Ambedkar Jayanti 2026 Speech छात्रों के लिए अंबेडकर जयंती पर भाषण यह दिन किसी साधारण जन्मदिन का नहीं, बल्कि एक ऐसे महापुरुष का है जिन्होंने अपनी पूरी
Ambedkar Jayanti 2026 Speech | छात्रों के लिए अंबेडकर जयंती पर भाषण
आदरणीय मुख्य अतिथि महोदय, सम्माननीय प्रधानाचार्य जी, आदरणीय शिक्षकगण, मेरे प्यारे साथियों और आज इस पावन अवसर पर उपस्थित सभी भाई-बहनों,आज 14 अप्रैल 2026 का यह दिन पूरे देश में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है।
यह दिन किसी साधारण जन्मदिन का नहीं, बल्कि एक ऐसे महापुरुष का है जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी सामाजिक अन्याय, छुआछूत और असमानता के खिलाफ लड़ाई लड़कर भारत को एक नई दिशा दी। हम सब आज डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर, जिन्हें हम प्यार से बाबासाहेब कहते हैं, की जयंती मना रहे हैं। बाबासाहेब का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू नामक स्थान पर एक गरीब दलित परिवार में हुआ था। उस समय की सामाजिक व्यवस्था इतनी कठोर थी कि छुआछूत की दीवारें इतनी ऊंची थीं कि एक छोटे बच्चे को भी स्कूल में पानी पीने के लिए दूसरे का सहारा लेना पड़ता था। लेकिन बाबासाहेब ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने शिक्षा को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया और कड़ी मेहनत से देश-विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त की। कोलंबिया विश्वविद्यालय से एम.ए. और पीएचडी करने के बाद लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की। इतनी बड़ी डिग्रियां हासिल करने के बावजूद वे कभी अपने समाज की पीड़ा को नहीं भूले।
बाबासाहेब का जीवन संघर्षों से भरा था, लेकिन उन्होंने हर संघर्ष को अवसर में बदल दिया। उन्होंने देखा कि भारतीय समाज में जाति प्रथा कितनी गहरी जड़ें जमाए हुए है। यह प्रथा न सिर्फ लोगों को अलग करती थी बल्कि उनके मानव अधिकारों को भी छीन लेती थी। उन्होंने "जाति का विनाश" जैसे लेखों और भाषणों के माध्यम से जाति व्यवस्था की कड़ी आलोचना की और कहा कि असली स्वतंत्रता तब तक नहीं आ सकती जब तक सामाजिक समानता नहीं स्थापित हो जाती। उन्होंने दलितों और पिछड़ों के उत्थान के लिए कई आंदोलन चलाए। महाड सत्याग्रह जैसा ऐतिहासिक आंदोलन शुरू किया जिसमें उन्होंने सार्वजनिक तालाब से पानी पीने का अधिकार दिलाया। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए भी लगातार आवाज उठाई। हिंदू कोड बिल के माध्यम से उन्होंने महिलाओं को संपत्ति और उत्तराधिकार का अधिकार दिलाने की कोशिश की, हालांकि उस समय यह बिल पास नहीं हो सका लेकिन उनकी सोच ने बाद में कानूनों को प्रभावित किया।स्वतंत्र भारत के निर्माण में बाबासाहेब की भूमिका अतुलनीय है।जब देश आजाद हुआ तो जवाहरलाल नेहरू जी ने उन्हें कानून मंत्री बनाया और संविधान सभा की मसौदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया। बाबासाहेब ने इस जिम्मेदारी को बड़ी निष्ठा से निभाया। उन्होंने संविधान का ऐसा मसौदा तैयार किया जिसमें समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व जैसे मूल्यों को मजबूती से जगह दी गई। भारतीय संविधान में अनुच्छेद 14 से 18 तक समानता का अधिकार, अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता का उन्मूलन और आरक्षण की व्यवस्था जैसी महत्वपूर्ण बातें बाबासाहेब की दूरदर्शिता का प्रमाण हैं। उन्होंने कहा था कि राजनीतिक लोकतंत्र तभी सार्थक होगा जब सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र भी स्थापित हो। उनका मानना था कि शिक्षा, संगठन और संघर्ष के बिना कोई भी वर्ग आगे नहीं बढ़ सकता। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे शिक्षा ग्रहण करें, क्योंकि शिक्षा ही वह शेरनी का दूध है जो इंसान को गर्जना करने की ताकत देता है।
बाबासाहेब सिर्फ कानूनविद् या राजनीतिज्ञ नहीं थे। वे एक महान अर्थशास्त्री भी थे। उनकी पुस्तक "द प्रॉब्लम ऑफ द रूपी" ने भारतीय मुद्रा व्यवस्था को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना में उनकी सोच का असर दिखता है। उन्होंने मजदूरों के लिए काम के घंटे 12 से घटाकर 8 करने का प्रस्ताव रखा, जो उस समय की दुनिया में भी क्रांतिकारी विचार था। 1956 में उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाकर लाखों दलितों के साथ सामूहिक रूप से धर्म परिवर्तन किया और कहा कि मैं हिंदू के रूप में पैदा हुआ लेकिन हिंदू के रूप में नहीं मरूंगा। यह उनका अंतिम बड़ा कदम था सामाजिक मुक्ति की दिशा में।आज जब हम 2026 में उनकी जयंती मना रहे हैं तो हमें यह सोचना चाहिए कि बाबासाहेब के सपनों का भारत हमने कितना हासिल किया है। आज भी समाज में कहीं-कहीं जातिगत भेदभाव की छाया दिखती है। शिक्षा और अवसरों में असमानता बनी हुई है। गरीब, महिला और पिछड़े वर्ग अभी भी कई चुनौतियों का सामना करते हैं। लेकिन बाबासाहेब हमें सिखाते हैं कि इन चुनौतियों से लड़ना है, संविधान के रास्ते पर चलना है और संवैधानिक तरीकों से ही बदलाव लाना है। उन्होंने कहा था कि लोकतंत्र में बहस होनी चाहिए लेकिन हिंसा या अराजकता नहीं। हमें उनके विचारों को सिर्फ किताबों या भाषणों तक सीमित नहीं रखना है बल्कि उन्हें अपने दैनिक जीवन में उतारना है।
स्कूल में पढ़ने वाले हर बच्चे को बराबरी का मौका मिले, हर युवा को शिक्षा और रोजगार का अधिकार मिले, हर महिला को सम्मान और सुरक्षा मिले—यह बाबासाहेब का सपना था।मेरे प्यारे साथियों, बाबासाहेब की जयंती सिर्फ एक उत्सव नहीं है। यह एक प्रतिबद्धता का दिन है। हम सबको वादा करना चाहिए कि हम उनकी शिक्षाओं को अपनाएंगे, जाति, धर्म या लिंग के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं करेंगे और एक समान, न्यायपूर्ण भारत के निर्माण में अपना योगदान देंगे। शिक्षा लेंगे, संगठित होंगे और संघर्ष करेंगे—लेकिन हमेशा संविधान की चौहद्दी में रहते हुए।अंत में, मैं बाबासाहेब को सादर नमन करता हूं और आप सभी से कहना चाहता हूं कि उनके विचार अमर हैं।वे हमें आज भी प्रेरित करते हैं।
आइए हम सब मिलकर उनके सपनों को साकार करें।
जय भीम! जय भारत!
धन्यवाद।


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