साहित्य में करुण रस : भवभूति से लेकर निराला तक की मार्मिकता भारतीय साहित्य की विशाल धारा में रस सिद्धांत एक ऐसा अमृत है जो मानवीय संवेदनाओं को शाश्वत
साहित्य में करुण रस : भवभूति से लेकर निराला तक की मार्मिकता
भवभूति, आठवीं शताब्दी के इस महान संस्कृत नाटककार को करुण रस का आचार्य कहा जाता है। उनके नाटक 'उत्तररामचरित' करुण रस की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति का प्रतीक है। इस सात अंकों वाले नाटक में रामायण के उत्तर कांड की कथा को आधार बनाकर भवभूति ने राम-सीता के वियोग की पीड़ा को इतनी गहराई से चित्रित किया है कि पाठक का हृदय विदीर्ण हो उठता है। राम, जो राजधर्म के लिए अपनी प्रिय पत्नी सीता का त्याग करते हैं, अपनी आंतरिक वेदना को छिपाते हुए भी उस पीड़ा से तड़पते रहते हैं। भवभूति ने इसे पुटपाक की उपमा दी है—एक धीमी आंच पर पकने वाली वेदना, जो बाहर से दिखाई नहीं देती लेकिन अंदर से हृदय को जला देती है। वे लिखते हैं— “अनिर्भिन्नो गभीरत्वादन्तर्गूढघनव्यथः। पुटपाकप्रतीकाशो रामस्य करुणो रसः॥” अर्थात् राम का करुण रस गहरी व्यथा से भरा है, जो बाहर प्रकट नहीं होता। यह त्याग की पीड़ा है, जहां राम प्रजा की खुशी के लिए अपने सुख को बलिदान करते हैं, लेकिन मन में सीता की याद उन्हें त्रस्त किए रहती है। नाटक के विभिन्न अंकों में राम का विलाप, सीता का निर्वासन, पंचवटी की स्मृतियां और अंत में देवी शक्तियों के हस्तक्षेप से पुनर्मिलन—सब करुण रस को बहुआयामी बनाते हैं।
भवभूति का प्रसिद्ध कथन “एको रसः करुण एव निमित्तभेदाद् भिन्नः पृथक् पृथगिव श्रयते विवर्तान्। आवर्तबुद्बुदतरङ्गमयान् विकारान् अम्भो यथा सलिलमेव तु तत्समग्रम्॥” इस रस की सार्वभौमिकता को रेखांकित करता है। वे कहते हैं कि करुण रस ही एकमात्र रस है; शृंगार, वीर आदि अन्य रस उसी के विभिन्न रूप हैं, जैसे जल भंवर, बुलबुले और लहरों में बदलकर भी जल ही रहता है। इस प्रकार भवभूति ने करुण रस को न केवल प्रधान बनाया बल्कि उसे सभी भावों का स्रोत घोषित किया। उनकी भाषा वैदर्भी रीति की कोमलता और गौड़ी रीति की गंभीरता से भरी है, जो वेदना को और अधिक मार्मिक बनाती है। 'मालतीमाधव' जैसे अन्य नाटकों में भी प्रेम-वियोग की करुणा झलकती है, लेकिन 'उत्तररामचरित' में यह चरमोत्कर्ष पर पहुंच जाती है।
भवभूति की यह मार्मिकता इतनी प्रभावशाली है कि आलोचक उन्हें “करुण्यम् भवभूतिरेव तनुते” कहकर याद करते हैं—करुणा को केवल भवभूति ही सृजित कर सकते हैं।