अंकों का खेल भारतीय पुरुष दल की टी 20 वर्ल्ड कप में शानदार जीत पर सब भारतीय आपस में बधाई देने लगे। अंकों पर आधारित ये खेल भारतीय जीवन का अभिन्न अंग
अंकों का खेल
भारतीय पुरुष दल की टी 20 वर्ल्ड कप में शानदार जीत पर सब भारतीय आपस में बधाई देने लगे। अंकों पर आधारित ये खेल भारतीय जीवन का अभिन्न अंग है। रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बनते ध्वस्त होते रहते हैं।
अपनी सर ज़मीन पर पहली जीत।एक वर्ष में न्यू ज़ीलैंड पर दूसरी जीत। तीसरी बार वर्ल्ड कप में जीत।महिला दिवस पर पुरुष जीते। खैर न्यू ज़ीलैंड जीतता तब भी पुरुष ही जीतते। ये कमाल है एक और एक ग्यारह का।न जाने कितने मुहावरे अंकों पर आधारित हैं।
नौ दो ग्यारह।
दो और दो पांच।
दो-चार होना
तीन-पांच करना
एक-एक की दस-दस बनाना
उन्नीस-बीस का अंतर होना
छत्तीस का आंकड़ा होना
निन्यानबे के फेर में पड़ना
विद्यालय में शिक्षक इन मुहावरों का प्रयोग यदा कदा करते रहते है। व्याकरण की कक्षा में समझाए बहुत जाते हैं।
अंक विद्यार्थी जीवन का महत्व पूर्ण अंग है। ना सिर्फ व्यापारी निन्यन्वे के चक्कर में रहते है, पिछले अर्ध शताब्दी से छात्रों पर भी निन्यन्वे से ऊपर अंक या प्रतिशत लाने का बेहद जोर है। जो अभिभावक ३५ से ऊपर ना ला पाए वो भी पूर्णांक की उम्मीद रखते हैं।
कुछ दिन पहले, एक विश्वस्तरीय ए आई सम्मेलन हुआ। कुछ का कुछ दिखाया गया।
अपनी सर्वश्रेष्ठता दिखाने के चक्कर में एक नामी गिरामी उच्च शिक्षण संस्थान की प्रवक्ता ने खूब समझाया
“यौर सिक्स इज माई नईन”
कुछ समझे, कुछ नहीं। संस्थान से कुछ लोगों ने छतीस का आंकडा बना लिए जैसे स्वयम कभी किसी त्रुटि से दो चार ना होंगे।
छात्रों पर जोर बढ़ गया। बोर्ड परीक्षा का मौसम, जी हाँ मौसम, चल रहा है। परीक्षा भी मौसम अनुसार, परीक्षा के मौसम में होती है। चारों ओर छात्र परीक्षा की चर्चा में लगे हैं। पेपर से पहले, पेपर के बाद तीन पांच चलती ही रहती है।
न जाने कब अंकों की लाटरी लग जाए। एक-एक सरकारी नौकरी के लिए लाखों प्रवेश पत्र भरे जाते हैं।
कुछ समझदार, ज्ञानवान नागरिक सब ही परीक्षा में अव्वल- प्रथम स्थान लेते रहते हैं। पहले नीट पास कर डाक्टर, फिर पी जी, एम बी ऐ, फिर सिविल सर्विस- बी ग्रेड, फिर आई ए एस टॉपर। उपलब्धि पर उपलब्धि।
दूसरी ओर उन के मातहत उन के सहपाठी कार्य कर रहे है जिन्हें विद्यालय ने नहीं, जीवन ने शिक्षित करा है।
कठिन पारिस्थिति के चलते किताब कापी, पेंसिल पेन न जाने कब इन के हाथ से छूट गया। भाग, भिन्न और दशमलव का पाठ आते आते ये विद्यालय से नौ दो ग्यारह हो गए। मुक्त विद्यालय और मुक्त उच्च शिक्षा संस्थान से शिक्षा पूर्ण का काग़ज़ अवश्य मिल जाता है।
