शोषण की छाया | हिंदी कहानी

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शोषण की छाया हिंदी कहानी नरेन्द्रपुर, उत्तर प्रदेश का एक छोटा-सा कस्बा। यहाँ की सड़कें आज भी वैसी ही ऊबड़-खाबड़ हैं, धूल से भरी हुई, जैसे आजादी के

शोषण की छाया | हिंदी कहानी


रेन्द्रपुर, उत्तर प्रदेश का एक छोटा-सा कस्बा। यहाँ की सड़कें आज भी वैसी ही ऊबड़-खाबड़ हैं, धूल से भरी हुई, जैसे आजादी के पहले थीं। इसी कस्बे में श्रीरंजनलाल डिग्री कॉलेज है। पुरानी लाल ईंटों की इमारत, जर्जर दीवारें, छत से बारिश में पानी टपकता है, और कैंटीन में पुरानी बेंचों पर छात्र चाय पीते हुए गपशप करते हैं। कॉलेज का माहौल ऐसा है जहाँ सपने देखे तो जाते  हैं, लेकिन ज्यादातर समय धूल में दब जाते हैं। सुबह 9 बजे क्लास शुरू होती है, लेकिन अदिति के लिए दिन बहुत पहले ही शुरू हो जाता है।

अदिति दलित परिवार से है। घर एक छोटी-सी कच्ची-पक्की झोपड़ी है। दो कमरे, बाहर बरामदा, जहाँ माँ सुबह-सुबह चूल्हा जलाती है। पिता उसी कॉलेज में चपरासी हैं, रोज सुबह 7 बजे निकलते हैं, शाम को थककर लौटते हैं। माँ घर संभालती है झाड़ू लगाना, बर्तन माँजना, गाँव में कभी-कभी मजदूरी के लिए जाना। अदिति की रोज की स्ट्रगल ऐसी है: सुबह 5 बजे उठना, घर के काम में माँ की मदद, फिर 6 किलोमीटर दूर बस स्टॉप तक पैदल जाना (बस का किराया बचाने के लिए), कॉलेज पहुँचकर क्लास अटेंड करना, लाइब्रेरी में किताबें पढ़ना, शाम को घर लौटकर फिर काम, खाना बनाना, छोटे भाई-बहनों को पढ़ाना। पढ़ाई उसके लिए सिर्फ डिग्री नहीं है, गाँव से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता है। अपने घर की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने का और गाँव की लड़कियों को बताने का कि पढ़ाई का कोई विकल्प नहीं। किसी जगह के छोटे-बड़े होने से कुछ नहीं होता। लड़कियां भी यह सपनें देख सकती है कि हम भी कुछ बन सकती हैं। उसका सपना है शिक्षक बनना और अपने गाँव का नाम रोशन करना।

कॉलेज में राहुल नाम का एक लड़का है प्रोग्रेसिव और बेहद संवेदनशील किस्म का छात्र। कॉलेज की डिबेट सोसाइटी में उसकी अदिति से पहली मुलाकात हुई। अदिति की आँखों में राहुल ने वह आग देखी जो सिर्फ सपनों से जलती है। धीरे-धीरे उनकी बातें बढ़ीं, किताबें साझा हुईं, शाम की साइकिल राइड्स साथ होने लगीं।

एक शाम राहुल ने कहा, अदिति, तुम्हारे साथ रहकर ऐसा लगता है कि... क्या मैं तुम्हारे साथ चल सकता हूँ?

अदिति मुस्कुराई, लेकिन मन में सवाल था क्या वो मेरी दुनिया समझ पाएगा?

शोषण की छाया | हिंदी कहानी
उसी कॉलेज में एक प्रोफेसर हैं डॉ अजय शर्मा। हिंदी विभाग का सीनियर लेक्चरर। बाहर से सम्मानित, लेकिन अंदर से एकदम सड़ा हुआ। वह अदिति और राहुल दोनों के बारे में जानता है। उसने अदिति की मेहनत देखी, तारीफ की। लेकिन कुछ समय बाद उसकी नजरें बदलनी शुरू हुई। उसनें अदिति को कॉलेज असाइनमेंट और एक्स्ट्रा क्लास के बहाने अपने घर बुलाया। शुरू में मीठी बातें की, लेकिन उसके मन मे अदिति के प्रति कुछ और चल रहा था।

"अदिति, तुम्हारी लिखावट बहुत अच्छी है। कविता भी कमाल की लिखती हो। बस थोड़ी मदद चाहिए... मैं तुम्हें बहुत आगे ले जाऊँगा।" इतना कहते हुए उसने अपना हाथ अदिति के कंधे पर रख दिया। अदिति असहज हुई, पीछे हटी। शर्मा की आँखें सिकुड़ गईं।

"इतनी अकड़? तुम्हारी जाति की लड़कियाँ तो इस सबसे खुश होती हैं। मार्क्स मेरे हाथ में हैं। तुम्हारा पीएचडी एडमिशन भी। सोच लो।"

