रिक होने के कारण, ये गायी जा सकती हैं पर संगीत अंग्रेजी ढंग का है. इस गीत को मैं ‘मुक्त गीत' कहता हूँ.”
ध्यान देने योग्य बात यह है कि निराला की मुक्त छन्द की अवधारणा और ‘छन्दमुक्त' में पर्याप्त अन्तर है. मुक्त छन्द का अर्थ है-मात्रा, तुक आदि बन्धनों से मुक्त होना. मुक्त छन्द को अतुकान्त कविता भी नहीं कह सकते क्योंकि अतुकान्त कविता भी छन्दबद्ध होती है. जैसाकि अतुकान्त हिन्दी कविता गण, मात्रा और वर्ण-तीनों वृत्तों में होती रही है. निराला ने अतुकान्त कविता के सम्बन्ध में लिखा है- “इस प्रकार की कविता अतुकान्त कविता का गौरव भले ही प्राप्त कर ले, वह मुक्त काव्य या स्वछन्द छन्द कविता कदापि नहीं. यदि किसी प्रकार का श्रृंखलाबद्ध नियम कविता में निकलता गया तो वह कविता उस श्रृंखला से जकड़ी हुई ही होती है. अतएव उसे हम मुक्ति के लक्षणों में नहीं ला सकते. मुक्त छन्द तो वह है जो छन्द की भूमि में रहकर भी मुक्त है. मुक्त छन्द का समर्थक उसका प्रवाह ही है. वही उसे छन्द सिद्ध करता है और उसका नियम से रहित होना उसकी मुक्ति."
गत्यात्मक आवेग या प्रवाह निराला के मुक्तछन्द की प्रमुख विशेषता है. वहाँ न तो मात्राओं का विचार है, न वर्णों
की संख्या का, केवल गति का प्रवाह ही मुख्य है. कविता में गति का प्रवाह के लिए 'संध्या सुन्दरी' कविता देखें. निराला ने मुक्त छन्द को कुछ कविताओं में तुकान्त रूप भी दिया है. 'अनामिका' में संकलित 'सेवा प्रारम्भ' कविता का एक उदाहरण दृष्टव्य है-
अल्प दिन हुए
भक्तों ने राम कृष्ण के पैर छुए जगी साधना
जन जन में भारत की नवराधना ।
निराला का मुक्त छंद प्रयोग मात्र सौंदर्य-प्रधान नहीं था। इसमें यथार्थ की गहरी छाप है। वे छायावादी होते हुए भी यथार्थवादी प्रवृत्तियों से प्रभावित थे। उनकी कविताओं में सामाजिक पीड़ा, शोषण, गरीबी और मानवीय संघर्ष की अभिव्यक्ति मुक्त छंद के माध्यम से और भी प्रभावशाली हो जाती है। भावावेग इतना प्रबल होता है कि छंद स्वयं उसके अनुरूप मुड़ जाता है। इससे कविता अधिक जीवंत, अधिक संवादात्मक और अधिक आधुनिक बन जाती है। निराला ने हिंदी कविता को छंदों की परिधि से बाहर निकालकर उसे आधुनिक युग की चुनौतियों का सामना करने योग्य बनाया। उनके बाद अनेक कवियों ने मुक्त छंद को अपनाया, लेकिन निराला ही उसके प्रवर्तक और सबसे ओजस्वी समर्थक रहे।
डॉ. बच्चन सिंह ने ‘हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास' में निराला की मुक्त छन्द की अवधारणा को 'छन्दों की रीतिबद्धता तोड़ने का एक क्रान्तिकारी कदम' कहा है. उनके अनुसार - "मुक्त छन्द केवल काव्य के बाह्य कलेवर का परिवर्तन नहीं है बल्कि एक क्रान्तिकारी बदलाव का भी सूचक है. निराला की उद्दाम कल्पना, प्रखर भावावेग, निर्बन्ध यौवन, निःसीम प्राणवत्ता छन्द के बन्धन में समाहित ही नहीं हो सकती थी.'
इतिहास की गति देखें जिस 'जूही की कली' कविता को मुक्त छन्द के कारण सम्पादक ने वापस लौटा दिया था, वही मुक्त छन्द आज हिन्दी कविता की मुख्य धारा बन चुका है.आज जब हम आधुनिक हिंदी कविता की बात करते हैं तो मुक्त छंद को उसकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति मानते हैं। यह स्वतंत्रता निराला ने दी। उन्होंने कविता को छंद-मुक्त नहीं, बल्कि छंद-मुक्ति की राह दिखाई। मुक्त छंद उनके लिए विद्रोह का प्रतीक था—विद्रोह कृत्रिमता के विरुद्ध, परंपरा के विरुद्ध, लेकिन सृजन के पक्ष में। उनकी कविता पढ़ते हुए लगता है कि शब्द स्वयं बोल रहे हैं, लय स्वयं बन रही है और भाव स्वयं बह रहे हैं। यही निराला की मुक्त छंद की सबसे बड़ी सफलता है। उन्होंने साबित कर दिया कि कविता की सार्थकता छंद में नहीं, कवि के हृदय के प्रवाह में है। इस प्रवाह ने हिंदी कविता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया और आज भी उसे प्रेरित कर रहा है। निराला की यह देन हिंदी साहित्य की अमूल्य संपदा है, जो कविता को हमेशा मुक्त रखेगी।


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