एक माँ की कसक | हिंदी लघु कथा

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एक माँ की कसक रोहित शर्मा, एक सम्मानित व्यवसायी, ने अपनी तेइस वर्षीय बेटी आन्या का रिश्ता एक ऐसे संपन्न संयुक्त परिवार में तय कर दिया था, जो अपने फलते

एक माँ की कसक

रोहित शर्मा, एक सम्मानित व्यवसायी, ने अपनी तेइस वर्षीय बेटी आन्या का रिश्ता एक ऐसे संपन्न संयुक्त परिवार में तय कर दिया था, जो अपने फलते-फूलते व्यापार साम्राज्य के लिए मशहूर था। उनके लिए यह किसी सपने जैसा रिश्ता था— सुरक्षा, प्रतिष्ठा और मान-सम्मान, सब एक ही प्रस्ताव में समाए हुए।

एक माँ की कसक
कॉलेज से नई-नई निकली आन्या बेहद उत्साहित थी। भव्य समारोह, महंगे तोहफ़े और बड़े परिवार में कदम रखने का ख्याल उसके लिए किसी रोमांच से कम नहीं था। उसने मासूमियत से कहा—“माँ, वहाँ तो मेरे पास हमेशा कज़िन्स रहेंगे! मुझे कभी अकेलापन नहीं लगेगा। उनका इतना बड़ा बंगला है मां… ढेर सारे नौकरानी-नौकर हैं तो काम की भी दिक्कत नहीं होगी।” उसकी आँखों में मासूम चमक थी।

पर माँ, मीरा अनुभवी थी, उसके चेहरे की मुस्कान गायब थी। उसने उस परिवार के बारे में बड़े किस्से सुने थे— जहाँ औरतों की राय शायद ही कभी मायने रखती थी, परंपराएँ सख़्ती से निभाई जाती थीं। मीरा का दिल कसक उठा। क्या उसकी चंचल और स्वतंत्र विचारों वाली बेटी ऐसे माहौल में टिक पाएगी?

उस रात मीरा ने आन्या के पास बैठकर धीरे से पूछा—“बेटा, क्या तुम जानती हो- बड़े संयुक्त परिवार में जीने का मतलब क्या होता है? यह सिर्फ़ हँसी और त्योहारों का मेला नहीं होता। इसमें समझौते भी होते हैं, बहुत सारी बातें सहनी पड़ती हैं और कभी-कभी अपनी इच्छाओं का त्याग करते हुए चुप रहना होता है।”

आन्या हँसते हुए बोली—“माँ, आप बहुत चिंता करती हैं। मैं संभाल लुंगी। प्यार से सब ठीक हो जाएगा।”मीरा ने बेटी के बालों पर हाथ फेरा और आँसू छिपा लिए। वह उसे हर तूफ़ान से बचाना चाहती थी, पर जानती थी कि कुछ सबक सिखाए नहीं जाते— वे केवल जीकर ही सीखे जाते हैं।

रात की खामोशी में बस मीरा की दुआ गूँजी—“हे भगवान, मेरी बेटी की मुस्कान कभी न मिटे, चाहे दुनिया उससे कितने भी बलिदान क्यों न माँगे।”



- नील मणि
कार्टूनिस्ट और लेखिका, तीन साझा संकलन

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