इन अति ज्ञानी, हर परीक्षा में सफल और विद्यालय से नदारत साथियों का मेल एक अजब संयोग समीकरण बनाता है। इस समीकरण को समझने के लिए रॉकेट सइंस नहीं वरन समान्य ज्ञान चाहिए। समान्य ज्ञान या साधारण ज्ञान जो बिरले ही साधारण जन में पाया जाता है। इस के आभाव में उच्च शिक्षित भी विभिन्न प्रकार के अपराध और झाँसों, जैसे डिजिटल अरेस्ट के शिकार हो रहे हैं। डिजिटल हेरा फेरि सब ही जगह पांव पसार रही है।
पिछले तीन दशक में, कुछ बड़े अधिकारी, कुछ साक्षर अनपढ़ जेगी गुरूजी के सहयोग से राष्ट्र सेवा में जुट गये। पैंतीस वर्ष पढाते लिखाते मेहनत में बीते। यही उन के राष्ट्र प्रेम का उधारण था। उन की सेवा के सम्मान में ₹३०००/- के आस पास प्रति माह सहयोग राशि ई पी एफ ओ द्वारा भेजी जाने लगी। डूबते को तिनके का सहारा।
घूमते घामते गुरुजी को कोई न कोई पुराना विद्यार्थी मिल ही जाता। कुछ पुरानी बातें, कुछ हंसी मजाक। पुराने शिकवे शिकायत याद किये जाते।
“प्रणाम, गुरुजी” चरण छूने का उपक्रम करते हुए एक नौ जवान झुक गया।
“आशीर्वाद, कौन? घिर्याल जी का पोता, आ..!”
“जी, अज्जे।”
“कहाँ हो आज कल? प्रतियोगिता परीक्षा निकाली या नहीं?”
“यहीं हूँ, राशन की दुकान ले ली। क्या आप के कार्ड का के वाई सी करवाना है?”
“करवाना है, दो बार पोस्ट आफिस गया था। अंगूठा लगा ही नहीं। बार बार जा, पूरा दिन नहीं बैठा रहा जाता। कनेक्विटी मिलती ही नहीं।”
“आप ने हमें लिखना सिखाया, हस्ताक्षर दिया, हाई स्कूल में कितना समझाया था सोच समझ कर दस्तखत बनाओ, जिंदगी भर काम आयेगा, बैंक में भी ऐसा ही करना। आज हस्ताक्षर नहीं, अंगूठा चल रहा।"
"मेरा तो वो भी नहीं चल रहा। कई काम अटके हैं। अपना मोबाइल नंबर दो।"
"xxx५६.***००, नालायक शिष्य के नाम से सेव कर ली ज ये। "
"अज्जे शिष्य, सदा अजय रहो। "
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“कुछ समय से राशन या अन्न विपणन की अति आधुनिक तकनीक लागू हुई है। पहचान के लिए बायो मेट्रिक या ऊंगलियों के चिन्ह का प्रयोग किया जा रहा था। पर अब विधि बदल गयी है।”
सुविधा अनुसार राशन कार्ड होल्डर परिवार का एक सदस्य दुकान पर जा कर, अंगुली चिन्ह लगा कर राशन ले लेता। मजे की बात ये है, एक कार्ड पर साढ़े सात किलो राशन मिल रहा है, चाहें एक सदस्य हो या दस।
समझदार लोगों ने हर सदस्य का अलग कार्ड बना “साढ़े सात” का कई गुणा ले लिया।
"गुरूजी आप की तरह, बुढ़ापे, अधिक कार्य से उंगोली के पोर मिट गाए, राशन बंद, नहीँ मिल सकता। पर सरकार सब का भला चाहती है।”
“तो अब क्या?”
“जूगत लगी, उच्च शिक्षित अधिकारी, आप का ही पढ़ाया, विरेश जाहोला, , खाद्य अधिकारी है। जब उन से बात हुई, उन्हो ने कहा “पहचान मशीन में मोबाइल नंबर डालो, ओ टी पी, आयेगा। ओ टी पी, आधुनिक कार्य शैली की आत्मा है। दस मिनट को जागृत होगी, पकड़ लो, राशन मिलेगा।”
“अच्छा, कब आऊँ?”
“परसों, ग्यारह बजे।”
“खर्च?”
