आज कुछ लोग अपने स्वार्थ के लिए प्रोग्रेसिव और आधुनिकता के नाम पर महिलाओं का ब्रेन वाश कर उनसे ही आंदोलन करवा रहे हैं।
दुनिया बदल रही है | रिश्ते भी बदलने चाहिए
समाज में सभी तरह के लोग रहते हैं।कुछ लोग अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए उच्छृंखलता को वैयक्तिक आजादी और आधुनिकता का नाम देकर महिलाओं का ब्रेन वाश कर रहे हैं।इसी का परिणाम है कि वे यथा अंग प्रदर्शन, नशेबाजी, रिलेशनशिप इत्यादि जैसे कार्यों को वैयक्तिक आजादी और अपने आप को मॉडर्न मानने लगी है।
एक समय था जब लड़कियों के बॉयफ्रेंड होना समाज में हिकारत की नजर से देखा जाता था।...लेकिन अब जिस महिला अथवा पुरुष के बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड नहीं होते हैं ,उन्हें हेय दृष्टि से या आउटडेटेड माना जाता है।
आज हर गंदे विचार, हर लालच को “आधुनिकता”, और हर शोषण को “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” का नाम देकर अपनी स्वार्थ पूर्ति की जा रही है।
पाश्चात्य देशों द्वारा हमारी विवाह जैसी संस्था को समाप्त करने के लिए एक नया विचार आया है जिसे आधुनिक नाम दिया है"वाइफ स्वैपिंग "सुबह उठकर तुलसी को जल चढ़ाना, बड़ों के पैर छूना इत्यादि को आउटडेटेड परंपराएं कहकर उनका मज़ाक़ उड़ाया जा रहा है, क्योंकि ये सीधे कोई प्रोडक्टिव नहीं है।
और इस साझेदारी के मॉडल में सबसे पहले साझेदारी हो रही है —स्त्री देह की। पुरुष आधुनिकता की आड़ में “स्वतंत्रता” के नाम पर वह स्त्री पर प्रयोग करता है। उसे क्लब ले जाता है।
इन क्लबों में पति अपनी पत्नी का परिचय देते हुए कहता है -“ये मेरी पार्टनर हैं… और आज शायद आपकी भी।”
...और सामने वाला भी उतनी ही शिष्टता से मुस्कुरा देता है —जैसे अभी-अभी उसने देशहित में कोई त्याग कर दिया हो।
यहाँ शराब के गिलास में नैतिकता को बर्फ के टुकड़ों के साथ डाल दिया जाता है।
और फिर कहा जाता है —“चियर्स टू फ्रीडम!”
कितनी अजीब बात है…जिसकी स्वतंत्रता का जश्न वह मनाने जा रहा है, उस स्त्री से कुछ पूछा नहीं जाता बल्कि कहा जाता है —“सब कुछ सहमति से होता है।”
सहमति बड़ा दिलचस्प शब्द है।यह कभी प्रेम की तरह सच्चा होता है,तो कभी बैंक के लोन एग्रीमेंट की तरह मजबूरी भरा।
जब पति कहे —“डार्लिंग, यह मॉडर्न लाइफस्टाइल है… तुम ओपन माइंडेड क्यों नहीं बनती?”
तब सहमति का चेहरा थोड़ा पीला पड़ जाता है।
स्त्री सोचती है —अगर मना कर दिया तो उसे “रूढ़िवादी”, “पजेसिव”, “गाँव की सोच वाली” घोषित कर दिया जाएगा।
और अगर मान गई —तो उसे “मॉडर्न”, “कूल” और “प्रोग्रेसिव” का सर्टिफिकेट मिल जाएगा।
समाज आजकल सर्टिफिकेट बहुत बाँटता है।
बस इंसानियत का सर्टिफिकेट देना भूल गया है। पुरुष की आधुनिकता अलग होती है।
पुरुष जब आधुनिक होता है तो सबसे पहले अपनी जिम्मेदारियाँ उतारता है।फिर अपनी संवेदनाएँ और अंत में रिश्तों की गरिमा।
उसके बाद वह घोषणा करता है —“मैं बहुत लिबरल हूँ।”लिबरल होने का मतलब अब यह हो गया है कि आप अपनी पत्नी को भी “नेटवर्किंग ऑप्शन” की तरह देखने लगें।कॉर्पोरेट भाषा में इसे कहते हैं —रिसोर्स शेयरिंग।
समाज अब रिश्तों को भी प्रोजेक्ट मैनेजमेंट की तरह चलाना चाहता है।टाइमलाइन, टार्गेट और परफॉर्मेंस इंडिकेटर के साथ।
सबसे खतरनाक चीज़ शोषण नहीं होती।
सबसे खतरनाक होता है —उसका सामान्य हो जाना।जब स्त्री खुद ही कहने लगे —“सब करते हैं… इसमें गलत क्या है?”
