प्रहलाद की भक्ति से धुलंडी तक | होली का असली संदेश

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प्रहलाद की भक्ति से धुलंडी तक | होली का असली संदेश होली आती है जैसे कोई पुरानी साड़ी को खोलकर नया रंग बिखेर देती हो। फाल्गुन की पूर्णिमा जब करीब आती ह

प्रहलाद की भक्ति से धुलंडी तक | होली का असली संदेश

होली आती है जैसे कोई पुरानी साड़ी को खोलकर नया रंग बिखेर देती हो। फाल्गुन की पूर्णिमा जब करीब आती है, तो हवा में ठंडक कम होने लगती है, पेड़ों पर नए पत्ते झांकने लगते हैं और कहीं-कहीं आम की मंजरियां भी खिलने की तैयारी करने लगती हैं। ठीक उसी समय पूरा माहौल एक अलग ही उमंग से भर जाता है। लोग कहते हैं कि यह बसंत का आगमन है, लेकिन होली तो बसंत से भी ज्यादा कुछ है – यह जीवन का उत्सव है, रंगों के माध्यम से मन की सारी उदासी को धो डालने का उत्सव है।

प्रहलाद की भक्ति से धुलंडी तक | होली का असली संदेश
होली की शुरुआत होती है होलिका दहन से। शाम ढलते ही गलियों-मोहल्लों में लकड़ियों का ढेर लगता है। बीच में गोबर के उपले, पुरानी लकड़ियां, सूखी टहनियां और कभी-कभी पुराने कपड़े भी। आग लगाई जाती है और लोग उसके चारों ओर खड़े होकर गाते हैं, नाचते हैं। यह सिर्फ आग नहीं जलती, बल्कि हर उस नकारात्मकता को जलाने का प्रतीक होता है जो हमारे मन में साल भर जमा हो जाती है – ईर्ष्या, क्रोध, पुरानी शिकायतें, अहंकार। पुरानी कथा याद आती है प्रह्लाद की, जिसकी भक्ति इतनी गहरी थी कि आग भी उसे जला नहीं सकी। होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गया। यही संदेश हर साल दोहराया जाता है – अच्छाई अंत में जीतती है, चाहे कितनी भी बड़ी आग क्यों न हो।अगले दिन सुबह होती है धुलंडी की। सुबह-सुबह ही बच्चे, बड़े, जवान सब बाहर निकल आते हैं। हाथों में पिचकारियां, बाल्टियां, गुलाल की थालियां। कोई अबीर उड़ाता है, कोई पानी की बौछार करता है। 

रंगों की ऐसी बरसात होती है कि कुछ ही देर में सबका रंग एक-सा हो जाता है – लाल, पीला, हरा, नीला, गुलाबी – सब मिलकर एक अनोखा इंद्रधनुष बन जाते हैं। उस पल में जाति-पात, अमीर-गरीब, ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं रहता। पड़ोसी जो साल भर झगड़ता था, आज गले लगकर रंग लगाता है। दोस्त पुरानी शरारतें याद करके हंसते हैं और नई शरारतें करते हैं। घर-घर से गुजिया, मालपुए, ठंडाई की महक आती है। मिठाइयां बांटी जाती हैं, मुंह में मिठास डालकर लोग एक-दूसरे को गले लगाते हैं।ब्रज की होली तो अलग ही दुनिया है। मथुरा, वृंदावन, बरसाना में होली नहीं खेली जाती, वहां तो होली जीती जाती है। लठमार होली में रंग नहीं, बल्कि डंडों से प्रेम का इजहार होता है। बरसाना की लड़कियां लाठी लेकर आती हैं और नंदगांव के गोपियां उनसे बचने-बचाने का खेल खेलती हैं। हंसी-मजाक, गाने-ठुमके, सब कुछ इतना जीवंत कि लगता है जैसे कृष्ण आज भी वही लीला रच रहे हों।

होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं है। यह हमें याद दिलाती है कि जीवन भी रंगों से भरा होना चाहिए। हर इंसान के अंदर कई रंग हैं – कभी क्रोध का लाल, कभी शांति का सफेद, कभी प्रेम का गुलाबी, कभी उदासी का धूसर। होली कहती है कि इन सब रंगों को स्वीकार करो, उन्हें मिलाओ, खेलो और फिर भी मुस्कुराते रहो। यह त्योहार हमें सिखाता है कि रिश्तों में पुरानी कड़वाहट को जलाओ और नए सिरे से प्रेम का रंग लगाओ।जब शाम होती है और रंग सूखने लगते हैं, कपड़े रंग-बिरंगे हो जाते हैं, तब भी मन हल्का रहता है। जैसे साल भर का बोझ उतर गया हो। होली हमें यही तो सिखाती है – कि जीवन छोटा है, रंगों से खेलो, हंसो, गाओ, गले लगाओ, क्योंकि कल फिर वही दिनचर्या शुरू हो जाएगी। लेकिन आज, इस एक दिन के लिए, सब कुछ भूलकर सिर्फ आनंद में डूब जाओ।

होली आती है और चली जाती है, लेकिन जो रंग वह मन पर छोड़ जाती है, वह साल भर साथ रहता है। यही उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है। रंग खेलो, प्रेम बांटो, और जीवन को एक बार फिर से रंगीन बना दो।

होली की हार्दिक शुभकामनाएं!

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