यह करुण रस की परंपरा मध्यकाल तक पहुंचते हुए भक्ति साहित्य में भी जीवित रही, जहां रामकथा के माध्यम से तुलसीदास जैसे कवियों ने वियोग और त्याग की पीड़ा को लोकभाषा में उतारा। लेकिन आधुनिक युग में, जब हिंदी साहित्य छायावाद की लहर से गुजरा, तब सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने इस रस को नया आयाम दिया। निराला की कविता में करुण रस व्यक्तिगत अनुभवों, पारिवारिक वियोग और सामाजिक असंगति से निकलकर आता है, जो भवभूति की नाटकीय वेदना से भिन्न होते हुए भी उसी मूल भावना से जुड़ा है। उनकी कृति 'सरोज-स्मृति' करुण रस का आधुनिक मास्टरपीस है—एक लंबा शोकगीत, जिसमें कवि अपनी पुत्री सरोज की असामयिक मृत्यु पर अपना विलाप व्यक्त करते हैं। यह कविता केवल पिता का शोक नहीं, बल्कि जीवन की नश्वरता, समाज की उदासीनता और पिता की अकर्मण्यता का दस्तावेज है।
सरोज के विवाह का स्मरण करते हुए निराला लिखते हैं— “देखा विवाह आमूल नवल, तुझ पर शुभ पड़ा कलश का जल। देखती मुझे तू हँसी मंद, होंठों में बिजली फँसी स्पंद...” यहां शृंगार की झलक करुण रस में घुलकर वियोग की पीड़ा को और गहरा बनाती है। कवि अपनी मृत पत्नी की याद में सरोज को देखते हैं, उसकी सुंदरता को अपनी कविता के साथ जोड़ते हैं, लेकिन अंततः मृत्यु की क्रूरता सामने आकर सब कुछ धूल कर देती है। 'सरोज-स्मृति' में प्रधान रस करुण है, जहां शोक का स्थायी भाव निर्वेद तक पहुंच जाता है। निराला की छायावादी शैली में प्रकृति, स्मृतियां और आंतरिक संघर्ष करुण रस को इतना मर्मस्पर्शी बना देते हैं कि पाठक खुद को कवि के दर्द से जोड़ लेता है। उनकी अन्य रचनाओं में भी, जैसे सामाजिक विषमता पर आधारित कविताओं में, करुण रस व्यक्तिगत से सामूहिक हो जाता है—वह वेदना जो भवभूति के राम में राजधर्म और मानवधर्म के द्वंद्व के रूप में थी, निराला में पिता के अंदरूनी टकराव और समाज की निष्ठुरता के रूप में उभरती है।
भवभूति से निराला तक की यह यात्रा करुण रस की निरंतरता को दर्शाती है। भवभूति जहां नाटकीय संदर्भ में महाकाव्यात्मक वेदना को चित्रित करते हैं, वहां निराला उसे आधुनिक कविता की आत्मीयता और यथार्थवाद से भर देते हैं। दोनों में एक समानता है—दोनों ही पीड़ा को छिपाकर भी उसे अभिव्यक्त करते हैं, दोनों ही त्याग और वियोग को मानवीय बनाते हैं। भवभूति का राम राजा होते हुए भी एक साधारण मनुष्य की तरह तड़पता है, जबकि निराला का पिता कवि होते हुए भी सामान्य जीवन की हार का प्रतीक बन जाता है। इस मार्मिकता ने साहित्य को युग-युगांतर में प्रासंगिक बनाए रखा। आज भी, जब जीवन की जटिलताएं बढ़ गई हैं, करुण रस हमें याद दिलाता है कि पीड़ा ही मानवता का सबसे गहरा पुल है।
भवभूति की पुटपाक वाली व्यथा और निराला की सरोज-स्मृति वाली वेदना एक ही सत्य को दोहराती हैं—कि साहित्य बिना करुणा के अधूरा है। यह रस न केवल हृदय द्रवित करता है बल्कि पाठक को अधिक संवेदनशील, अधिक मानवीय बनाता है। इस प्रकार भवभूति से निराला तक की मार्मिकता साहित्य की अमर धारा को निरंतर बहाए रखती है, जहां हर पीड़ा एक नई करुणा को जन्म देती है।


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