इसका मतलब ऐसे स्वार्थी समाज ने जीत हासिल कर ली है क्योंकि अब विरोध की आवाज़ भीतर ही दम तोड़ चुकी है।
जो स्त्री कभी घर की इज्जत कहलाती थी।अब वही “एक्सपेरिमेंट” कहलाने लगी है।
तर्क और कुतर्क से विचारधारा के नाम पर सब कुछ बदल दिया जाता है।आधुनिकता के नाम पर वाइफ स्वॅपिंग तक को आजादी कह दिया जाता है।
सती प्रथा ,बाल विवाह , पर्दा प्रथा समाज में बस कभी किसी कारण से शुरू हुईं होगी लेकिन परंपरा के नाम पर अब तक ढोया जाता रहा है।और आज “वाइफ स्वैपिंग” को भी कुछ लोग लाइफस्टाइल की परंपरा कहने लगे हैं।
तमाशे और परंपरा में फर्क सिर्फ इतना होता है तमाशे में टिकट लगता है,परंपरा में इज्जत।
इन आयोजनों में असल में उत्सव किसका होता है?न स्त्री का,न प्रेम का,न स्वतंत्रता का यह उत्सव होता है —पुरुष के अहंकार का।उसे लगता है कि वह इतना शक्तिशाली है कि अपने रिश्तों को भी खेल बना सकता है।और खेल भी ऐसा जिसमें हार हमेशा किसी और की होती है।दिन में हम लोग नैतिकता पर भाषण देते हैं।बेटियों की सुरक्षा पर ट्वीट करते हैं।संस्कृति बचाने के लिए मार्च निकालते हैं।और रात में…
संस्कृति को ही “एक्सचेंज ऑफर” में डाल देते हैं। हमारा यह दोहरा चेहरा इतना सामान्य हो गया है कि अब आईना भी कन्फ्यूज हो जाता है कि असली चेहरा कौनसा है।
स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं होता कि किसी को भावनात्मक दबाव में डालकर उसे अपने प्रयोगों का हिस्सा बना लें।स्वतंत्रता का मतलब होता है —सम्मान, समानता और सुरक्षा।जहाँ यह तीनों नहीं हैं,वहाँ सिर्फ चमकदार शोषण होता है।समाज हर चीज़ पर बहस करता है। राजनीति, क्रिकेट, फिल्मों, फैशन — सब पर।पर क्या वह कभी यह बहस करेगा कि स्त्री आखिर इंसान कब मानी जाएगी?
कब उसे “परंपरा”, “इज्जत”, “प्रयोग”, “लाइफस्टाइल” जैसे शब्दों के बोझ से मुक्त किया जाएगा?या वह हमेशा किसी न किसी क्लब की एंट्री लिस्ट में एक नाम बनकर आधुनिकता के नाम पर उसे छला जाता रहेगा। उसे यह ही नहीं पता वह किससे आजादी चाहती है।आज कुछ लोग अपने स्वार्थ के लिए प्रोग्रेसिव और आधुनिकता के नाम पर महिलाओं का ब्रेन वाश कर उनसे ही आंदोलन करवा रहे हैं।
- हनुमान मुक्त
"मुक्तायन" ,93, कान्ति नगर,
मुख्य डाकघर के पीछे,गंगापुर सिटी-322201
जिला: गंगापुर सिटी (राजस्थान) भारत
मोबाइल : 9413503841,WhatsApp: 9413503841
ईमेल: hanumanmukt@gmail.com


COMMENTS