समय जो स्वयं ही पुराना हो रहा है समय की अलमारी में रखी कुछ पुरानी दोपहरें, धूल भरी यादों की तरह अब भी चमकती हैं। कल की हँसी आज किसी कोने में चुप बैठी
समय जो स्वयं ही पुराना हो रहा है
समय की अलमारी में रखी कुछ पुरानी दोपहरें,
धूल भरी यादों की तरह अब भी चमकती हैं।
कल की हँसी आज किसी कोने में चुप बैठी है,
और घड़ी की सुइयाँ थकी हुई चलती जाती हैं।
बचपन की पगडंडियाँ अब नक्शों में नहीं मिलतीं,
पर मन के गाँव में वे अब भी हरी हैं।
हर बीतता पल अपने ही चेहरे से दूर होता जाता है,
जैसे आईना धीरे–धीरे धुँधला पड़ रहा हो।
समय भी शायद बूढ़ा हो रहा है कहीं,
यादों के सहारे चलती उसकी लाठी,
और हम—उसके पीछे छूटते हुए कल।"
खुली जेल का जीवन
आज आएगा,
कल आएगा —
कठोर दंड का फैसला आएगा,
इसी भय में काँपता रहता है मन।
खुली जेल-सी यह दुनिया,
जहाँ हम सब कैदी हैं अनजाने।
दिन बीतते हैं पीले पड़ते हुए,
आशंका की दीवारों के बीच।
और इसी प्रतीक्षा में
धीरे-धीरे घुलती रहती है
मर्त्य जीवन की साँस।"
ओडीपस को ओडीपस कॉम्प्लेक्स नहीं
ओडीपस को ओडीपस कॉम्प्लेक्स नहीं था,
कहानी ने ही उसे ऐसा नाम दे दिया।
भाग्य की धुंध में चलता एक मनुष्य,
अपने ही पथ से अनजान रहा।
माँ एक पहेली थी, पिता एक छाया,
सत्य की राह में दोनों मिल गए।
वह अपराधी नहीं—एक त्रासदी था,
जिसे नियति ने मंच पर खड़ा कर दिया।
नाम उसका मिथक बन गया बाद में,
और मनोविज्ञान ने अर्थ बदल दिया।
ओडीपस तो बस एक मनुष्य था।"
मनाही का भी निषेध
स्वतंत्रता की थाली में नियम का नमक नहीं होना चाहिए।
कविता तो हवा है—वे समझाते हैं,
पर जेब से धीरे-धीरे आदेश निकालते रहते हैं।
कहते हैं—लिखो जो चाहे,
बस चाहत हमारी होनी चाहिए।
शब्द उड़ें आकाश में,
पर डोर हमारे हाथ में रहे।
और यदि तुमने कह दिया — “मत करो”,
वे मुस्कराकर फ़रमान सुनाएँगे —
कविता में ‘मत’ कहना बिल्कुल मत करो।"
चीन के बारे में
कहा जाता है—
सबसे गंदी भोजन–प्रणाली वाला देश है चीन।
यह भी कहा जाता है कि
उसकी सारी विकास–गाथाएँ भी
इस थाली के सामने
कुछ फीकी पड़ जाती हैं।
जहाँ लोग, कहते हैं,
मल को छोड़कर
लगभग हर चीज़ खा लेते हैं—
और इसी विडम्बना से
पहचाना जाता है वह देश।"
विकास की चमक और थाली की छाया
चमकते नगरों और ऊँची इमारतों के बीच
एक अजीब सी थाली की कहानी कही जाती है।
कहा जाता है—विकास का शोर बहुत ऊँचा है,
पर भोजन की आदतें कई सवाल जगाती हैं।
जहाँ विज्ञान और व्यापार आसमान छूते हैं,
वहीं थाली पर तिरछी निगाहें टिक जाती हैं।
कई लोग कहते हैं—
विकास की चमक भी फीकी पड़ जाती है
जब स्वाद की सीमाएँ टूटती दिखती हैं।
सभ्यता का माप केवल इमारतें नहीं,
थाली भी इतिहास का आईना बन जाती है।"
थकी हुई पृथ्वी
सूर्य की आग को देखते-देखते
थक गई है पृथ्वी।
मानो कहती हो —
अब यह जलता हुआ सूरज
और सहा नहीं जाता।
काली, घनी रात
चक्कर काटते हुए उतरती है।
फिर भी चाँदनी
दर्द की तरह बरसती रहती है —
और पृथ्वी घूमते-घूमते
अपना शेष जीवन जीती रहती है।
भविष्य की लहरों पर जीवन
भविष्य की मगरमच्छ–सी लहरों के ऊपर
जीवन की यह छोटी-सी नाव तैरती रहती है।
मन के आकाश में भी
और शरीर के भीतर के समुद्र में भी
यह यात्रा निरंतर चलती रहती है।
कभी लहरें शांत होती हैं,
कभी समय का जल उफन उठता है,
फिर भी यह नाव डगमगाते हुए आगे बढ़ती है।
आशा की पतवार थामे
हम अज्ञात दिशाओं में बहते जाते हैं।
पर किनारे से
एक कुत्ता लगातार भौंकता है—
उसका नाम है भय।
वह हमें पुकारता है, डराता है,
फिर भी जीवन की नाव
भविष्य की लहरों पर चलती ही रहती है।"
मैं का अपराध
“मैं” —
यह छोटा-सा शब्द,
कभी-कभी बन जाता है
सबसे बड़ा अपराध।
जब “मैं” बढ़ता है,
“हम” धीरे-धीरे मर जाता है।
अहंकार की दीवारों में
मनुष्य कैद हो जाता है।
और तब समझ आता है—
दुनिया का सबसे भारी पाप
शायद यही “मैं” है।"
- Binoy.M.B,
Thrissur district, pincode:680581,
Kerala state, email:binoymb2008@gmail.com,
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