अदिति ने मना कर दिया। अगले पेपर में उसके मार्क्स गिर गए। वह बहुत रोई। अपने क्लास की दोस्त प्रिया से बात की।

प्रिया ने कहा, "अदिति, रिपोर्ट करो। ये सब गलत है" 

अदिति ने जवाब दिया, "प्रिया, अगर मैंने आवाज उठाई तो पापा की नौकरी चली जाएगी। वो चपरासी हैं, शर्मा सर उन्हें कॉलेज से निकाल देंगे। मेरा सपना टूट जाएगा।"

प्रिया ने कंधा थपथपाया, "तुम अकेली नहीं हो। लेकिन हाँ, कुछ कहने में डर तो लगता है।"

अदिति ने घरवालों से बताने की कोशिस की। शाम को अपने पिता से बोली, "पापा कॉलेज में एक प्रोफेसर... वो गलत व्यवहार करते हैं।"

पिता ने थककर सिर हिलाया, "बेटी चुप रह। वो बहुत बड़े लोग हैं। हम गरीब हैं। आवाज उठाई तो सब बर्बाद हो जाएगा। हमारा क्या है? बस जीने दो। हमारी जिंदगी मे शायद यही नरक लिखा है।" 

उसने राहुल से भी कहने की कोशिश की, लेकिन उसने ध्यान नहीं दिया। शर्मा सबकी नजरों में सम्मानित थे।

आखिरकार अदिति ने शिकायत करने का फैसला किया। वह एक शिकायत-पत्र लेकर अपने  विभागाध्यक्ष के पास जा रही थी। शर्मा ने उसे जाते हुए देख लिया और पत्र छीन लिया।"राहुल OBC है। मैं उसकी स्कॉलरशिप कटवा दूँगा। और तुम... तुम्हें पता है आगे क्या होगा। मैं तुम दोनों का पीएचडी दाखिला रुकवा दूँगा।" वह चिल्लाया । यह सुनकर अदिति डर के मारे वापस लौट आई। इस घटना ने अदिति को अंदर से झकझोरना शुरू किया एक तरफ उसका करियर था, उसका प्रोफेसर बनने का सपना और एक तरफ उसकी अस्मिता जिससे वह समझौता नहीं करना चाहती थी।

एक शाम कॉलेज के पीछे गार्डन में शर्मा ने उसे अकेले पकड़ा। हाथ बढ़ाया। अदिति चीखी। राहुल पास से गुजर रहा था। दौड़कर आया, शर्मा को धक्का दे दिया। शर्मा हँसा, "तुम दोनों? अच्छा जोड़ा है। लेकिन याद रखो, मैं तुम्हें बर्बाद कर दूँगा।"                            

राहुल ने अदिति से कहा, "अब बात बहुत आगे बढ़ चुकी है। तुमने पहले क्यों नहीं बताया?"

अदिति रो पड़ी। "राहुल... मैं डर गई थी। एक बार कोशिश की थी, तुमने ध्यान नहीं दिया। मैंने सोचा तुम भी कहोगे दलित लड़की है, ऐसे ही होता है। शर्मा तुम्हारा दाखिला रुकवा देगा,तुम्हारी स्कॉलरशिप कट जाएगी। मैंने सोचा चुप रहूँगी तो सब ठीक हो जाएगा। लेकिन अब... मैं खुद से नफरत कर रही हूँ। हर रात उसके गंदे हाथ अपने ऊपर महसूस होते हैं। क्या मैं कभी सामान्य हो पाऊँगी?"

राहुल की आँखें भर आईं वह बोला  "मैंने गलती की। क्लास में कई लोगों से सुना था कि शर्मा की नजर तुम पर है। मैंने सोचा शायद... लेकिन अब समझ आया। अगर मैंने पहले ही समझने की कोशिस की होती तो शायद आज यह सब नहीं होता।"   

अदिति बोली, "मेरा सपना टूट रहा है राहुल सब खत्म हो रहा है।"

राहुल ने वादा किया, "मैं लड़ूँगा।"

लेकिन घर लौटकर उसके मन में तूफान था। उसने घर आकर अपने पिता से इस बारे मे बात की। पिता ने मना कर दिया, बेटा, बड़े लोगों से पंगा मत लो। वो तुम्हारा कैरियर बर्बाद कर देंगे। राहुल टूट गया। वो अदिति से दूर हो गया । दोनों के बीच मैसेज बंद हो गए, मुलाकातें रुक गईं।

अदिति अकेली रह गई। शर्मा का शोषण बढ़ता गया। फोन पर अश्लील मैसेज, रात में घर आने की धमकी। मार्क्स गिरते गए। पीएचडी दाखिला रुक गया। पिता बीमार पड़ गए।