“कुछ नहीं, गुरुजी। जन सेवा है। पहली से पांच तारीख को यही कार्य होता है। कोई और हो जिसे आवश्यकता हो, बता देना।”
“राशन कब से मिलेगा?”
“एक माह बाद से। डिपो में नाम आ जाये, राशन भेज देंगें।”
“अच्छा, परसों आऊँगा। पर कभी कभी ये राशन, साढ़े सात कम ज्यादा हो जाता है। जूगत कर राशन बराबर मिले।”
“कौन कठिन है। नये अधिकारी ने कहा है, जब तौला जायेगा, उसी समय पहचान मशीन पर चढ़ जायेगा। दस ग्राम से अधिक इधर उधर ना होगा।”
“वाह, साब, कमाल है। कोई हेरा फेरि नहीं।
“अच्छा, गुरूजी। प्रणाम।” हाथ एक बार फिर पैर की ओर बढ़ गए।
“खुश रह।”
शिक्षक और विद्यार्थी सोचते हैं “स्कूल खत्म रिश्ता खत्म पर ऐसा होता नहीं।”
गुरूजी मन्द मन्द मुस्कराते हुए घर पहुंचे
“इतने दिन बाद भी घिर्याल जी का पोता मिला, कितना प्रेम दिखाया। पढाई में मन नहीं लगता था इस का। दुकान का हिसाब क्या करेगा?”
के वाई सी होने के एक माह पश्चात् गुरूजी, थैला ले गुरूजी दुकान पहुँच गए। खाली पेट से आधी रोटी भली।
“क्या क्या मिलेगा, अज्जे?”
“ढाई किलो गेहूं, पांच किलो चावल। चाहो, तो सारा गेहूं, चावल ले लिजये। मशीन में चढ़ेगा दोनों। दो थैले लाये?”
“एक है।”
“कोई नहीं, क्या लेंगे?”
“गेहूं।”
“ठीक, मोबाइल नंबर बोलिये।”
मशीन में नंबर डाला गया, कार्ड लगा।
“नाम?”
“मकरावृ जेगी”
“देखिये, ओ टी पी आया?”
“हाँ, ये 50042”
ओ टी पी चढ़ गया।
“लाइये, थाइला दीज्ये।”
“ढाई किलो गेहूँ।” मशीन पर 2.510 gm, हरे रंग में चमक उठा।
गुरूजी के अंदर संतोष जगा, “चलो राशन मिल रहा।”
पहचान मशीन में चढ़ गया 2.510
“अब चावल पांच किलो के बदले भी गेहूँ तौल दूँ?”
“हाँ।”
थैला उठाया गया, फिर मशीन पर रख दिया और धीरे धीरे गेहूँ डाला गया। 2.510 se बढ़ कर हरे अंक 5. 520 चमकने लगे। एक मुट्ठी अन्न बाहर आया।, 5.510। बटन फिर दबा।
“उन्नीस बीस का भी अंतर हो तो रिकॉर्ड नहीं होता। फेयर प्रईस शाप में सब फैर है। नो हेरा फेरि।”
पहचान मशीन के रिकॉर्ड में दर्ज हो गया पांच किलो चावल।
“लिजये गुरूजी, आप का राशन, ढाई किलो गेहूँ, पांच किलो चावल। कीमत रुपए साठ। ये रहा आप का कार्ड। अगले माहे पांच तारीख के बाद।”
अज्जे रेजिस्टर में खाता चढ़ाने लग। गुरूजी ने कीमत चुकाई।
“रेट क्या है?”
“भाग कर लो, मैं समझ समझ पाता तो शिक्षक ही बनता। प्रणाम गुरूजी।”
गुरूजी कुछ बोलते तब तक अगला ग्राहक अपना कार्ड देने की जल्दी में उन्हें हटा दुकान दार को मोबाइल नंबर बताने लगा।”
गुरूजी सोचते सोचते निकल पड़े, “मशीन में ढाई और पांच चढ़ा है, कैसे दिखाऊँ कि मुझे पांच ही मिला। नये ज़माने का नया अंक गणित। मानुष त्रुटि कर सकता है, मशीन नहीं। हम पढ़े लिखे अंगूठा छाप बन गए। हा हा हा।”
- मधु मेहरोत्रा


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