अदिति ने प्रिया के साथ प्रिंसिपल से मिलने की कोशिश की। वह दोनों प्रिंसिपल के कमरे में गए। प्रिंसिपल ने शिकायत पत्र देखा और बोले, "गलतफहमी है बेटा। प्रोफेसर शर्मा बहुत सम्मानित व्यक्ति हैं। तुम्हारी तरह कई लड़कियाँ आती हैं, बाद में सब ठीक हो जाता है। रिपोर्ट करने से क्या फायदा? कॉलेज की बदनामी होगी। चुप रहो, पढ़ाई पर ध्यान दो।"

प्रिया ने कहा, "सर, लेकिन ये सच है। अदिति को परेशान किया जा रहा है।"

प्रिंसिपल ने सख्ती से, "प्रिया, तुम भी समझदार हो। शर्मा सर हमारे सबसे अच्छे टीचर हैं। अगर तुम लोगों ने आवाज उठाई तो तुम्हारा भी दाखिला प्रभावित हो सकता है। सोच लो।"

सोशल मीडिया पर अदिति ने एक अनॉनिमस अकाउंट से पोस्ट किया: "कॉलेज में एक प्रोफेसर छात्राओं का शोषण कर रहे हैं। #MeToo #JusticeForVictims"। पोस्ट वायरल होने लगा, लेकिन गाँव में अफवाहें फैल गईं दलित लड़की ने प्रोफेसर को फँसाया। पड़ोसी बातें करने लगे, पिता पर बहुत दबाव आ गया। पिता ने घर पर डाँटा, "बेटी, ये क्या किया तूने? अब सब हमें नीचा दिखा रहे हैं। हम गरीब हैं। छोटे लोग हैं। लड़ने से क्या मिलेगा? चुप रह जा, सब भूल जा।"

अदिति चिल्लाई, "पापा, छोटे लोग हैं तो क्या हमें जीने का कोई अधिकार नहीं? हम गरीब हैं तो हमारी कोई इज्जत  नहीं?"

पिता ने आँखें नम कर कहा, "बेटी, मैं समझता हूँ। लेकिन मैंने देखा है लड़ने वाले टूट जाते हैं। हमारा क्या है? बस जीने दो।"

लेकिन सुनने वाला कौन था?

अदिति टूट गई। उसने कॉलेज छोड़ दिया। एमए अधूरा रह गया। राहुल से आखिरी मुलाकात हुई कॉलेज गेट पर।

राहुल (आँखें नम): अदिति... मैं लौट आया। मैं लड़ूँगा।

अदिति (टूटती आवाज): बहुत देर हो गई राहुल। मेरा सपना मर गया। मेरा दिल मर गया। तुम भी चले गए थे। अब... कुछ नहीं बचा।

राहुल रोया, मैंने तुम्हें खो दिया... क्योंकि मैं कमजोर था।

अदिति मुस्कुराई (दर्द भरी मुस्कान): प्यार था राहुल... लेकिन शर्मा की छाया ने सब कुचल दिया। अब मैं घर लौट रही हूँ। शायद कभी कोई और अदिति लड़ पाए। कोई और राहुल उसका साथ दे पाए।

अदिति गाँव लौट गई। कॉलेज की किताबें बेच दीं। उसके पिता को शर्मा ने कॉलेज से निकलवा दिया। वह अपने पिता जी के साथ गाँव मे मजदूरी करने लगी। राहुल शहर चला गया, लेकिन मन में हमेशा वह दर्द रहा।

प्रोफेसर शर्मा वही रहे सम्मानित और सुरक्षित। उनकी छाया अब प्रिया पर पड़ गई है। प्रिया ने समझौता कर लिया। शुरू में वह अदिति का साथ देना चाहती थी, लेकिन प्रिंसिपल की बातों और परिवार के दबाव से डर गई। उसने शर्मा से माफी माँगी, एक्स्ट्रा असाइनमेंट दिए, और उनका मेंटरशिप स्वीकार कर लिया। उसका पीएचडी दाखिला भी हो गया। अब वह उसी कॉलेज में प्रोफेसर है। क्लास में वही पुरानी बातें सिखाई जाती है समानता की, नैतिकता की। लेकिन जब कोई लड़की शिकायत लेकर आती है, तो प्रिन्सपल मुस्कुराकर कहते हैं, "गलतफहमी है बेटा। चुप रहो, पढ़ाई करो।"

शर्मा सर की छाया उस कॉलेज से कभी नहीं हटी। वह छाया अदिति के जीवन पर पड़ गई और उसने सब कुछ छीन लिया सपने, प्यार, हिम्मत।

नरेन्द्रपुर में आज भी लड़कियाँ कॉलेज जाती हैं। लेकिन अदिति जैसी आवाजें चुप हो जाती हैं। क्योंकि सिस्टम जीत जाता है। और दर्द... चुपचाप सहा जाता है।



- सुधांशु सिंह, 
शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय,
हिन्दी विभाग, नई दिल्ली
ईमेल - singhsudhanshu718@gmail.com मो. 9005464463

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